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'एक थी डायन'

इस फिल्‍म की डायन का नाम डायना है। लगता है कि दो प्‍यारे बच्‍चों के पिता (पवन मलहोत्रा) का दिल इस डायन पर आ गया है।

Dainik Bhaskar

Apr 19, 2013, 01:37 PM IST
movie review: ek thi daayan

इस फिल्‍म की डायन का नाम डायना है। लगता है कि दो प्‍यारे बच्‍चों के पिता (पवन मलहोत्रा) का दिल इस डायन पर आ गया है। यकीनन, यह अच्‍छी बात नहीं है और इससे बचा जाना चाहिए। वास्‍तव में सभी सुपरनेचुरल फिल्‍में उन लापरवाह नास्तिकों से ही शुरू होती है, जिन्‍हें जल्‍द ही दूसरी दुनिया की हकीकतों के बारे में पता चल जाता है।

इस पिता का बेटा बड़ा होकर जादूगर बन जाता है। निश्चित ही, उसकी मैजिक ट्रिक्‍स के पीछे उसकी कला और हुनर है, लेकिन उसे डायनों और पिशाचों के बारे में भी कुछ-कुछ पता है, क्‍योंकि वह बचपन से ही इस बारे में पढ़ता आ रहा था।

अधिकतर भारतीयों ने डायनों के बारे में सुना होगा। अक्‍सर गांवों से किन्‍हीं सामान्‍य महिलाओं को डायन बताए जाने की खबरें आती हैं। उनके बारे में कहा जाता है कि वे अपने परिवार के लिए बदनसीब साबित हुई हैं (खा गई पति को!) या वह मृतात्‍माओं के संपर्क में है।

वास्‍तव में शैक्षिक रूप से पिछड़े इलाकों में जागरूकता की कमी होती है, इसलिए सीजोफ्रेनिया या अन्‍य मनोरोगों से ग्रस्‍त लोगों को भी बुरी आत्‍माओं के शिकार बता दिया जाता है।

लेकिन इस फिल्‍म की डायन सचमुच की डायन नजर आती है। उसका जन्‍म 29 फरवरी को हुआ था, यानी वह अपना बर्थ-डे सुपरमैन और पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के साथ शेयर करती है। वह आधी रात से सुबह चार बजे तक काम करती है और उसकी शक्तियां उसके लंबे बालों में हैं, जिन्‍हें वह चो‍टी में गूंथकर रखती है।

वह रात की रानी है, और इसलिए वह पिशाच का फीमेल वर्जन है, जो दिन का राजा होता है। मुझे पिशाचों के बारे में इतना ही पता है कि हनुमान चालीसा की इन पंक्तियों में उनका उल्‍लेख किया गया है – भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे।

दुनिया भर की धर्म-परंपराओं में भूत-पिशाचों के बारे में विस्‍तार से बातें की गई हैं और उन्‍हें भगवान के विपरीत यानी बुराई की ताकतों का प्रतिनिधि माना जाता है। लेकिन इस फिल्‍म की कोई धार्मिक पृष्‍ठभूमि नहीं है और यही बात इसे एक अनूठी फिल्‍म बना देती है।

जादूगर बोबो (इमरान हाशमी) एक आम आदमी ही जान पड़ता है। उसकी गर्लफ्रेंड (हुमा कुरैशी) भी नॉर्मल ही है। वे दोनों अनाथालय में रहने वाले एक छोटे-से बच्‍चे की देखभाल करते हैं। वे हमारी फिल्‍मों के आम हीरो-हीरोइनों जैसे नहीं हैं। वे शहरी युवा हैं, जो यौन संबंध बनाते हैं, नए दोस्‍तों से मिलते हैं, कॉफी शॉप पर समय बिताते हैं, घर पर पार्टी मनाते हैं और गुलजार के गीतों को गुनगुनाते हैं। वास्‍तव में जो हॉरर फिल्‍म हकीकत के ज्‍यादा करीब जाती है, वह और डरावनी लगती है। इस फिल्‍म की डायन हमारे रोंगटे खड़े कर सकती है, क्‍योंकि वह हममें से ही कोई एक हो सकती है। यह भूमिका कोंकणा सेन शर्मा ने निभाई है और उनका पहला शॉट देखकर ही हम यह समझ जाते हैं कि पिछले दिनों हमने उन्‍हें फिल्‍मों में कितना मिस किया है।

