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MOVIE REVIEW: ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा’

2010 में आई क्राइम/गैंगस्टर फिल्म ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ ने जबर्दस्त कामयाबी हासिल की थी

Dainik Bhaskar

Aug 15, 2013, 12:15 AM IST
movie review of once upon a time in mumbai again

यदि आप यह फिल्‍म देखने के लिए इसमें दाखिल हो ही गए हैं तो ऐहतियात से चलिए। फिल्‍म के सेट्स में खासे प्‍लायवुड का इस्‍तेमाल किया गया है और अभिनेताओं की अदाकारी में भी इतना प्‍लास्टिक है कि यदि आपने सावधानी नहीं बरती तो हो सकता है पूरी फिल्‍म भरभराकर आपके सिर पर गिर पड़े।

मुझे लगता है, मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ है। मैं अभी तक नकली डायलॉगबाजी और 1980 के दशक की उससे भी फर्जी नकल के मलबे से निकलने की कोशिश ही कर रहा हूं। मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर बंबई में वंस अपॉन अ टाइम हुआ क्‍या था, जहां एक डॉन था, जिसका नाम शोएब था, पर वह आतंकवादी नहीं था, तो फिर जाने वह कौन-सी चिडि़या था।

लेकिन वह एक लड़की (सोनाक्षी सिन्‍हा) को चाहता था। एक फिल्‍मी सितारा और बहुत ही उबाऊ शख्‍स। मुझे नहीं पता कि क्‍या वह भी उसे पसंद करती थी या नहीं। हालांकि, शुरुआत में तो ऐसा ही लगता है। शायद दोनों के बीच जिस्‍मानी ताल्‍लुक भी थे। लेकिन हो सकता है, यह महज मेरी खामख्याली हो या शायद वे दोनों ही एक किस्‍म की गफलत का हिस्‍सा हों।

उसके साथ अनेक दिन बिताने के बावजूद लड़की को भनक तक नहीं लगने पाती कि वह तो एक बड़ा गैंग्‍स्‍टर है, जबकि वह बार-बार यही दोहराता रहता था कि पूरा बॉम्‍बे उसकी जेब में है। वह कहता था कि समुंदर के बाद बंबई शोएब से जानी जाती है। वह बंबई के बारे में ऐसे बात करता, मानो वह उसका कोई पालतू जानवर हो : बंबई ये, बंबई वो, बंबई हंस रही है, कुमकुम से किमी काटकर की तरह लग रही है वगैरह-वगैरह। लेकिन मुझे नहीं लगता कि बंबई में कोई उसे जानता भी था।

मेरी याददाश्‍त मुझे धोखा दे रही है, लेकिन यदि मैं गलती नहीं कर रहा हूं तो वह खाड़ी मुल्‍कों से यहां अपने एक जानी दुश्‍मन (महेश मांजरेकर) की तलाश में आया था। पुलिस उसके पीछे पड़ी थी। बंबई पहुंचने के बाद पुलिस को गच्‍चा देने के लिए उसे एक टैक्‍सी ड्राइवर का रूप धरना पड़ा। लेकिन वह गेटवे ऑफ इंडिया पर आराम से घूमता, दिन-दहाड़े साउथ बॉम्‍बे की अस्‍त-व्यस्‍त सड़कों पर हत्‍याएं करता, फिल्‍म अवार्ड शो की रातों में मजे से शरीक होता और एक आलीशान जिंदगी बिताता।

इस डॉन का एक भरोसेमंद गुर्गा (इमरान खान) था। वह स्‍टोन-वॉश्‍ड जींस पहनता और भौंचक नजरों से इधर-उधर देखता रहता, लेकिन इसके लिए उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। वह भी उसी उबाऊ हीरोइन का दोस्‍त था, जिसे उसका बॉस पसंद करता था।

जब ये दोनों वक्‍त काटने के लिए बेतुकी बातें नहीं कर रहे होते तो एक रेलवे ट्रैक के नीचे स्थित गड्ढे में जाकर बैठ जाते और अपने सिर के ऊपर से ट्रेन के गुजरने की धड़धड़ाहट सुनते। ऐसा करना वाकई बहुत रोमांचक रहता होगा। किसी ने मुझसे समझदारी भरे शब्‍दों में कहा कि बॉक्‍स ऑफिस के ताजा रिकॉर्ड देखकर कहा जा सकता है कि शायद उनके सिर के ऊपर से गुजरने वाली यह ट्रेन चेन्‍नई एक्‍सप्रेस हो!

