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MOVIE REVIEW: BOMBAY TALKIES

सौवीं सालगिरह पर एक बेहतरीन भेंट

Dainik Bhaskar

May 03, 2013, 10:53 AM IST
movie review: bombay talkies

सौवीं सालगिरह पर एक बेहतरीन भेंट

मेरा खयाल है कि इलाहाबाद के सभी लोगों को कहीं न कहीं अमिताभ बच्‍चन के बारे में यह लगता है कि वे उनके ‘घर के आदमी’ हैं। अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म का मुख्‍य चरित्र भी यहां ऐसा ही सोचता है। एक पीढ़ी पहले बिहारी शत्रुघ्‍न सिन्‍हा के बारे में इसी तरह से महसूस करते थे।

शायद यह दर्शकों के लिए स्‍वाभाविक ही है कि वे स्‍क्रीन पर बार-बार देखे गए चेहरों से एक खास किस्‍म का रिश्‍ता बना लें। एक समय के बाद उन्‍हें यह भी लगने लगता है कि परदे पर नजर आने वाले चेहरे भी उन्‍हें देख सकते हैं और यह एक किस्‍म का आपसी रिश्‍ता है। ऐसे में यदि सितारे में दर्शकों से मिलती-जुलती कोई बात हो तो और मदद मिलती है। विजुअल मीडियम की यही ताकत है। भारत के मुख्‍यधारा के फिल्‍मकार हमेशा इसके प्रति सजग रहे हैं और इससे हम बॉलीवुड के स्‍टार-सिस्‍टम को भी समझ सकते हैं।

हमारे बड़े कलाकारों के घर - जैसे जुहू में बच्‍चन का जलसा - सिटी लैंडमार्क की हैसियत रखते हैं और गेटवे ऑफ इंडिया को भी उससे रश्‍क होता होगा। उनकी हेयर स्‍टाइल और कपड़े पब्लिक फैशन बन जाते हैं। उनके घर के सामने लगने वाली भीड़ की तादाद उनकी लोकप्रियता का पैमाना होती है। अगर निर्माताओं के नज़रिये से सोचें तो यदि दर्शकों ने किसी कारणवश किसी सितारे से अपने को जोड़ लिया है, तो उसे लेकर फिल्‍म बनाने का मतलब है, करोड़ों में खेलना।

चार लघु फिल्‍मों के इस संकलन में से एक (निर्देशक दिबाकर बनर्जी) ऐसी ही एक ब्‍लॉकबस्‍टर फिल्‍म के निर्माण के बारे में है, जिसका शीर्षक ‘टशन 2, सौ करोड़’ है। इस लघु फिल्‍म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक ऐसे व्‍यक्ति की भूमिका निभाई है, जो कौतूहलवश इस फिल्‍म की शूटिंग को देख रहा है। बन रही फिल्‍म के हीरो रनबीर कपूर हैं। हमें रनबीर का चेहरा तो नहीं नजर आता, लेकिन हम लोगों की उस बे-चेहरा भीड़ को जरूर देख सकते हैं, जिन्‍हें देखकर हम तुरंत समझ जाते हैं कि फिल्‍म सितारे क्‍यों दर्शकों को रोमांचित करते हैं। अभिनय और कहानी की किसे फिक्र है, बड़े परदे पर इन सितारों की मौजूदगी ही काफी है।

गौरतलब है कि करण जौहर की लघु फिल्‍म किसी लार्जर-दैन-लाइफ पुरुष सितारे पर केंद्रित नहीं है, बल्कि वह एक ऊबे हुए पति और एक उत्‍साही पत्‍नी के संबंधों की कहानी है। जोया अख्‍तर की फिल्‍म दो प्‍यारे छोटे भाई-बहनों के बारे में है। वास्‍तव में जोया की फिल्‍म जौहर की फिल्‍म की प्रीक्‍वेल हो सकती थी और उसे उसके पहले दिखाया जाना था।

वैसे आधे घंटे की फिल्‍मों की समीक्षा कर पाना कठिन होता है, क्‍योंकि तब उनके मूल कथानक पर बात करने से भी इस बात की आशंका बनी रहती है कि हम दर्शकों का मजा किरकिरा कर देंगे। लिहाजा, इतना भर कहना पर्याप्‍त होगा कि जोया और करण दोनों की फिल्‍में एक ही थीम पर हैं और जहां करण की फिल्‍म गुस्‍से से भरी हुई है, वहीं जोया की फिल्‍म अलसभोर के खट्टे-मीठे सपने की तरह है।

