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MOVIE REVIEW: मद्रास कैफ़े / MOVIE REVIEW: मद्रास कैफ़े

Mayank Shekhar

Aug 23, 2013, 11:25 AM IST

यह फिल्म फिक्शन पर आधारित है मगर यह याद दिलाती है उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की जिसके बारे में हमें कुछ भी नहीं पता था।

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निश्चित ही यह फिल्‍म एक फिक्‍शन है, लेकिन इसके बावजूद सचमुच में इसका मजा लेने का इकलौता तरीका यही है कि इसे हकीकत की तरह देखा जाए। इसे हमारे मौजूदा दौर की उन जरूरी, लेकिन दुर्भाग्‍यपूर्ण घटनाओं के फिल्‍मांकन के तौर पर देखा जाए, जिनके बारे में हम कुछ नहीं जानते।

हम केवल इतना ही जानते हैं कि वर्ष 1991 में एक महिला ने अपनी कमर पर बम बांधकर एक राजनीतिक रैली में हजारों लोगों की मौजूदगी में खुद को और अपने साथ ही एक ऐसे व्‍यक्ति को भी बम से उड़ा दिया था, जो जल्‍द ही भारत का प्रधानमंत्री चुना जाने वाला था।

हत्‍या की इस वारदात से पहले जिन तथ्‍यों को हमारे सामने प्रस्‍तुत किया जाता है, उन्‍हें देखकर हमें लगने लगता है कि शायद फिल्‍मकार ने किसी सेवानिवृत्‍त या मौजूदा रॉ एजेंट या वरिष्‍ठ नौकरशाह को इस फिल्‍म की कहानी लिखने में मदद करने का जिम्‍मा सौंप रखा होगा, जिसने हमें लिट्टे के बारे में वे जानकारियां दी हैं, जो अभी तक किसी को पता न थीं। गौरतलब है कि लिट्टे नामक तमिल अलगाववादी संगठन ने ही राजीव गांधी की हत्‍या की थी, जिन्‍हें इस फिल्‍म में पूर्व प्रधानमंत्री के नाम से संबोधित किया गया है।

लेकिन मुझे यकीन है कि इनमें से अनेक तथ्‍य सार्वजनिक दस्‍तावेजों में भी उपलब्‍ध होंगे, मिसाल के तौर पर एसआईटी को मिलने वाले सबूत या जैन आयोग की रिपोर्ट, जिसने राजीव गांधी की हत्‍या के मामले की जांच की थी।

फैक्‍ट को फिक्‍शन की तरह पेश करने के इसी तरीके के कारण यह फिल्‍म एक डॉक्‍यू-ड्रामा कहलाई जा सकती है, जो हमें पूरे समय बांधकर रखने में कामयाब रहती है। वह अपने दर्शकों को यह जताने का मौका नहीं चूकती कि वे जो कुछ स्‍क्रीन पर देख रहे हैं, संभवत: वास्‍तव में भी ऐसा ही हुआ होगा।

फिल्‍म का शीर्षक पढ़कर हम ज्‍यादा कुछ नहीं समझ सकते। शायद मद्रास कैफे कॉफीशॉप्‍स की एक चेन है। हम सिंगापुर में मद्रास कैफे देखते हैं, फिर हमें वह लंदन में भी दिखाई देता है।

हमें सुझाया जाता है कि हत्‍या की साजिश पहले-पहल मद्रास कैफे में ही रची गई थी। जो लोग 1991 में बहुत छोटे रहे होंगे या जन्‍मे ही न होंगे, (14 से 28 वर्ष उम्र वालों का यही वह वर्ग है, जो सर्वाधिक मात्रा में फिल्‍में देखता है) उनके लिए राजीव गांधी की हत्‍या की घटना इतनी नई होगी कि उन्‍होंने इतिहास की किताबों में इसकी पढ़ाई नहीं की होगी।

इतिहास की किताबों में पुरानी घटनाओं का ब्‍योरा रहता है, जबकि ताजा घटनाएं टीवी पर हर रात देखी जा सकती हैं। यह फिल्‍म लिट्टे के साथ ही अन्‍य अलगाववादी समूहों की अगुआई में चले श्रीलंकाई गृह युद्ध की एक संक्षिप्‍त पृष्‍ठभूमि प्रदान करती है। वह हमें बताती है कि श्रीलंका में सिंहल बौद्धों और तमिलों के बीच किस तरह के नस्‍लीय संघर्ष होते रहे हैं। लेकिन फिल्‍म की कहानी लिखने वाले हमें स्‍पष्‍ट रूप से यह नहीं बताते कि श्रीलंका से अलग एक स्‍वतंत्र तमिल राष्‍ट्र की मांग करने वाले अलगाववादियों को कुछ हद तक इंदिरा गांधी की निगरानी में भारत सरकार द्वारा समर्थन दिया गया था। यह फिल्‍म तमिलनाडु की मुख्‍यधारा के राजनेताओं और प्रतिबंधित उग्रवादी समूह के बीच के संबंधों के बारे में भी नहीं बात करती। ऐसे में मुझे समझ नहीं आता कि चेन्‍नई में इस फिल्‍म को लेकर आखिर किस बात पर हंगामा किया जा रहा है।

