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जुरैसिक पार्क 3D

इस फिल्‍म में सर रिचर्ड एटेनबोरो (जिन्‍हें पूरा देश गांधी फिल्‍म के निर्देशक के रूप में जानता है) ने एक मल्‍टीबिलियनेअर जॉन हैमंड की भूमिका निभाई है।

Dainik Bhaskar

Apr 06, 2013, 09:37 AM IST
movie review: jurassic park

इस फिल्‍म में सर रिचर्ड एटेनबोरो (जिन्‍हें पूरा देश गांधी फिल्‍म के निर्देशक के रूप में जानता है) ने एक मल्‍टी बिलिनेअर जॉन हैमंड की भूमिका निभाई है। उन्‍होंने जेनेटिक म्‍यूटेशन की एक अहम शोध परियोजना में पैसा लगाया है, ताकि धरती से विलुप्‍त हो चुके डायनासोरों को वापस लौटाया जा सके और फिर उस एम्‍यूज़मेंट पार्क से मुनाफा कमाया जाए, जहां लाखों की तादाद में लोग इन विलुप्‍त दैत्‍याकार जीवों को जीते-जागते देखने के लिए उमड़ पड़ेंगे और दांतों तले उंगुलियां दबा लेंगे। जुरैसिक पार्क का यही आगाज है।

इस फिल्‍म में जॉन हैमंड जो करना चाहते हैं, और यह फिल्‍म बनाते समय निर्देशक के मन में जो रहा होगा, उसके पीछे एक विडंबना है। इतने सालों बाद फिर से जुरैसिक पार्क को देखते समय यह बात हमारे जेहन में कौंधती है कि वास्‍तव में स्‍टीवन स्‍पीलबर्ग ही जॉन हैमंड हैं।

वर्ष 1993 में रिलीज होने के बाद से अब तक यह फिल्‍म करोड़ों के साम्राज्‍य में तब्‍दील हो चुकी है। फिल्‍म के चौथे भाग पर पहले ही काम शुरू हो चुका है। इस फिल्‍म के पोस्‍टर्स टी-शर्ट, कैप्‍स, और अन्‍य उत्‍पादों पर लगातार देखे जा सकते हैं, लेकिन इस सबकी शुरुआत इसी तरह हुई थी।

हैमंड तीन वैज्ञानिकों को निमंत्रित करते हैं कि वे उनके जुरैसिक पार्क का जायजा लें। सैम नील ने फिल्‍म में एक टॉप साइंटिस्‍ट की भूमिका निभाई है। अमीर उद्यमी चाहता है कि उसकी शोध परियोजना पर टॉप साइंटिस्‍ट की सहमति की मोहर लग जाए। हैमंड के डायनासोर धरती पर अवतरित हो चुके हैं।

पार्क को अभी तक पब्लिक के लिए खोला नहीं गया। प्रकृति के साथ इस तरह से छेड़छाड़ करने के कुछ गंभीर परिणाम हो सकते हैं, जिनके बारे में बात की जाती है। और मैं भी एक बेहतरीन फिल्‍म की निजी याद के साथ छेड़खानी नहीं करना चाहता।

लेकिन जब साइंटिस्‍ट पार्क का मुआयना करने आता है तो हर चीज गलत होती चली जाती है। डायनासोर इंसानों पर हमला बोल देते हैं। वाइल्‍डलाइफ सैंक्‍चुरी में दो बच्‍चे भी हैं। हम उनकी चिंता करते हैं, लेकिन हमें अपनी फिक्र भी होती है, क्‍योंकि हम एक अंधेरे थिएटर के भीतर होते हैं और वहां से बच निकलने के ज्‍यादा रास्‍ते नहीं होते। यह भीमकाय जंतु हमारे सामने अपना बड़ा-सा जबड़ा खोलता है तो लगता है जैसे वह हमें कच्‍चा चबा डालेगा।

और इसके बाद जो होता है, वह इतिहास के पन्‍नों पर दर्ज है। यह हॉलीवुड की पहली ऐसी फिल्‍म थी, जिसने अमेरिका से ज्‍यादा पैसा दुनिया भर में कमाया। भारत में भी ‘बड़ी छिपकली’ बहुत बड़ी कामयाबी साबित हुई थी। मुझे यह बताते हुए खुशी होती है कि इतना समय बीत जाने के बावजूद यह फिल्‍म आज भी तरोताजा है।

हालांकि, पहली बार इसे देखने पर हमें जिस रोमांच का अनुभव हुआ था, उसे तो फिर से दोहराया नहीं जा सकता, लेकिन यह फिल्‍म अब भी हमें हैरत में डाल देने में सक्षम है। फिल्‍म के सभी महत्‍वपूर्ण दृश्‍य उसके उत्‍तरार्ध में हैं। हमें झटका-सा लगता है, लेकिन इसका मोटे 3डी ग्‍लासेस से कोई वास्‍ता नहीं है। वे केवल हमारी नाक पर जरा-सा चुभते हैं, बस इतना ही।

यह फिल्‍म अब भी इसलिए प्रभावी लगती है, क्‍योंकि स्‍पीलबर्ग को भलीभांति पता है तनाव कैसे रचा जाए। इस फिल्‍म के साथ स्‍पीलबर्ग ने एक और काम यह किया था कि उन्‍होंने हॉलीवुड को सिल्‍वेस्‍टर स्‍टैलोन और अर्नाल्‍ड श्‍वार्जनेगर नुमा एक्‍शन फिल्‍मों से बचा लिया था। जुरैसिक पार्क के बाद अचानक सभी का ध्‍यान साइ-फाइ फिल्‍मों की ओर मुड़ गया था, जिनमें तकनीक ही सबसे अहम किरदार होती है।

जरा सोचें, जो लोग इस फिल्‍म के प्रदर्शन के समय जन्‍मे थे, वे दो साल पहले ही वयस्‍क हो चुके होंगे। शायद अगले साल तक वे मौज-मस्‍ती की उम्र भी पार कर चुके हों, या शायद वे पहली बार वोट भी डाल चुके हों। समय इसी तरह तेजी से गुजर जाता है, लेकिन बेहतरीन फिल्‍में अपना जादू बरकरार रखती हैं। वे बड़े परदे के लिए बनाई गई होती हैं और बड़ा परदा ही उनका आशियाना होता है। हमेशा।

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