जैसा कि आप जानते ही होंगे, बॉम्‍बे टॉकीज चार लघु फिल्‍मों का संकलन है, जिसे भारतीय सिनेमा के सौ साल पूरे होने के अवसर पर निर्मित किया गया है। 3 मई इस फिल्‍म की रिलीज की तारीख है और इसी दिन सौ साल पहले दादासाहब फाल्‍के की ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ रिलीज हुई थी, जिसे भारत की पहली फिल्‍म माना जाता है।

हालांकि ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ का प्रीमियर 21 अप्रैल को हो गया था। इस तरह की आदरांजलि के लिए लघु फिल्‍में ही उपयुक्‍त हैं, क्‍योंकि सिनेमा की शुरुआत इसी तरह हुई थी। ‘राजा हरिश्‍चंद्र’ भी 3700 फीट लंबी फिल्‍म थी, जिसकी समयावधि 40 मिनट की थी। वैसे भी अगर हम आने वाले समय को देखें तो मुझे लगता है कि लंबी फीचर फिल्‍मों की जगह लघु फिल्‍में ले सकती हैं।

बहरहाल, इन लघु फिल्‍मों में से कोई भी नैरेटिव, संरचना, कथावस्‍तु इत्‍यादि को लेकर कोई नया प्रयोग नहीं करती, जैसा कि आमतौर पर लघु फिल्‍मों में देखा जाता है। ऐसा स्‍वाभाविक भी है। इसका अहम कारण यह है कि दर्शक इसलिए इन फिल्‍मों को देखने आएंगे, क्‍योंकि उन्‍होंने पहले भी इन फिल्‍मकारों की फिल्‍मों को पसंद किया है।

ये फिल्‍मकार अपने आप में सितारों की हैसियत रखते हैं। मैंने गौर किया है कि फिल्‍में देखने वाले जिस तरह से कहते हैं कि वे आमिर, अक्षय, सलमान की फिल्‍में देखने जा रहे हैं, उसी तरह वे अब यह भी कहने लगे हैं कि वे करण, जोया, दिबाकर, अनुराग की फिल्‍में देखने जा रहे हैं। यही बात रामू, विशाल, इम्तियाज जैसे फिल्‍मकारों पर भी लागू होती है। मुझे लगता है पिछले पंद्रह सालों में यह बॉलीवुड में आया सबसे बड़ा बदलाव है।

वैसे इन चारों फिल्‍मों की आपस में तुलना करना ज्‍यादती ही होगी, क्‍योंकि उनकी मूलभूत मंशा एक जैसी नहीं है। लेकिन करण की फिल्‍म इनमें सर्वाधिक प्रायोगिक है और इसीलिए वह सबसे ज्‍यादा चौंकाती है। जोया की फिल्‍म आत्‍मीय है, दिबाकर की प्रेरक है और अनुराग की फिल्‍म इनमें से सबसे ज्‍यादा फिल्‍मी है।

जो चीज इन फिल्‍मों को आपस में जोड़ती है, वह है एक छोर पर भ्रम और पलायन और दूसरे छोर पर वे छोटे-मोटे रिश्‍ते, जो सिनेमा हमारे भीतर रचता है। जोया की फिल्‍म का छोटा बच्‍चा कैटरीना कैफ के प्रति अपने आकर्षण से जिंदगी के सबक सीखता है। करण की फिल्‍म का नीरस पति पुराने हिंदी गीतों की वजह से अपनी पत्‍नी के एक युवा साथी से जुड़ाव महसूस करता है।

दूसरी तरफ, दिबाकर और अनुराग की फिल्‍में हमें बताती हैं कि सिनेमा किस तरह लोगों के लिए एक नशे की तरह है, लेकिन मजे की बात है कि यह नशा उनकी सेहत को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। बीसवीं सदी के लगभग पूरे कालखंड में हमारी कल्‍पनाओं की दुनिया पर राज करने वाले सिनेमा के लिए यह एक अच्‍छी आदरांजलि है।

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