फिल्‍म में जॉन अब्राहम ने एक जासूस की भूमिका निभाई है और वे खासे विश्‍वसनीय लगे हैं। वे परिदृश्‍य में तब दाखिल होते हैं, जब राजीव गांधी की सरकार श्रीलंका में कुछ स्‍थायित्‍व लाने की कोशिश कर रही होती है। दोनों देशों के बीच शांति करार पर दस्‍तखत होते हैं और श्रीलंका में भारत द्वारा शांति सेना भेजी जाती है। लेकिन लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण अब उसी भारत पर वार करने की ठान लेता है, जिसने कभी उसे संरक्षण दिया था।

अमेरिका द्वारा खड़े किए गए ओसामा या हमारे पड़ोस में मौजूदा पाकिस्‍तान तालिबान की कहानी भी तो कुछ ऐसी ही है। इस फिल्‍म में प्रभाकरण को अन्‍ना के नाम से पुकारा गया है। जॉन विक्रांत है, जिसे श्रीलंका के उत्‍तरी प्रांत में चुनाव करवाने की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है।

जाहिर है, ऐसा करने के लिए उसे लिट्टे को आड़े हाथों लेना पड़ेगा। भारतीय सेना के इस जासूस के इर्द-गिर्द अनेक किरदारों की भरमार है। इन्‍हीं में भारतीय मूल की एक विदेशी पत्रकार भी शामिल है। इस भूमिका के लिए नरगिस फखरी का चयन उनकी अभिनय क्षमता के बजाय उनकी खूबसूरती के मद्देनजर अधिक किया गया है। वे अंग्रेजी में बोलती हैं। अब्राहम हिंदी में जवाब देते हैं। फिल्‍म की पृष्‍ठभूमि चाहे जाफना हो या जापान, इस तरह की भाषा संबंधी दिक्‍कतें आना तो खैर तय ही है। लेकिन हमें इससे ज्‍यादा एतराज नहीं होता।

शायद यह बॉलीवुड की पहली ऐसी फिल्‍म है, जो विदेश में भारत के राजनीतिक हस्‍तक्षेपों के बारे में बताती है। यहां और विकी डोनर जैसी फिल्‍में बनाने वाले शुजित सरकार ने मुस्‍तैदी के साथ इस फिल्‍म के निर्देशन की कमान संभाली है और बारीक ब्‍योरों पर अपनी पकड़ बनाए रखी है।

इसी त्रासदी पर निर्मित संतोष सिवन की फिल्‍म द टेररिस्‍ट एक निजी किस्‍म की फिल्‍म थी, एक सिनेमैटोग्राफर का काम, लेकिन यह फिल्‍म रिसर्चरों के लिए बेहद दिलचस्‍प साबित होगी। इस तरह की फिल्‍मों की प्रेरणा तो खैर ओलिवर स्‍टोर की वर्ष 1991 में आई फिल्‍म जेएफके को ही माना जाना चाहिए।

हर दिलअजीज राष्‍ट्रपति कैनेडी की हत्‍या पर केंद्रित उस फिल्‍म ने दस्‍तावेजों और शोध की प्रामाणिकता के चलते अमेरिका को हिलाकर रख दिया था। यह फिल्‍म भी राजीव गांधी की हत्‍या के कारणों की जमकर पड़ताल करती है। लेकिन यह हमें और सोचने को भी मजबूर कर देती है।

राजीव गांधी की हत्‍या को 22 साल गुजर चुके हैं। आखिर उससे किसे फायदा हुआ होगा। लिट्टे तो अब नेस्‍तनाबूद हो चुका है। फिल्‍म के बाद हम देर तक यही सोचते और बतियाते रहते हैं। मैं यह फिल्‍म देखने के बाद इसकी कहानी से संबंधित कुछ लेख पढ़ चुका हूं। मुझे याद नहीं आता पिछली बार किसी बॉलीवुड फिल्‍म ने मुझे ऐसा करने को कब मजबूर किया था।

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