इस फिल्‍म के ब्‍योरे अब भी मेरे दिमाग में गड्ड-मड्ड हैं। आपको कुछ-कुछ अंदाजा लग ही गया होगा कि आखिर यह किस बारे में है। वही दो लड़के एक लड़की को पसंद करते हैं वाली पुरानी दास्‍तान। इस फिल्‍म की प्रीक्‍वेल वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई आज भी लोगों की याददाश्‍त में बनी हुई है।

वह 1970 के दशक में सलीम-जावेद द्वारा लिखी गई धांसू पटकथाओं को एक तरह की आदरांजलि थी, जिसमें खूब ड्रामा था, कमाल के संवाद थे और अच्‍छा-खासा मसाला था। उसमें अजय देवगन ने केंद्रीय भूमिका निभाई थे। देवगन ने राम गोपाल वर्मा की बेहतरीन फिल्‍म कंपनी में भी दाऊद इब्राहीम के जीवन से प्रेरित एक भूमिका निभाई थे। इस तरह के रोल देवगन पर फबते हैं, क्‍योंकि वे कूल अभिनेता हैं। वे ज्‍यादा नाटकीयता नहीं बरतते। आखिर कूल दिखने के लिए कूल होना भी तो जरूरी है।

लेकिन इस पिक्‍चर में अक्षय कुमार ने माफिया डॉन की भूमिका निभाई है। माफ कीजिएगा, लेकिन हम समझ नहीं पाते कि यह कैरेक्‍टर डॉन है या कार्टून। जैकेट में से उभरीं लंबी कॉलरें, आंखों पर चढ़े चौड़े चश्‍मे, वह अपनी सिगरेट का धुआं निगलता कम, उगलता ज्‍यादा है और उसका चेहरा हमेशा एक बैकलाइट के साथ दिखाया जाता है : आधे अंधेरे में ढंका हुआ।

वह इस तरह संवाद बोलता है, जैसे घटिया शायरी की कोई किताब पढ़ रहा हो, जैसे : नाम बताया तो पहचान बुरा मान जाएगी, दान दिया तो धंधा बुरा मान जाएगा, जिसने दूध में नींबू डाला, पनीर उसकी। लेकिन वास्‍तव में यह बात फिल्‍म के हर किरदार के बारे में कही जा सकती है।

जब अक्‍की भाई अपना मुंह खोलते हैं तो हम सांसें थामे उनके अगले डायलॉग का इंतजार करते हैं (जो हमें अमर अकबर एंथनी के राबर्ट की याद दिलाते हैं। यह भूमिका जीवन ने निभाई थी)। वे धीमे-धीमे कहते हैं : डाक्‍टर, अगर इसको कुछ हुआ तो तेरा पोस्‍टमार्टम पक्‍का। या फिर : मैं वो हूं जो सबकी मां-भेन करना चाहता हूं, असलम। विलेन हूं मैं, विलेन।

मजा आया? पैसा वसूल?

लेकिन अफसोस कि यह फिल्‍म और उसका हीरो दोनों ही एक मजाक हैं। फिल्‍म का हर किरदार जैसे एक शानदार एंट्री मारने को तैयार दिखता है। एंट्री की बात चली है तो इतना तो कहा ही जाना चाहिए कि असलम ने फिल्‍म के पहले ही सीन में हमें चेता दिया था कि : अभी तो मेरी एंट्री हुई है, द एंड आने में बहुत टाइम है मेरे दोस्‍त।

तो कुल-मिलाकर मसला यही है कि पुराना मसाला कूटा गया है, जिसे 160 मिनट तक झेलिए।

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