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MOVIE REVIEW: 'भाग मिल्खा भाग'

फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के जीवन पर बनी बहुप्रतीक्षित फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' आज रिलीज़ हो गयी है।

Dainik Bhaskar

Jul 12, 2013, 12:02 AM IST
movie review: bhaag milkha bhaag

महानतम भारतीय महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित फिल्म गांधी (1982) की ही तरह यह फिल्म भी अपने त्रासद अंत से शुरू होती है। निश्चित ही मिल्खा सिंह अभी हमारे बीच हैं और माशाअल्ला चुस्त-दुरुस्त हैं, लेकिन फिल्म 1960 के रोम ओलिंपिक की उस 4000 मीटर दौड़ से शुरू होती है, जब मिल्खा ने पल भर के लिए पीछे पलटकर देखा था और ऐसा लगा कि इसी के साथ वे एक महत्वपूर्ण पदक जीतने से चूक गए।

जैसा कि सभी जानते हैं, मिल्खा उस दौड़ में चौथे क्रम पर आए थे और एक पल के बहुत छोटे-से अंतराल से कांस्य् पदक चूक गए थे। दक्षिण अफ्रीका के मैल्कपम स्पेंस ने उन्हें पछाड़ दिया था, जबकि अमेरिका के ओटिस डेविस स्व्र्ण पदक जीतने में कामयाब रहे थे।

लेकिन इस फिल्म में हमें ये नाम सुनाई नहीं देते। जाहिर है, यह फिल्म केवल और केवल मिल्खा सिंह के बारे में है। फिल्म का शीर्षक जरूर हमें फ़ॉरेस्टह गम्प की उस यादगार पंक्ति की याद दिलाता है : रन फ़ॉरेस्टट रन।

निश्चित ही, फिल्म के परदे पर सभी के आकर्षण के केंद्र में 39 वर्षीय अभिनेता फरहान अख्तर हैं, जो मिल्खा सरीखे लंबे बालों, दाढ़ी, कद-काठी और फिटनेस के चलते बिल्कुल किसी पेशेवर एथलीट की तरह नजर आते हैं।

फिल्म के परदे पर उन्हें इतनी बार दिखाया जाता है कि हम समझ जाते हैं कि फिल्मकार उनके इस हुलिये पर इतना ही फिदा है, जितनी वह दर्शकों से भी फिदा होने की उम्मीद करता है।

डॉन 2 का निर्देशन करने के बाद से ही फरहान महीनों से प्रशिक्षण ले रहे थे, ताकि इस फ्लाइंग सिख के जैसा नजर आ सकें। निश्चित ही फरहान की देहयष्टि मैदान में दौड़ लगाने वाले किसी एथलीट के बजाय जिम में तैयार की हुई है, इसके बावजूद इस भूमिका के लिए उनका समर्पण उनके समकालीन अभिनेताओं के साथ ही दर्शकों के लिए भी प्रेरक होना चाहिए। ऐसा कम ही होता है कि कोई अभिनेता किसी भूमिका के लिए खुद को इस तरह बदल डाले। और फिर ऐसे किरदार भी तो कम ही हैं, जो किसी अभिनेता से ऐसे समर्पण की मांग करें।

अलबत्ता फिल्म गांधी के उलट यह फिल्म वहां खत्म नहीं होती, जहां शुरू हुई थी। फिल्म के प्रारंभ में दिखाई गई त्रासद घटना वास्तव में उनके जीवन में एक के बाद आने वाली मुसीबतों की ही एक कड़ी है, फिर चाहे वह देश के बंटवारे के दौरान अपने माता-पिता को गंवा देना हो, शुरुआती दौर में गरीबी का दंश झेलना हो, जवानी के दौरान भटकाव हो, सच्ची मुहब्बत की नाकाम तलाश हो या करियर के ही सवालात हों।

यदि इस कहानी को अधिक सरलता के साथ सुनाया जाता तो यह फरहान द्वारा ही निर्देशित फिल्म लक्ष्य की तरह होती, जिसमें एक लक्ष्यहीन नौजवान आखिरकार अपनी जिंदगी का एक मकसद खोज लेता है। लेकिन इस फिल्म की कहानी टुकड़ों-टुकड़ों में सुनाई गई है।

मिल्खा के प्रारंभिक मेंटर (लाजवाब अभिनेता पवन मलहोत्रा) यह कहानी सुनाते हैं। मिल्खा खुद अपनी जिंदगी के कुछ हिस्सों को फिर से याद करते हैं, जिससे फ्लैशबैक के भीतर फ्लैशबैक की एक श्रृंखला निर्मित हो जाती है।

इससे यह फिल्म न तो पूरी तरह से एक स्पोर्ट्स फिल्म बन पाती है, जिसमें एक बिखरा हुआ इंसान आखिरकार बुलंदियों को छूने में क़ामयाब हो जाता है, और न ही यह एक मानवीय दस्तावेज़ बन पाती है, जिसमें शरणार्थी शिविरों में पल रहा एक यतीम बच्चा इस दुनिया में अपनी एक जगह खोज निकालता है।

