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MOVIE REVIEW: GIPPI / MOVIE REVIEW: GIPPI

Mayank Shekhar

May 11, 2013, 09:44 AM IST

गिप्‍पी करे आपको हैप्‍पी!

movie review: gippi
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यदि आप किसी जुझारू डेंटिस्‍ट की तरह करण जौहर की फिल्‍म 'स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर' के स्क्रिप्‍ट रीडिंग सेशन में बैठते और उसकी कहानी में मौजूद सभी कैविटीज को भरने की ठान लेते, उसमें थोड़ा-सा तर्क, हकीकत और मुलायमियत जोड़ देते और उस पर चढ़ा हुआ चमकदार मुलम्‍मा साफ कर देते, तो शायद जो नतीजा रहता, वह इस फिल्‍म जैसा ही होता।

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्‍योंकि चंद माह के अंतराल में रिलीज़ हुई इन दोनों फिल्‍मों के निर्माता और प्रदर्शनकर्ता जौहर ही हैं और ये दोनों फिल्‍में इंट्रा-स्‍कूल ड्रामा की तरह हैं। ये फिल्‍में बच्‍चों की उम्र के उस असुरक्षा भरे दौर के बारे में हैं, जब उनके लिए अपने बारे में अपने दोस्‍तों की राय बहुत मायने रखती है और इसी के चलते वे आपसी प्रतिस्‍पर्द्धाओं में शरीक हो जाते हैं।

लेकिन यह फिल्‍म अपनी विधा और सामग्री में 'स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर' के उसी तरह करीब है, जैसे हृषिकेश मुखर्जी की गोलमाल और रोहित शेट्टी की 'बोल बच्‍चन' एक-दूसरे के करीब थीं। माना जा सकता है, तब तो इन फिल्‍मों में काफी नजदीक होगी, क्‍योंकि 'गोलमाल' और 'बोल बच्‍चन' दोनों ही कॉमेडी फिल्‍में थीं और उनकी कहानी भी एक जैसी थी। लेकिन इसके बावजूद इन दोनों को एक जैसा मानना पूरी तरह गलत ही होगा, क्‍योंकि उनके इरादे एक-दूसरे से इतने जुदा हैं कि इस स्‍तर पर ये दोनों फिल्‍में एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्‍न मालूम होने लगती हैं।

गिप्‍पी गुरप्रीत का शॉर्ट फॉर्म है। तब तो उसकी बेस्‍ट फ्रेंड को ग्रम्‍पी (तुनकमिजाज़) कहा जाना चाहिए। दोनों ही अपने आसपास के लोगों में ज्‍यादा घुलती-मिलती नहीं हैं और एक-दूसरे के साथ ही रहना पसंद करती हैं। अमूमन वे किसी कोने में बैठी रहती हैं और अपनी छोटी-मोटी खट्टी-मीठी बातों को शेयर करती रहती हैं। ये आत्‍मविश्‍वास की कमी का पहला सबूत है और यह चीज अच्‍छे-अच्‍छों को तकलीफ में डाल सकती है।

गिप्‍पी अच्‍छी लड़की है, हालांकि उससे कभी-कभार कुछ भूलें हो जाती हैं। वह इमोशनली इंटेलीजेंट और भली-प्‍यारी है। वह थोड़ी गोलमटोल जरूर है और निश्चित ही इस बात की संभावना कम है कि बेस्‍ट लुकिंग लड़के उसकी ओर आकर्षित होंगे।

पढ़ाई और खेल-कूद में उसने कोई तीर नहीं मारे हैं और इसलिए अपने बारे में उसकी धारणा, जो इस उम्र में आमतौर पर स्‍कूल के रिपोर्ट कार्ड या अन्‍य व्‍यक्तियों की आपके बारे में सोच के आधार पर बनती है, यह है कि वह यदि एक लूज़र नहीं (हालांकि, एक बार तैश में आकर वह खुद को लूज़र भी कह बैठती है) तो एक औसत लड़की जरूर है। उसका स्‍कूल हमें अपने स्‍कूलों की याद दिलाता है। उसके सहपाठी उसे इस बात के लिए उकसाते हैं कि वह उम्र में अपने से बड़े लड़कों से दोस्‍ती करे। अपने हमउम्र लड़कों की बेवकूफियों को वह बर्दाश्‍त नहीं कर सकती। इस उम्र की अनेक लड़कियों की यही कहानी होती है।

यह एक बेहद आत्‍मीय कहानी है, जिसे सोनम नायर ने बहुत अच्‍छे-से लिखा और निर्देशित किया है। लेकिन फिल्‍म की मुख्‍य कलाकार रिया विज ने तो इसमें जान ही डाल दी है। वे खुद चौदह-पंद्रह साल की होंगी और कैमरा पूरे समय उनके इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। कभी-कभी तो वह उनके चेहरे को 30 गुना बड़े क्‍लोज़अप में दिखाता है, लेकिन वे कभी कैमरे के प्रति कांशस नहीं होतीं और एक भी गलत एक्‍सप्रेशन नहीं देतीं। इसकी तुलना उनके पिता की संक्षिप्‍त भूमिका निभाने वाले व्‍यक्ति के नाटकीय अभिनय से करें और आपको फर्क पता चल जाएगा।

कुछ कलाकारों में जन्‍मजात अभिनय-प्रतिभा होती है। फिल्‍म में अच्‍छी मॉम की भूमिका दिव्‍या दत्‍ता ने निभाई है। ऐसा बहुत कम होता है कि दर्शक फिल्‍म के अंत में तालियां बजाकर उसका अभिवादन करें और प्रेस को दिखाई जा रही फिल्‍म के दौरान तो ऐसा होने की संभावना और कम होती है। लेकिन इसके बावजूद मुझे तालियां बजाने को मजबूर होना पड़ा। यह फिल्‍म अंत तक आते-आते हमें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देती है।

गिप्‍पी बड़ी होकर हिप्‍पी बन सकती है, लेकिन फिलहाल उसकी उम्र इतनी नहीं है। वह जैकी कॉलिन्‍स के नॉवल पढ़कर सेक्‍स के बारे में जानती है और डेल कार्नेगी की बेस्‍टसेलर पढ़कर उसे दोस्‍ती के बारे में पता चलता है। पता नहीं, वह टीवी पर क्‍या देखती होगी। यदि मैं उसकी जगह होता तो 'वंडर ईयर्स' या 'जो जीता वही सिकंदर' देख रहा होता।

वह शायद बेतुके रियलटी शोज के बाद कॉस्‍मेटिक्‍स के विज्ञापन देखती होगी, जबकि ये शोज खुद नौजवानों की बनाई गई किसी फिल्‍म के बाद दिखाए जाते होंगे, जिनमें लड़का-लड़की के माता-पिता बेहद अमीर होते होंगे और जो किसी काल्‍पनिक परीलोक में अपनी बीमर दौड़ाते होंगे। 'स्‍टूडेंट ऑफ द ईयर' हो सकती है! मुझे खुशी है कि करण जौहर की किसी फिल्‍म का तोड़ करण जौहर की ही एक अन्‍य फिल्‍म साबित हुई है। ऐसा ही होना भी चाहिए!

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