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'जॉली एलएलबी'

लॉ के लॉ लग गए!

Dainik Bhaskar

Mar 15, 2013, 01:24 PM IST
movie review: jolly llb

लॉ के लॉ लग गए!

कुछ हद तक जोनाथन लिन की फिल्‍म 'माय कजिन्‍स विन्‍नी' (1992) से प्रेरित यह फिल्‍म हमारी न्‍यायिक प्रणाली पर व्‍यंग्‍य करती है, ठीक वैसे ही, जैसे 'मुन्‍नाभाई एमबीबीएस' ने मेडिकल प्रोफेशन और 'लगे रहो मुन्‍नाभाई' ने रियल एस्‍टेट माफिया को आड़े हाथों लिया था।

अलबत्‍ता दर्शकों में यह उम्‍मीद जगाना गलत होगा कि यह फिल्‍म मुन्‍नाभाई श्रृंखला की इन दोनों फिल्‍मों की आधी जितनी भी मजेदार होगी। मैंने यहां उन फिल्‍मों का उल्‍लेख इसलिए किया, क्‍योंकि मुन्‍नाभाई फिल्‍मों के दो प्रमुख कलाकार यहां मौजूद हैं : अरशद वारसी और बोमन ईरानी।

बेहतरीन अदाकार बोमन इस फिल्‍म में एक बड़े वकील की भूमिका निभा रहे हैं, जिसका काम है कानून को तोड़-मरोड़ कर उसका अमीरों के फायदे में इस्‍तेमाल करना। उसका मौजूदा केस सुपर-रिच नंदा खानदान से जुड़ा है, जिसके साहबजादे ने नशे में गाड़ी चलाते हुए रात को फुटपाथ पर सो रहे लोगों को कुचल दिया था।

निश्चित ही, आप सभी ने दिल्‍ली के हिट-एंड-रन नंदा केस के बारे में भी सुना होगा। इस फिल्‍म में बोमन का किरदार वकील आरके आनंद से प्रेरित माना जा सकता है, लेकिन मुझे तो लगता है कि उन्‍होंने हाजिरजवाब राम जेठमलानी से प्रेरित होकर यह भूमिका निभाई है।

अरशद जॉली एलएलबी है। जॉली उसके नाम जगदीश त्‍यागी का शॉर्ट फॉर्म है। भारत में एलएलबी एक ऐसा पोस्‍ट-ग्रेजुएशन कोर्स होता है, जिसे आमतौर पर कॉलेज ड्रॉपआउट्स या दूसरे मास्‍टर्स कोर्सेस के लिए अपने को अनुपयुक्‍त महसूस करने वाले छात्र अपनाते हैं। इसीलिए एलएलबी को ‘लटक लटक के बीए’ पास भी कहा जाता है।

जॉली मेरठ से है। वह निश्चित ही ‘लटक लटक के’ टाइप का लुक्‍खा लॉ ग्रेजुएट है। वह अपील को एप्‍पल और प्रोसिक्‍यूशन को प्रोस्टिट्यूशन लिखता है।

दिल्‍ली की एक सेशन कोर्ट के बाहर उसकी छोटी-सी दुकान है। उसका कॅरियर संवरने की कोई उम्‍मीद नहीं है। आखिर वकील डॉक्‍टरों की तरह विज्ञापन नहीं दे सकते। या तो उन्‍हें उनकी अच्‍छी साख के कारण क्‍लाइंट मिलते हैं या स्‍थापित लॉ फर्म्‍स में काम करने के कारण। लेकिन इसके अलावा बड़े अखबारों में बार-बार नाम आने से भी उन्‍हें फायदा मिलता है और जॉली यह बात जानता है।

वह नंदा केस इसीलिए लेता है, ताकि न्‍यूज मीडिया वाले बार-बार उसका इंटरव्‍यू लेते रहें। निश्चित ही, देश में उस जैसे अनेक वकील हैं और हम उन्‍हें टीवी पेनल चर्चाओं में अक्‍सर देखते हैं। हिट-एंड-रन केस वास्‍तव में ओपन-एंड-शट केस है। बचाव पक्ष ने सभी सबूत नष्‍ट कर दिए हैं।

जॉली भी कोई हरिश्‍चंद्र नहीं है, जो सच्‍चाई के लिए शहीद हो जाए। कौन जानता है, शायद वह भी बहती गंगा में हाथ धोकर कुछ पैसा कमा लेना चाहे।

लेकिन इसके बावजूद मुकदमा तो लड़ना है ही। अचानक जॉली उन गवाहों को बुलाता है, जो उस दिन अदालत में आने ही नहीं वाले थे। दूसरे पक्ष का वकील हंस पड़ता है, मानो गवाहों को बुलाना किसी फिल्‍मी दृश्‍य का हिस्‍सा हो। वास्‍तव में, जो व्‍यक्ति कभी किसी भारतीय अदालत में नहीं गया हो, वह यह नहीं बता सकता कि बॉलीवुड में दिखाई जाने वाली अदालतों से वे कितनी अलग होती हैं।

लिहाजा इस फिल्‍म का एक बड़ा योगदान यह है कि वह दर्शकों को भारतीय निचली अदालतों की हकीकत से रूबरू कराती है। फिल्‍म देखकर हम समझ जाते हैं कि वास्‍तव में हमें और कानूनों की जरूरत नहीं है, बल्कि इसके बजाय जरूरत इस बात की है कि मौजूदा कानूनों पर अच्‍छे-से अमल किया जाए।

यह फिल्‍म एक साहसी विषय पर बनाई गई है। यह इसी से पता चलता है कि इससे पहले कभी कोई भारतीय फिल्‍म न्‍याय प्रणाली के इतने ब्‍योरों के साथ नहीं बनाई गई थी। हम भारतीय कानूनी प्रणाली की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन जजों के विरुद्ध बोलना खतरनाक साबित हो सकता है।

पत्रकारगण इस बात को अच्‍छे से जानते हैं। अदालत की अवमानना अपने आपमें एक गंभीर आरोप है। इस फिल्‍म में जज की भूमिका सौरभ शुक्‍ला ने निभाई है। वह कहता है- ‘कानून अंधा होता है, जज नहीं। जज को सब दिखता है।’ यह उसके लिए वाजिब बात है।

गीत-संगीत से सजी एक भावुक फिल्‍म और कोर्टरूम कॉमेडी, जो यथार्थवादी भी हो, के बीच एक बहुत बारीक़ लकीर होती है, जिस पर चलना बड़ा कठिन है। हम पाते हैं कि इस फिल्‍म में फिल्‍मकार इस बारीक़ लकीर पर चलने में दिक्‍कत महसूस करता है और इसीलिए कभी-कभी चूक जाता है। लेकिन आखिरकार वह संभलने में कामयाब होता है।

सुभाष कपूर की पिछली फिल्‍म ‘फंस गए रे ओबामा’ थी और वह अपहरण और फिरौती उद्योग की पृष्‍ठभूमि में अमेरिका के वित्‍तीय संकट का मखौल उड़ाने में कामयाब रही थी।

वास्‍तव में सुभाष कपूर उस स्‍कूल के फिल्‍मकार हैं, जिसके प्रिंसिपल फिलहाल राजकुमार हीरानी हैं। मैंने सुना है कि कपूर के समक्ष मुन्‍नाभाई श्रृंखला की तीसरी फिल्‍म के निर्देशन का प्रस्‍ताव भी रखा गया है। यदि ऐसा होता है तो वह देखने लायक फिल्‍म होगी। खैर, देखने लायक फिल्‍म तो यह भी है।

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