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'चश्मे बद्दूर'

बॉलीवुड के अज्ञात सूत्रों की बातों पर यकीन किया जाये तो ऑरिजनल चश्मे बद्दूर की निर्देशक सई परांजपे कुछ महीनों से काफी नाराज हैं।

Dainik Bhaskar

Apr 05, 2013, 09:49 AM IST
movie review: chashme baddur

यदि अपुष्‍ट सूत्रों से मिल रही खबरों पर विश्‍वास करें तो कथा और स्‍पर्श जैसी फिल्‍मों की निर्देशिका सई परांजपे, जिन्‍होंने वर्ष 1981 में ओरिजिनल चश्‍मे बद्दूर बनाई थे, पिछले कुछ महीनों से इस फिल्‍म को लेकर बेहद हैरान-परेशान थीं। इसलिए नहीं कि उनकी फिल्‍म की रीमेक बनाई जा रही है (क्‍योंकि इस बात से तो वास्‍तव में किसी भी निर्देशक को गौरव का अनुभव होना चाहिए), बल्कि इसलिए कि रीमेक डेविड धवन बना रहे हैं।

यदि हम डेविड धवन की पिछली फिल्‍म रास्‍कल्‍स (जो कि किसी लिहाज से फिल्‍म नहीं थी) और उससे पहले वाली फिल्‍म डु नाट डिस्‍टर्ब (जो रिव्‍यू करने के भी लायक नहीं थी) को भी गिनें तो यह एक निर्देशक के रूप में धवन की 41वीं फिल्‍म है। धवन पुणे के फिल्‍म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से फिल्‍म एडिटिंग में गोल्‍ड मेडलिस्‍ट हैं और उनके खाते में आंखें, शोला और शबनम और हसीना मान जाएगी जैसी कुछ बेहद मनोरंजक फिल्‍में हैं।

सुश्री परांजपे कहती हैं (या उनके निकटस्‍थ सूत्रों के हवाले से हमें पता चलता है) कि हीरो नंबर वन, कुली नंबर वन जैसी बकवास फिल्‍में बनाने वाले धवन को उनके द्वारा इतनी मेहनत से बनाई गई फिल्‍म के साथ छेड़खानी करने का कोई हक नहीं है। जब मैंने यह खबर पढ़ी थी तो मुझे लगा था कि वे ज्‍यादती कर रही हैं और थोड़ा-बहुत दंभ भी दिखा रही हैं।

लेकिन जब मैंने यह फिल्‍म देखी, तो मैं सोचने लगा कि सुश्री परांजपे ने फिल्‍मकार पर मानहानि का मुकदमा क्‍यों नहीं ठोक दिया! यदि कोई कलाकृति वास्‍तव में ही कलाकार की संतान जैसी होती है, तो किसी कलाकृति के साथ इस तरह का सलूक करना वास्‍तव में उसकी संतान के साथ बदसलूकी करना ही माना जाएगा, और वह भी 130 मिनटों तक लगातार।

इस फिल्‍म के निर्माण से इतने सारे लोग जुड़े हैं और उनमें से कई प्रतिभाशाली अभिनेता भी हैं, लेकिन इसके बावजूद वे शायद पैसों के लिए इस शर्मनाक कृति का हिस्‍सा बनने को राजी हो गए। इससे हमें दो बातें पता चलती हैं। या तो भारत का मनोरंजन उद्योग बहुत बुरी हालत में है या इस फिल्‍म के कलाकारों ने स्‍क्रीनप्‍ले पढ़ने की ही जेहमत नहीं उठाई, क्‍योंकि उन्‍हें पता था कि यह फिल्‍म किस बारे में है। आखिर यह एक ऑफिशियल रीमेक जो है।

फिल्‍म में तीन दोस्‍तों की कहानी बताई गई है, जिनमें से एक भला लड़का है (अली जाफर। मूल फिल्‍म में यह भूमिका फारूक शेख ने निभाई थी), जबकि बाकी दो नाकारा और फूहड़ किस्‍म के लड़के हैं (सिद्धार्थ और दिव्‍येंदु शर्मा। मूल फिल्‍म में ये भूमिकाएं रवि वासवानी और राकेश बेदी ने निभाई थीं)। इन दोनों को एक ही लड़की (तापसी पन्‍नु, जो दीप्ति नवल वाला रोल निभा रही हैं) से प्‍यार हो जाता है। नाकारा लड़कों का प्रेम प्रस्‍ताव फौरन रद्द कर दिया जाता है, लेकिन वे ऐसा दिखावा करते हैं कि वास्‍तव में उन्‍होंने उस खूबसूरत लड़की को पटा लिया है। आखिरकार भले लड़के को ही खूबसूरत लड़की मिलती है और दोनों नाकारा दोस्‍त इस बात को बर्दाश्‍त नहीं कर पाते।

