--Advertisement--

MOVIE REVIEW: LOOTERA

'उड़ान' जैसी बेहतरीन फिल्म बनाकर समीक्षकों का दिल जीतने वाले निर्देशक विक्रमादित्य मोटवाने अब 'लुटेरा' लेकर आए हैं।

Dainik Bhaskar

Jul 04, 2013, 06:11 PM IST
movie review: lootera

यह एक भावुक और बेहद रूमानी फंतासी है। दुनिया जानती है कि बॉलीवुड अपने खास अंदाज में रूमानी फिल्‍में बनाता है और यही कारण है कि ट्रेजेडी किंग और क्‍वीन, किंग ऑफ रोमांस वग़ैरह जैसे मेलोड्रैमिक सुपर-सितारों के प्रशंसक इतनी बड़ी तादाद में होते हैं।

लेकिन यह फिल्‍म तो जैसे किसी अलग ही धरातल पर घटित होती है। हमेशा की तरह यहां दो प्रेमी हैं। हीरो की भूमिका एक ऐसे अभिनेता (रनवीर सिंह) ने निभाई है, जो ‘बैंड बाजा बारात’, ‘लेडीज वर्सेस विकी बहल’ जैसी यशराज फिल्‍मों में काम कर चुका है और हीरोइन की भूमिका एक ऐसी अभिनेत्री ने निभाई है, जो ‘सन ऑफ सरदार’, ‘दबंग’ और ‘दबंग 2’, ‘राउडी राठौर’ जैसी सौ करोड़ कमाने वाली फिल्‍मों के लिए जानी जाती हैं।

लेकिन इसके बावजूद यदि हम यह मानकर यह फिल्‍म देखते जाते हैं कि यह भी उन फिल्‍मों जैसी ही एक और फिल्‍म होगी तो यह बहुत बड़ी भूल होगी।

हिंदी फिल्‍मों की रोमांस कथाओं की जान होते हैं संगीत, नाच, गाने और लाजवाब सिनेमैटोग्राफ़ी और करियोग्राफ़ी। इनकी मदद से फिल्‍म की कमतरियों को बड़ी आसानी से छुपाया जा सकता है, जैसे कि ‘बर्फी’, जिसमें नाटकीयता की कमी थी, या ‘आशिकी 2’, जो मूलत: एक औसत फिल्‍म थी, या ‘रांझणा’, जिसकी कहानी बेहद अजीबोगरीब थी। लेकिन दर्शकों को इन कमतरियों से ज्‍यादा वास्‍ता नहीं रहता।

वे इस तरह की फिल्‍में देखकर थिएटर से बाहर निकलते हैं तो फिल्‍म में से अपना कोई पसंदीदा गीत गुनगुना रहे होते हैं और वे अमूमन परदे पर हीरो द्वारा की गई कारगुजारियों पर फिदा ही रहते हैं।

इस फिल्‍म में भी बेहतरीन संगीत है। कुछ बहुत प्‍यारे गाने हैं, लेकिन वे सभी बैकग्राउंड में बजते हैं। इससे फिल्‍म की लंबाई सीधे-सीधे आधा घंटा कम हो जाती है।

फिल्‍म में कैमरा अक्‍सर फ्रीज-फ्रेम कर देता है, बनिस्‍बत एक के बाद एक धड़ाधड़ दृश्‍यों की बौछार करने के। दर्शक लगभग पूरे समय कलाकारों पर नजरें गड़ाए रहते हैं, जबकि उम्‍मीद तो यह की जानी थी कि वे उनमें भी जज्‍बात जगाएंगे।

लेकिन वे मेलोड्रामा से उलट राह अख्तियार करते हैं, मद्धम आवाजों में बतियाते हैं, उनका अभिनय बेहद वास्‍तविक और संतुलित रहता है और उनकी देहभाषा इतनी संयत लगती है कि हम विश्‍वास ही नहीं कर पाते कि हम परदे पर रनवीर सिंह को देख रहे हैं, जो आमतौर पर बहुत शरारती किस्‍म की भूमिकाएं निभाते रहे हैं।

यदि यह फिल्‍म न होती तो हम कभी जान ही न पाते कि रनवीर की अदाकारी का एक आयाम यह भी है। लेकिन फिल्‍म का नाम ‘लुटेरा’ भले ही उनके किरदार के आधार पर रखा गया है, मेरा मानना है कि फिल्‍म का केंद्रीय चरित्र उसकी नायिका है।

