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MOVIE REVIEW: B.A.PASS / MOVIE REVIEW: B.A.PASS

dainikbhaskar.com

Aug 02, 2013, 12:00 AM IST

इसमें कोई शक नहीं कि बॉलीवुड अब बेहद बोल्ड हो चुका है। फिल्मों के विषय के चुनाव में भी बोल्डनेस साफ़ देखी जा रही है।

movie review: b.a pass
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एक यतीम लड़का है। उसकी दो बहनें हैं, जो उससे भी कमउम्र हैं। लेकिन वह अभी इतना छोटा है कि उनकी परवरिश करने की स्थिति में नहीं है। दोनों लड़कियों को मजबूरन एक ख्‍स्‍ताहाल गर्ल्‍स होस्‍टल में रहना पड़ता है।

फोन पर अपनी बहनों से बात करते हुए एक दिन उसे इस बात का अहसास होता है कि उनकी बहनों के सिर पर उन्‍हें सेक्‍स वर्कर बनाए जाने का खतरा मंडरा रहा है। वे जिस होस्‍टल में रहती हैं, वह धीरे-धीरे चकलाघर बनता चला जाता है। इसके बाद उस लड़के की जिंदगी और बदल जाती है। वह मायूस हो जाता है।

वह सोचता है कि उसे अपनी बहनों को बचाने के लिए कुछ न कुछ करना ही होगा। वह इसके लिए और मेहनत करने लगता है। लेकिन विडंबना यह है कि वह जो काम करता है, वह उससे कतई अलग नहीं है, जिससे वह अपनी बहनों को बचाना चाहता है। अठारह साल का यह लड़का एक पुरुष-वेश्‍या है। दर्शकों को उससे जितनी सहानुभूति महसूस होती है, उतनी शायद उसे भी खुद से न होती होगी।

वह पैसों के लिए औरतों के साथ सोता है। यदि वह लड़के के बजाय लड़की होता तब क्‍या कहानी अलग होती? यही इस फिल्‍म का केंद्रीय विचार है।

मेरा यह सोचना है कि जो भी सेक्‍स गहरे प्‍यार या अल्‍पकालिक उत्‍तेजना का परिणाम न हो, वह दु:खदायी ही होता है, फिर आप चाहे स्‍त्री हों या पुरुष। जब आप इस फिल्‍म की अंधकार भरी दुनिया में दाखिल होते हैं तो इस बात को अच्‍छी तरह समझ जाते हैं।

यह फिल्‍म बॉलीवुड की देसीबॉय्ज़ (2011) जैसी फिल्‍मों से अलग है, जो इसी थीम पर आधारित थीं। अलबत्‍ता मुझे पक्‍का नहीं पता कि इस फिल्‍म का शीर्षक बीए पास क्‍यों रखा गया है। फिल्‍म में बस इतना ही दिखाया है कि वह लड़का दिन में एक कॉलेज में बीए की पढ़ाई करता है।

यदि आप कोई अकादमिक कैरियर नहीं बनाना चाहते हैं तो हर विषय का थोड़ा-बहुत नॉलेज भी आपको जिंदगी में कामयाब बनाने के लिए काफी होता है। दिल्‍ली यूनिवर्सिटी की स्‍पेशलाइज्‍ड ऑनर्स डिग्री के उलट बीए के पाठ्यक्रम में अनेक विषय शामिल होते हैं, लेकिन यह दुख की बात है कि इस डिग्री को हिकारत की नजर से देखा जाता है।

यह तो तय है कि इस लड़के का कोई अकादमिक भविष्‍य नहीं है। उसकी मौजूदा हालत भी खस्‍ता ही है। वह अपने अंकल, आंटी और कजिन के साथ रहता है, जो उसे अपने यहां नहीं चाहते। लेकिन पड़ोस की एक आंटी इस आकर्षक नौजवान पर फिदा हो जाती है।

वह बहुत कुछ 1967 की फिल्‍म ‘द ग्रेजुएट’ की मिसेज रॉबिन्‍सन की तरह है। शायद लड़का भी उसकी ओर आकर्षित हो जाता है। दोनों के बीच होने वाला सेक्‍स भले ही आत्‍मीय और कोमल न हो, लेकिन यह दोनों की ही सहमति से होता है और इससे दोनों को संतुष्टि भी मिलती है।

