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Film Review 'शाहिद'

Dainik Bhaskar

Oct 16, 2013, 04:52 PM IST

हंसल मेहता की यह नई फिल्म 'शाहिद' अपने जैसी बाकी सभी से कहीं बेहतर है।

Film Review 'Shahid'
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यह फिल्म एक 32 वर्षीय क्रिमिनल वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आज़मी की कहानी कहती है जिसे तीन साल पहले उसके कुर्ला के टैक्सीमेन कॉलोनी स्थित ऑफिस में क़त्ल कर दिया गया था। सबूतों के अभाव में अपनी बेगुनाही साबित करने में असफल और आतंकी गतिविधियों में गलत ढंग से फंसाए गए और जेल में बंद किए लोगों के लिए शाहिद किसी मसीहा से कम नहीं था।

विवादों में घिरे इस चरित्र को सामने रखनेवाली इस फिल्म की शुरुआत इस डिस्क्लेमर के साथ होती है कि, इसमें दी गई जानकारी फैक्ट्स एंड फिक्शन पर बेस्ड है। इसकी वजह शायद निर्माताओं का वह डर है जो इस सच्ची घटना के दोषी हैं और आज भी छोटा राजन गिरोह के सदस्यों के रूप में सक्रिय हैं। शायद निर्माताओं को इस बात का डर है कि कहीं उनकी फिल्म की रिलीज़ को रुकवा न दिया जाए।

कोर्टरूम और उसमें चलने वाली कार्यवाही, कागज़ी कार्यवाही, केस-स्टडी और वहां के प्रवाहमय हास्य को सिनेमा में बहुत कम ही दिखाया गया है। इस हिचकिचाहट को तोड़ती फिल्मकार हंसल मेहता की यह नई फिल्म 'शाहिद' अपने जैसी बाकी सभी से कहीं बेहतर है।

फिल्म की शुरुआत होती है 1993 के उन दंगों के दौरान जब शाहिद का किरदार निभा रहे राजकुमार यादव कुछ लोगों की चीख पुकार सुनकर झुग्गियों में बने अपने घर से बाहर निकल आता है। यह लोग उस भीड़ से अपनी जान बचाए भाग रहे होते हैं जो दंगों के दौरान हुई मौतों का बदला चाहती है। आखिरकार शाहिद उस पाक-अधिकृत कश्मीर में पहुंच जाता है जहां जिहाद के लिए सैन्य परीक्षण दिया जा रहा होता है। पर चूंकि वह एक ऐसा व्यक्ति है जिसे कोलाहल और क्रूरता से नफ़रत है इसलिए शाहिद जिंदगी की एक नई शुरुआत करने घर वापस निकल पड़ता है।

एक गलत कदम, और फिर आप अतीत को वापस नहीं ला सकते। यही होता है शाहिद के साथ जब उसे तिहाड़ जेल में डालकर उसपर ज़ुल्म होने लगते हैं। राजकुमार यादव की 'क्लोज़ टु मेथड एक्टिंग' किरदार में जान डाल देती है। खासतौर से तब जब शाहिद को नंगा करके उसे थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया जाता है।

किस्मत से ही जेल में ही शाहिद की मुलाक़ात होती है के के मेनन से जो कैमियो के किरदार में खूब जमे हैं। मेनन का किरदार शाहिद को सही राह दिखाता है जिसके बाद वह अपनी पढ़ाई पूरी कर ग्रैजुएट बनता है।

लेकिन एक अदालती लड़ाई लड़ने के लिए शाहिद वापस मुंबई लौटता है जहां न केवल उसे गुनाहगार साबित किया जाता है बल्कि कानून के शिकंजे में भी वह फंस जाता है। इसी के बाद यह युवक वकालत करने का फ़ैसला लेता है और यहीं से सच्ची जीवनी पर बनी यह फिल्म अपनी रफ़्तार पकड़ लेती है।

असली कानूनी दफ्तर और परिसर, कोर्टरूम, जर्जर और भीड़भाड़ भरा पड़ोस और ईरानी कैफ़े (यह वाही आर्मी ईरानी कैफ़े हैं जहां शाहिद अपने मुवक्किलों के साथ अपने केस के बारे में बातचीत करता था)- इन सभी को इनोवेशन और तेज़ एडिटिंग के ज़रिये दिखाते हुए हंसल मेहता ने न केवल फिल्म की रफ़्तार बरकरार रखी है बल्कि बड़ी ही कुशलता से आज़मी की जिंदगी के नाटक को आश्चर्यजनक रूप से 1.5 करोड़ के बजट में भी दिखा दिया है।

फिल्म में एक प्रेम कहानी भी है जो शाहिद की मुवक्किला मरियम (प्रभलीन संधू) के ज़रिये दिखाई गई है। यह इस पूरे सीरियस ड्रामा को कुछ हल्का करने का काम करती है। फिल्म की एकमात्र कमज़ोर कड़ी है एक तलाकशुदा औरत और उसका 6 साल का बच्चा बड़ा होने से मन कर रहा है बावजूद इसके कि स्टोरीबोर्ड 5 साल आगे बढ़ चुकी है। मरियम का चरित्र काफ़ी बोल्ड और बड़बोला है जो अपने पति के जुनून के आगे हार जाता है।

26/11 के मुंबई ब्लास्ट प्रकरण में एमसीओसीए द्वारा धरे गए फहीम अंसारी का केस लड़ते हुए शाहिद का कुछ राजनैतिक और कम्युनिस्ट नेताओं के साथ टकराव भी होता है। अभियोजन पक्ष के वकीलों की दलीलों से अपने मुवक्किल को लगभग बेगुनाह साबित कर चुके शाहिद के सामने आखिरकार उनका अतीत आ जाता है।

ऐसी स्थिति में धमकी भरे फोन कॉल्स और अपनी मां के घर पर सियासी गुंडों के आने के कारण शाहिद के लिए अपनी प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ़ में बैलेंस बनाना मुश्किल हो जाता है। इसी उधेड़बुन में एक दिन आधी रात को शाहिद का उसके ऑफिस में क़त्ल हो जाता है।

'दिल पे मत ले यार' और 'चाल' के बाद 125 मिनट लंबी इस फिल्म के लिए निर्देशक हंसल मेहता ने बड़ी मेहनत की है जिसे राजकुमार यादव के बेहतरीन अभिनय ने सार्थक बना दिया है। लॉ ड्रामा के शौक़ीन दर्शकों को यह फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए।

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