एकता कपूर इस फिल्‍म की सहनिर्मात्री हैं, जो हैरत की बात नहीं है। एकता की पहचान उन टीवी धारावाहिकों से बनी है, जिनमें भारी मेकअप किए हुए और माथे पर बड़ी-सी बिंदी लगाए हुए कोई डरावनी-सी महिला एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियों को ग्रहण लगा देती है और उसे घर की डायन कहा जा सकता है। वैसे, एकता कपूर ने फिल्‍म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश ‘कुछ तो है’ और ‘कृष्‍णा कॉटेज’ जैसी हॉरर फिल्‍मों से ही किया था।

विशाल भारद्वाज भी फिल्‍म के सहनिर्माता हैं और उन्‍होंने फिल्‍म का स्‍क्रीनप्‍ले और संवाद लिखने के अलावा उसमें संगीत भी दिया है। यह भी कोई अचरज की बात नहीं है। एक निर्देशक के रूप में भारद्वाज की पहली फिल्‍म ‘मकड़ी’ (2002) दो जुड़वां बच्‍चों की कहानी थी, जो डायन के चंगुल में फंस जाते हैं। ओके, वह डायन नहीं, चुड़ैल थी, लेकिन वह कुछ-कुछ डायन जैसी ही होती है। वह फिल्‍म नास्तिकों के लिए बनाई गई थी, क्‍योंकि ‘सौ साल की भूखी’ चुड़ैल (यह कमाल की भूमिका शबाना आजमी ने निभाई थी) आखिरकार एक ठग साबित होती है। लेकिन यह फिल्‍म भूत में विश्‍वास करने वालों के लिए है।

इसके बारे में मुझे जो बात सबसे दिलचस्‍प लगी, वह यह है कि इस फिल्‍म के सह-लेखक मुकुल शर्मा, जिनके उपन्‍यास पर यह फिल्‍म आधारित है, भारत के सबसे लोकप्रिय मैथ्‍स-साइंस कॉलमिस्‍ट हुआ करते थे। मेरे जैसे अनेक लोगों को संडे टाइम्‍स ऑफ इंडिया में छपने वाला उनका साप्‍ताहिक कॉलम ‘माइंडस्‍पोर्ट’ याद होगा। और ‘एक थी डायन’ के स्‍क्रीनप्‍ले को भी भारतीय हॉरर फिल्‍मों के सर्वश्रेष्‍ठ स्‍क्रीनप्‍ले में से एक माना जा सकता है।

फिल्‍म हमें बांधकर रखती है। आप उम्‍मीद करते रहते हैं कि फिल्‍म में और भी डरावने लम्‍हे आएंगे, जो आपको सांसें थामकर बैठने को मजबूर कर देंगे। यह फिल्‍म अधिकांश मौकों पर ऐसा ही कर दिखाती है और जब ऐसा होता है, तब हम समझ जाते हैं कि हम बेहद डर चुके हैं।

जब मैं यह फिल्‍म देख रहा था, तब थिएटर में मुझसे आगे दो बातूनी लड़के बैठे थे और उनकी नॉन-स्‍टॉप चपर-चपर मुझे परेशान कर रही थी। लेकिन थोड़ी देर बाद जैसे उन्‍हें सांप सूंघ जाता है।

एकबारगी तो मुझे ऐसा लगा कि क्‍यों न आगे झुककर ‘बू’ करके उन्‍हें डरा दिया जाए। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया, क्‍योंकि मुझे पूरा यकीन था कि यदि मैं ऐसा करता तो वे या तो अपनी सीट से नीचे गिर जाते या उन्‍हें हार्ट अटैक आ जाता या फिर वे मुझे ही थिएटर से निकाल बाहर करवा देते।

यही वे लम्‍हे हैं, जब सिनेमाघर के अंधेरे में हमें पता चल जाता है कि कोई हॉरर फिल्‍म हम पर अपना काला जादू चलाने में कामयाब हो पा रही है या नहीं।

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