अपने से अधिक उम्र की औरतों के साथ सोना एक टीन-एज फैंटेसी होती है। यह लड़का अपनी इसी फैंटेसी को जीता है, लेकिन केवल कुछ ही समय के लिए।

कुछ समय बाद वह औरत इस लड़के को कुछ अन्‍य क्‍लाइंट्स भी मुहैया कराने लगती है। हम उस लड़के के साथ दिल्‍ली की उस हकीकत से वाकिफ होते हैं, जिसमें अकेली हाउसवाइफ़ अपने व्‍यस्‍त पति के अभाव में अन्‍य पुरुषों से अपना मन बहलाती हैं। इस हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता।

फिल्‍म मोहन सिक्‍का की लघुकथा ‘द रेलवे आंटी’ पर आधारित है, जो ‘देल्‍ही नॉइर’ नामक एक कहानी संकलन का हिस्‍सा थी। आंटी का पति एक रेलवे अधिकारी है और लड़के के अंकल भी।

इसके बावजूद वह पहाड़गंज की इस मलिन बस्‍ती में रहता है। आस-पड़ोस की नियोन लाइट्स इस फिल्‍म को एक खास ‘नॉइर’ लुक देती हैं। पूरी कहानी उस लड़के पर केंद्रित है। नौजवान लड़के (शादाब कमाल) के कंधों पर यह बहुत भारी बोझ था, लेकिन उसने इसे बखूबी निभाया है।

ये अलग बात है कि इस कहानी को एक दूसरे ही स्‍तर पर ले जाने में वह ज़रूर क़ामयाब नहीं रहता है। शिल्‍पा शुक्‍ला ने रेलवे आंटी की भूमिका निभाई है, जो एक अजीब संगदिल औरत है। शिल्‍पा शुक्‍ला की प्रतिभा को पूरी तरह से आंका नहीं गया है।

अनेक सिनेप्रेमियों को वर्ष 2007 की फिल्‍म ‘चक दे इंडिया’ की अति महत्‍वाकांक्षी हॉकी खिलाड़ी के रूप में वे याद होंगी। गंभीर सिनेमा के कद्रदानों को बंटवारे पर आधारित वर्ष 2003 की पाकिस्‍तानी फिल्‍म ‘खामोश पानी’ फिल्‍म में उनकी यादगार अदाकारी भी याद होगी।

यह निर्देशक अजय बहल की पहली फिल्‍म है। आज भारत में जितने युवा फिल्‍मकार फिल्‍में बना रहे हैं, उतने दुनिया में और कहीं नहीं हैं। ये युवा, साहसी और प्रतिभाशाली फिल्‍मकार फिल्‍म इंडस्‍ट्री के बाहर काम करते हुए लो-बजट फिल्‍में बनाते हैं और बॉलीवुड को मजबूर कर देते हैं कि वह उनके काम पर गौर करे।

यहां आनंद गांधी की ‘शिप ऑफ थिसियस’ का उदाहरण दिया जा सकता है, जो भारतीय न्‍यू वेव सिनेमा का एक बेहतरीन नमूना है। महज 90 मिनटों की फिल्‍म में बहल माध्‍यम पर नियंत्रण का परिचय देते हुए हमें बांधकर रखने वाला सिनेमा रच देते हैं।

हमें इस फिल्‍म में ह्यूमर की कमी जरूर खलती है, अलबत्‍ता जिस विषय पर यह आधारित है, उसे देखते हुए इसकी गुंजाइश कम ही थी। सेक्‍स आज भी भारतीय समाज और फिल्‍मों के लिए एक संवेदनशील विषय है।

हमने इस विषय को इस हद तक नजरअंदाज किया है कि मुझे नहीं लगता हिंदी में सेक्‍स को लिए कोई ठीक-ठाक प्रचलित शब्‍द भी है। यह फिल्‍म हमारे द्वारा नजरअंदाज की गई कुछ हकीकतों को उजागर करती है।

शायद प्रोमो देखकर अनेक दर्शक यह सोचकर यह फिल्‍म देखने पहुंचेंगे कि उन्‍हें कुछ गर्मागर्म बेडरूम दृश्‍य देखने को मिलेंगे। लेकिन जब वे यह फिल्‍म देखकर बाहर निकलेंगे तो वे पाएंगे कि उनका वास्‍ता एक बेहद सशक्‍त फिल्‍म से पड़ा है। और यह दूसरा विकल्‍प पहले से ज्‍यादा बेहतर है।

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