यह कहानी हर इंसान की जिंदगी के उस दौर की दास्‍तान सुनाती है, जब कॉलेज खत्‍म हो जाते हैं और यथार्थ के थपेड़े अभी शुरू नहीं हुए होते हैं। हम इस तरह की कहानियों और किरदारों से सीधा लगाव महसूस करते हैं। लेकिन इस कहानी को कितने खराब तरीके से सुनाया जा सकता है, इसकी एक मिसाल यह फिल्‍म है।

लिहाजा, इस कहानी की कल्‍पना गोवा में करें, जहां कुछ मंदबुद्धि दोस्‍त हैं, जिनका अपने अतीत के दिनों से कोई वास्‍ता नहीं है और न ही जिन्‍हें अपने आने वाले कल की कुछ खबर है। इसके बावजूद हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि वे मौज-मस्‍ती करेंगे, लेकिन वे तो केवल चीखते-चिल्‍लाते ही रहते हैं, मानो किसी ने उन्‍हें ऐसा करने का हुक्‍म दिया हो।

लड़की के पिता (अनुपम खेर) कभी फौज में हुआ करते थे और वे चाहते हैं कि उनकी बेटी की शादी किसी मिलेट्री मैन से ही हो। जबकि लड़की के अंकल, जो कि उसके पिता के जुड़वा भाई हैं, चाहते हैं कि लड़की की शादी किसी सिविलियन से हो। चूंकि तीनों दोस्‍तों की अपनी कोई भी शख्सियत नहीं है, ताकि कहानी में हमारी दिलचस्‍पी पैदा हो, लिहाजा फिल्‍म में जोसेफ और जोसेफाइन (ऋषि कपूर, लि‍लेत्‍ते दुबे) नामक एक जोड़े को जबरन ठूंस दिया जाता है, ताकि बूढ़े-बुजुर्गों का रोमांस भी दिखाया जा सके।

हमारी समझबूझ के साथ खिलवाड़ ‘वॉट इज़ योर मोबाइल नंबर’, ‘तू तू तू तू तू तारा’ जैसे गीतों के साथ शुरू होता है और आखिर फैंसी ड्रेस परेड में शामिल सभी कलाकार अपने आपको एक जेल में पाते हैं, जहां पुलिस मौलवी का वेश धरे एक व्‍यक्ति की शिनाख्‍त आतंकवादी के रूप में करती है।

क्‍या उस 32 साल पुरानी क्‍लासिक फिल्‍म का यह नया संस्‍करण उसमें केवल इतना ही योगदान दे पाता है? नहीं, लचर और फूहड़ द्विअर्थी संवादों की दास्‍तान अभी बाकी है और ‘की गल है, गर्ल है?’, ‘चाहे मर हम जाएं, मरहम लगाके ही जाएंगे’, ‘शब्‍बा खैर, अनुपम खेर, कैलाश खेर, आई डोंट केयर’ जैसे जुमले फिल्‍म में जारी रहते हैं।

यह हमें सुन्‍न कर देने वाली ऐसी कॉमेडी है, जिसे देखते समय हम यह सोचने लग जाते हैं कि आपकी बगल की सीट में बैठा जो व्‍यक्ति हंस रहा है, उसकी बुद्धिमत्‍ता का हम क्‍या आकलन करें। लेकिन मैं यह आकलन नहीं करता और अपने फोन में व्‍यस्‍त हो जाता हूं।

फिल्‍म में फूहड़ संवादों का दौर जारी रहता है : ‘कमरे में, मतलब कैमरा में कैद हो जाओ’, ‘यदि आप लड़की को नहीं बदल सकते तो लड़की को ही बदल दो’, ‘लव एज को नहीं, केवल करेज, बॉन्‍डेज, क्‍लीवेज, मैरेज को देखता है…’ लेकिन एक सीमा के बाद जब फिल्‍म के लेखक के संवादों का पिटारा खाली हो जाता है तो शायद वह अपनी डेस्‍क पर रखी उद्धरणों की किसी किताब से माए वेस्‍ट की यह पंक्ति उड़ा लेता है कि ‘जब मैं अच्‍छा होता हूं तो बहुत अच्‍छा होता हूं, लेकिन जब मैं बुरा होता हूं, तब मैं बेहतर होता हूं।’ निश्चित ही, आप बेहतर हो सकते हैं।

शायद यहां इस प्रसंग का उल्‍लेख करने का कोई मतलब नहीं हो, लेकिन एफटीआईआई में बिताए अपने दिनों को याद करते हुए डेविड धवन ने इस फिल्‍म की रिलीज से पहले टाइम्‍स ऑफ इंडिया को दिए एक इंटरव्‍यू में कहा था : ‘मैंने रित्विक घटक की बांग्‍ला फिल्‍म ‘मेघे ढाका तारा’ देखी तो मुझे लगा कि फिल्‍ममेकिंग में हम कुछ नहीं से भी बहुत कुछ बना सकते हैं।’ लेकिन धवन की यह फिल्‍म देखने के बाद लगता है कि बहुत कुछ में से कुछ नहीं भी बनाया जा सकता है। आह। सुश्री परांजपे, आपको पूरा हक है कि आपकी कृति के साथ की गई इस गुस्‍ताखी के लिए आपसे माफी मांगी जाए।

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