यदि हम यह जानना चाहते हैं कि मिल्खा तमाम मुश्किल हालात के बावजूद भारत के सबसे तेज़ धावक कैसे बने, तो इसमें भी फिल्म की गुंथी हुई कहानियां हमारी ज्यादा मदद नहीं करतीं।

हमें इस कहानी को सुनाए जाने के बजाय खुद उसे घटित होते हुए देखने की जरूरत थी। मिल्खा चाकू चलाने वाले लफंगे बच्चों की तरह दिखाए जाते हैं। स्लमडॉग मिलियनेअर के बच्चों की तरह वे ट्रेन में ही बच्चे से जवान होते हैं।

यह उनकी जिंदगी का एक दिलचस्प आयाम था, लेकिन इसे जल्दी् में निपटा दिया जाता है। यकीनन, इस फिल्म‍ का अंतिम लक्ष्य हमें यह दिखाना है कि मिल्खा एक चैंपियन धावक कैसे बनते हैं।

उनके रास्ते में रुकावटें आती रहती हैं और मंजिलें दूर खिसकती रहती हैं। लेकिन जब मिल्खा अपने रनिंग टाइम पर नजर रखे होते हैं, तभी हम सुनते हैं कि युवाओं का एक समूह गाना गाने लगा है और इसी के साथ हम इस फिल्म को एक दूसरी ही दिशा में जाते देखते हैं।

इसकी तुलना में तिग्मांशु धुलिया की पान सिंह तोमर कहीं बेहतर फिल्म थी। चूंकि ये दोनों ही फिल्में एक धावक की जिंदगी की असल कहानी बयां करती हैं, इसलिए इनकी तुलना से बचा नहीं जा सकता।

पान सिंह तोमर की तुलना में यह फिल्म कहीं बड़े पैमाने पर बनाई गई है, लेकिन इसमें उस जैसी धार नहीं है। फिल्म का दृश्य विधान अद्भुत है, लेकिन उसे नाहक ही लंबा और बोझिल बनाया गया है।

जहां तीन तमाचों की दरकार थी, वहां दस तमाचे मारे जाते हैं, सीक्वेंस को अकारण लंबा खींचा जाता है, आप जानते हैं मैं क्या कहना चाह रहा हूं! पता नहीं इसका कारण कहीं यह तो नहीं कि यह फिल्म एक जीवित व्यक्ति के बारे में है। फिल्म के पटकथा लेखक प्रसून जोशी इस कहानी को चाहे जो रचनात्मक पुट दें, उसके वास्तविक लेखक तो मिल्खा सिंह ही रहेंगे। फिर यह फिल्मा किसी किताब पर भी आधारित नहीं है, जैसे मिसाल के तौर पर शेखर कपूर की लाजवाब फिल्मॉ बैंडिट क्वीन थी, जो फूलन देवी के जीवनकाल में ही प्रदर्शित की गई थी।

लेकिन इन तमाम कारणों के बावजूद मिल्खा सिंह की जिंदगी की कहानी में जो दम है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हम बचपन से ही यह जोक सुनते आ रहे हैं कि 1956 के मेलबोर्न ओलिंपिक में जब मिल्खा सिंह से एक खूबसूरत लड़की ने पूछा था कि इज़ ही रिलैक्सिंग तो मिल्खा ने जवाब दिया था, नो, ही इज़ मिल्खा।

लेकिन अब इस मजाक का कोई वजूद नहीं रह गया है। सालों से मिल्खा सिंह का नाम एक ऐसे भारतीय की कहानी के रूप में किंवदंतियों का हिस्सा् बन गया है, जो अपनी बदकिस्‍मती के कारण एक वैश्विक जीत हासिल करने से चूक गया था, उड़नपरी पी टी उषा की ही तरह, जो 1984 के एलए ओलिंपिक में महज़ 0.1 सेकंड से कांस्य पदक चूक गई थीं, या फिल्म मदर इंडिया की तरह, जो महज़ एक वोट से ऑस्कर की दौड़ में पिछड़ गई थी, या हमारे उन फुटबॉलरों की तरह, जो क्वावलिफाई करने के बावजूद 1950 में ब्राजील में हुए विश्व कप में शरीक नहीं हो सके थे।

यह फिल्म रोम ओलिंपिक तक पहुंचने की मिल्खा की उस कहानी को बयां करती है, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। साथ ही यह हमें बंटवारे की भयावह तस्वीरें भी दिखाती है और मिल्खा की जमीनी-आत्मविश्वास से भरी शख्सियत के चलते हमारा मन भी बहलाती है।

इसमें कोई शक नहीं कि यह इस साल की सबसे बहुप्रतीक्षित फिल्मों में से एक थी और लोगों को इससे महानता से किसी भी तरह की कमतरी की उम्मीद नहीं थी। तो क्या चूक हमसे ही हुई है? क्या यह हमारी ही भूल है कि हम किसी फिल्म से इतनी ज्यादा उम्मीदें पाल लेते हैं? लेकिन क्या हमारे साथ ऐसा बार-बार नहीं होता?

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