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MOVEI REVIEW : Yamla Pagla Deeewana 2

Mayank Shekhar

Jun 07, 2013, 07:53 PM IST

आंखें मसल-मसलकर यह समझने की कोशिश करता हूं कि जब फिल्‍म में कोई विलेन ही नहीं है तो इतनी एक्‍शन काहे को हो रही है।

Movie review of Yamla Pagla Deeewana 2
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जब हमारी नजरों के सामने स्‍क्रीन पर कोई फिल्‍म ही न हो तो हम किस बात की समीक्षा करें? वास्‍तव में तब तो ढेरों बातें की जा सकती हैं। आखिर हमने जो कुछ देखा है, उसके बारे में कोई तुक भिड़ाना ही तो सबसे गंभीर जिम्‍मेदारी होती है। इस तरह की हो-हल्‍ले वाली जलसानुमा फिल्‍म को देखने जाने से पहले यदि हम एक पटियाला पेग चढ़ाकर तनिक गाफिल हो जाएं तो यह हमारे लिए बेहतर रहेगा। लेकिन यदि शो सुबह का है तो पटियाला पेग चढ़ाना जल्‍दबाजी साबित होगी। मैं फिल्‍म के सुबह साढ़े नौ बजे वाला शो में बैठा हूं और यहां कौवे बोल रहे हैं। जाहिर है धरम पाजी और सनी पाजी के ज्‍यादा भक्‍त फिल्‍म देखने नहीं पधारे हैं।

मैं आंखें मसल-मसलकर यह समझने की कोशिश करता हूं कि जब फिल्‍म में कोई विलेन ही नहीं है तो इतनी एक्‍शन काहे को हो रही है। मुझे एक शख्‍स (अनुपम खेर) नजर आता है, जो एक ऐसा मॉल बनाना चाहता है, जो किसी स्‍पेस स्‍टेशन की तरह हो, लेकिन उसका फिल्‍म की कहानी से कोई सरोकार नहीं है। फिल्‍म में रोमांस भी है, लेकिन यह समझना मुश्किल लगता है कि कौन किसे चाहता है और क्‍यों। अंतत: यह एक ऐसी फिल्‍म है, जिसमें कॉमेडी तो है, लेकिन कोई सेंस ऑफ ह्यूमर नहीं। तो फिर हम यह फिल्‍म क्‍यों देख रहे हैं? यकीनन, यह पूरी तरह से एक फैमिली फिल्‍म है, लेकिन यहां फैमिली से हमारा आशय देओल फैमिली से है। वे चाहें तो यह फिल्‍म देख सकते हैं और हंसते हुए लोटपोट होकर फर्श पर लुढ़क सकते हैं।

पापाजी धर्मेंद्र हैं। उनके दो बेटे हैं, बॉबी और सनी, जो परदे पर बराबरी से नजर आते हैं। एक रोमांटिक है तो दूसरा फौलादी है, जो इतनी जोर से दहाड़ता है कि फिल्‍म का परदा कांपने लगता है और दर्शक कोनों में छिटकने लगते हैं। फिल्‍म की कहानी लिखने का श्रेय सनी की पत्‍नी लिंडा को हासिल है, लेकिन यह फिल्‍म पांच मिनट के लिए अंदाज अपना अपना है, अगले पांच मिनट के लिए गोलमाल, लेकिन अगले 141 मिनटों में यह क्‍या है, इसे कतई नहीं बताया जा सकता। फिल्‍म का नामकरण मोहम्‍मद रफी के एक लोकप्रिय गाने के आधार पर किया गया है, जिसे धर्मेंद्र पर फिल्‍माया गया था। फिल्‍म थी प्रतिज्ञा (1975) और गीत था : मैं जट्ट यमला पगला दीवाना।

धर्मेंद्र और बॉबी यहां पाजियों की भूमिका में हैं। वे लंदन के एक बिजनेसमैन के घर में ओबेरॉय ग्रुप ऑफ इंडस्‍ट्रीज के मालिक के रूप में घुसने की कोशिश करते हैं। वे ओबेरॉय प्रणाम कहकर अभिवादन करते हैं। बिजनेसमैन (अन्‍नू कपूर) के घर में दो जवान लड़कियां हैं : एक उसकी बेटी है, दूसरी नहीं। बॉबी पहले गलत लड़की से इश्‍क फरमाने लगते हैं, और फिर बाद में सही वाली के साथ किस्‍मत आजमाते हैं। लेकिन सनी को यह धोखाधड़ी का आइडिया जमता नहीं और वे इसे नाकाम कर देना चाहते हैं।

लेकिन मैं यह पूरी कहानी बहुत सादे तरीके से सुना रहा हूं। मैं आपको यह नहीं बता रहा हूं कि इस दौरान फिल्‍म में सूमो पहलवान और निंजा लड़ाके भी नजर आते हैं। साथ ही हम सलमान खान के संवाद और इस जैसी ही अन्‍य बेतुक चीजें भी स्‍क्रीन पर देखते-सुनते हैं, जो इस फिल्‍म में इफरात में हैं। यह फिल्‍म किसी भोजपुरी फिल्‍म की तरह है, जिसे पंजाबियों और साउथॉल में बसे प्रवासियों को ध्‍यान में रखकर बनाया गया है। मुझे बताया जाता है कि इस फिल्‍म की प्रीक्‍वेल यमला पगला दीवाना बहुत बड़ी हिट थी।

बाद में बॉबी बिजनेसमैन की बेटी को लुभाने के लिए कलाकार बनने की कोशिश करते हैं। लेकिन उनके कैनवास पर अचानक कोई चिम्‍पैंजी रंगों से खेलने लगता है। वे उस बकवास को अपनी एब्‍सट्रैक्‍ट पेंटिंग बताकर बेच देते हैं। लोग उस कलाकृति को देखकर भावविभोर हो जाते हैं, दर्शक पगला जाते हैं और बॉबी अगले पिकासो बन जाते हैं। हम मन ही मन सोचते हैं, यदि इस कलाकृति को कला कहा जा सकता है तो इस फिल्‍म को भी फिल्‍म कहा जा सकता है। जी हां, बिल्‍कुल।

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