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MOVIE REVIEW: 'फटा पोस्टर निकला हीरो'

Dainik Bhaskar

Sep 20, 2013, 12:28 PM IST

इस फिल्‍म के मुख्‍य अभिनेता शाहिद कपूर के पक्ष में कम से कम इतनी बात तो कही ही जा सकती है कि उन्‍होंने फिल्‍म में इतना दम-खम दिखाने की कोशिश की है कि पता चल जाता है उनका कॅरियर इसी पर निर्भर है।

movie preview: phata poster nikla hero
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इस फिल्‍म के मुख्‍य अभिनेता शाहिद कपूर के पक्ष में कम से कम इतनी बात तो कही ही जा सकती है कि उन्‍होंने फिल्‍म में इतना दम-खम दिखाने की कोशिश की है कि पता चल जाता है उनका कॅरियर इसी पर निर्भर है। अं‍त तक आते-आते वे दर्शकों को यह भी गिनाने लगते हैं कि उन्‍होंने फिल्‍म में क्‍या-क्‍या किया है, मसलन विलेन के साथ फाइट, आइटम गर्ल के साथ डांस, हीरोइन के साथ रोमांस, थोड़ी-बहुत कॉमेडी, थोड़ा-बहुत इमोशन, गुंडों की धुलाई और यहां तक कि एक पूरे शहर की सुरक्षा भी। इससे ज्‍यादा एक हीरो से आपको और क्‍या चाहिए? शायद, सिरदर्द की एक गोली।

हीरो बॉलीवुड स्‍टार बनना चाहता है। लेकिन उसकी मां चाहती है कि वह ईमानदार पुलिस वाला बने। क्‍यों? यदि आप वास्‍तव में जानना चाहते हैं तो मां की इस ख्‍वाहिश का नाता कुछ हद तक इस बात से है कि उसके पिता एक भ्रष्‍ट पुलिस वाले थे। बेटा मुंबई में अपनी किस्‍मत आजमाने चला आता है।

एक अजीबो-गरीब घटनाक्रम के तहत एक प्रमुख स्‍थानीय अखबार अपने फोटो डिपार्टमेंट को एक लोकल फोटो स्‍टूडियो की मदद के लिए भेजता है और हीरो किसी तरह अखबार के पहले पन्‍ने पर पुलिस की वर्दी पहने अवतरित हो जाता है। यह खबर सुनकर उसकी मां खुशी से फूली नहीं समाती और गांव से शहर चली आती है। अब हीरो को मजबूरन पुलिस का स्‍वांग रचने को मजबूर होना पड़ता है, जबकि वह वास्‍तव में एक स्‍ट्रगलिंग कलाकार से ज्‍यादा कुछ नहीं है।

फिल्‍म के कुछ अंश मजेदार हैं। शायद यह फिल्‍म एक कॉमेडी के रूप में बनाई गई थी, लेकिन भांति-भांति के डॉनों, नकली पुलिस वालों, असली पुलिस वालों और अन्‍य ऊटपटांग घटनाओं के चलते यह एक अजीब-सा घालमेल बनकर रह जाती है।

फिल्‍म के निर्देशक राजकुमार संतोषी हैं। संतोषी की अंदाज़ अपना अपना को आज भी हिंदी सिनेमा की बेहतरीन कॉमेडी फिल्‍मों में से एक मानी जाती है। फिल्‍म में सलमान खान ने भी एक छोटी-सी भूमिका निभाई है, जिससे अनुमान लगाया जा सकता है कि शायद अंदाज अपना अपना 2 में वे आमिर खान के साथ फिर से नजर आ सकते हैं। लेकिन यदि राजकुमार संतोषी इस जैसी ही फिल्‍में बनाना चाहते हैं तो हमें दुआ करना चाहिए कि अंदाज अपना अपना का सीक्‍वेल कभी नहीं बनाया जाए।

फिल्‍म को टिप्‍स ने प्रोड्यूस किया है। यह एक म्‍यूजिक कंपनी है और अमूमन अपने लोकप्रिय साउंडट्रैक्‍स को बढ़ावा देने के मकसद से ही फिल्‍में बनाती है। उनका फॉर्मूला बहुत सिंपल है : एक अच्‍छी शक्‍लो-सूरत वाला स्‍टार लेकर आओ, पिक्‍चर में खूब सारे गाने डाल दो और लोग उसे देखने के लिए उमड़ पड़ेंगे। अक्‍सर ऐसा होता भी है। इस फिल्‍म में फटे पोस्‍टर से निकलने वाला हीरो अजब प्रेम की गजब कहानी के हीरो जैसा ही है, जिसकी मैं बहुत ज्‍यादा परवाह नहीं करता, अलबत्‍ता वह फिल्‍म बहुत बड़ी हिट साबित हुई थी। टिप्‍स की अनेक फिल्‍में वीकएंड में पैसा कमाने के मकसद से रिलीज की जाती हैं, लेकिन हफ्ता खत्‍म होते-होते उन्‍हें भुला भी दिया जाता है। संतोषी को आज भी दामिनी, घायल, घातक और द लेजेंड ऑफ भगत सिंह जैसी फिल्‍मों के लिए याद रखा जाता है।

हम संतोषी के लिए खेद का अनुभव करते हैं। लेकिन क्‍या करें, मुख्‍य अभिनेता तो बॉलीवुड स्‍टार बनने के लिए बेताब है। धूल के झोंकों के बीच यह दुबला-पतला सितारा सिंघम की तरह नीचे कूदता है, वह हवा में घूमकर वार करता है और गुंडे धराशायी हो जाते हैं, वह सूफी गीत गाने के लिए तनहा समुद्र तटों की सैर करता है, आइटम डांस करने के लिए स्‍टेज पर लौट आता है, मां के लिए आंसू बहाता है, बाप को गले लगाता है, कॉमेडी के लिए देव आनंद और अमोल पालेकर की नकल उतारता है। हम मन ही मन सोचने लगते हैं कि भगवान उसका भला करें। फिर हम पॉपकॉर्न के साथ सिरदर्द की एक गोली निगलते हैं और ऐहतियात के साथ घर लौट जाते हैं।

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