एक परोपकारी बंगाली जमींदार की बेटी के रूप में सोनाक्षी सिन्‍हा का चयन इस फिल्‍म में बहुत समझदारीपूर्वक किया गया है। यह किरदार बेहद गहराई, बुद्धिमत्‍ता और प्‍यार करने की क्षमता से भरपूर है।

पुराने दौर की त्रासद रोमांस-कथाओं की ही तरह यह फिल्‍म दो मौसमों (पतझर और सर्दियां) और दो लोकेशंस (डलहौज़ी और ग्रामीण बंगाल) में बंटी हुई है और यह एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो नायिका का दिल चुरा लेता है, जबकि उसकी बुनियादी मंशा उसके बाप की दौलत लूटने की थी।

लड़की पहले लड़के से प्‍यार करती है और बाद में नफरत। मेरा मानना है कि प्‍यार का उलटा उपेक्षा होती है, नफरत नहीं, क्‍योंकि लड़की के दिल में गहराई में अब भी लड़के के लिए जगह है। फिल्‍म में किरदारों की भीड़ नहीं है, इससे कहानी में बेवजह की पेचीदगी नहीं निर्मित होती। लड़के के मां-बाप नहीं हैं।

लड़की का अपने बाप के सिवा और कोई नहीं है। अंत तक आते-आते हम नायक के लिए भी हमदर्दी रखने लगते हैं और यह उम्‍मीद करने लगते हैं कि वह नायिका को फिर से हासिल करने में कामयाब हो पाएगा। वह एक शातिर लुटेरा है, लेकिन इसके बावजूद एक बार भी ऐसा नहीं लगता कि वह लड़की के साथ प्‍यार का नाटक कर रहा था।

इन मायनों में यह फिल्‍म ‘टैलेंटेड मिस्‍टर रिप्‍ले’ या ‘मैचपॉइंट’ (जो कि एक ठग के बारे में हैं) और ‘द नोटबुक’ (जो सच्‍चे प्‍यार के बारे में है) का मिश्रण लगती है। हालांकि, यह उन तीनों फिल्‍मों से पूरी तरह अलग है। फिल्‍मकार ने ओ हेनरी की कहानी ‘द लास्‍ट लीफ’ को अपनी प्रेरणा स्‍वीकारा है, लेकिन वास्‍तव में ओ हेनरी की कहानी और इस फिल्‍म में बहुत कम समानताएं हैं।

फिल्‍म का कालखंड वर्ष 1953 है, जब देश को आजादी मिली ही थी, लेकिन खासतौर पर बंगाल में जमींदारी प्रथा अब भी जारी थी। इस पृष्‍ठभूमि में हम इस फिल्‍म में एक के बाद एक बेहतरीन दृश्‍यों और भावनात्‍मक स्थितियों से रूबरू होते जाते हैं। वैसे भी किसी भी अच्‍छी फिल्‍म की जान उसके ब्‍योरों में होती है।

निर्देशक विक्रमादित्‍य मोटवाने की यह दूसरी फिल्‍म है। आईएमडीबी डॉट कॉम पर उनके रेज्‍यूमे में दर्ज है कि वे ‘देव डी’ के पटकथा लेखक, ‘देवदास’ के साउंड डिजाइनर, ‘वाटर’ के करियोग्राफर, शॉर्ट फिल्‍म ‘शानु टैक्‍सी’ के एडिटर, सिनेमैटोग्राफ़र और ‘पांच’ के ‘डायरेक्‍टर ऑफ़ सॉन्‍ग’ हैं।

जाहिर है, इस शख्‍स ने शीर्ष तक अपना रास्‍ता बहुत मेहनत और लगन से तय किया है। बहुतेरे निर्देशक ऐसा नहीं करते। माध्‍यम पर उनकी पकड़ साफ दिखाई देती है। उनकी पहली फिल्‍म ‘उड़ान’ (2010) को व्‍यावसायिक सफलता भी मिली थी और उसे कान में भी दिखाया गया था।

1950 के दशक की ‘आवारा’, ‘दो बीघा जमीन’ जैसी फिल्‍मों को भी इसी तरह का दोहरा सम्‍मान हासिल हुआ था। उन फिल्‍मों में एक ठहराव हुआ करता था, भाषा के प्रति रुझान हुआ करता था और ख़ामोश लम्‍हे हुआ करते थे। इस फिल्‍म में भी यही सब है।

इस तरह की फिल्‍म बनाने के लिए साहस और साफ़ नज़रिये के साथ ही ख़ासे दम-गुर्दे की भी ज़रूरत होती है!

X
movie review: lootera
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..