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MOVIE REVIEW: YE JAWANI HAI DIWANI

पहला घंटा पूरे होते-होते हमें पूरा यकीन हो जाता है कि यह वर्ष 1995 की फिल्म दिलवाले दुल्हानिया ले जाएंगे की रीमेक है।

Dainik Bhaskar

May 31, 2013, 09:08 PM IST
Movie review of ye jawani hai diwani

फिल्‍म का पहला घंटा पूरे होते-होते हमें पूरा यकीन हो जाता है कि यह वर्ष 1995 की फिल्‍म दिलवाले दुल्‍हनियां ले जाएंगे की रीमेक है। लेकिन यहां मैंने रीमेक शब्‍द का उपयोग उस फिल्‍म की एक घटिया नकल के अर्थों में नहीं, बल्कि उसे नए मायने देने वाली फिल्‍म के रूप में किया है। सच पूछें तो हर बेहतरीन रीमेक ऐसी ही होती है।

फिल्‍म का नायक एक बेपरवाह, शरारती नौजवान है। नायिका (दीपिका पादुकोण, जिनकी मुस्‍कराहट लाजवाब है) एक चश्‍मीश पढ़ाकू लड़की है, जो पहली बार अपने माता-पिता के बिना छुटि्टयां मनाने जा रही है। दोनों की कॉलेज की पढ़ाई हाल ही में पूरी हुई है। इस उम्र में लिए जाने वाले फैसले हमारी पूरी जिंदगी की दिशा तय कर सकते हैं। वे मनाली की वादियों में हैं। तभी दोनों के बीच कुछ-कुछ हो जाता है। दोनों ही समझ नहीं पाते कि हुआ क्‍या है। शायद इसकी वजह यह हो सकती है कि दो अलग-अलग मिजाज के लोग एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। जैसी कि हमें उम्‍मीद करना चाहिए, फिल्‍म में एक लंबी नॉर्थ इंडियन शादी भी है और फिल्‍म के आधे गीत इस शादी को ही समर्पित हैं।

हीरो रनबीर कपूर हैं। मैं सुबह साढ़े दस बजे जिस थिएटर में यह फिल्‍म देख रहा था, जिसमें 70 फीसदी लड़कियां और महिलाएं थीं। मुझे लगता है जिन फिल्‍मों को देखने लड़कियां और महिलाएं बड़ी तादाद में उमड़ती हैं, वे कामयाब साबित होती हैं। यदि यकीन न हो तो शाहरुख खान से पूछ लीजिए। या यदि आप हॉलीवुड से वास्‍ता रखते हैं तो आप रेयान गोसलिंग की कोई फिल्‍म देखकर इस बात की ताईद कर सकते हैं। इसका फिल्‍मों से कोई सरोकार नहीं है और फिल्‍म समीक्षाओं से तो कतई नहीं। महिला दर्शक पहले ही यह तय करके आती हैं कि हीरो को देखकर उन्‍हें आहें भरना हैं और उसकी हर अदा पर फिदा हो जाना है।

लेकिन इसके बावजूद, गिल्‍ली-गिल्‍ली गप्‍पा के साथ ही इस फिल्‍म की कहानी भी आगे बढ़ती रहती है। हम समझ जाते हैं कि यह फिल्‍म जवानी और दीवानी से भी अधिक किसी और चीज़ के बारे में है। हमारे सामने बॉलीवुड का वही सनातन प्रश्‍न आन खड़ा होता है : क्‍या लड़का और लड़की कभी एक-दूसरे के दोस्‍त हो सकते हैं? हां, हो सकते हैं। आजकल तो हम अपनी फिल्‍मों में ऐसा होते अक्‍सर देखते हैं, जैसा कि हम अपने आसपास की शहरी जिंदगी में भी देख सकते हैं। लेकिन यह फिल्‍म इस बारे में है कि क्‍या प्‍यार हमारे लिए बंधन बन जाता है।

इस फिल्‍म के किसी भी किरदार के पास इस सवाल का कोई पुख्‍ता जवाब नहीं है। हर कोई अपनी तरह से इस सवाल से जूझता है। हमारी तरह। हीरो और हीरोइन चार दोस्‍तों के एक ग्रुप का हिस्‍सा हैं। आशिकी 2 वाले आदित्‍य राय कपूर हीरो के जिगरी यार हैं। लेकिन सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस कल्कि कोएच्लिन की है। वे इस गैंग की टॉमबॉय हैं और हम खुद को उनकी सराहना करने से नहीं रोक पाते।

ये किरदार उस पहली भारतीय मध्‍यवर्गीय पीढ़ी से वास्‍ता रखते हैं, जिसके सामने यह विकल्‍प होता है कि वे या तो जल्‍दी शादी कर ले, या देरी से करे, या कभी न करे और उसे इसके लिए अपने माता-पिता की अनुमति लेने की जरूरत नहीं होती। मेरे खयाल से इसी पीढ़ी में ऐसे नौजवान भी हैं, जो अपना काम खुद चुनते हैं। या तो वे जिंदगी भर किसी के लिए काम कर सकते हैं, या अपना कोई नया काम शुरू कर सकते हैं, जिसमें नाकाम रहने की भी पूरी गुंजाइश हो सकती है। पहले ऐसा केवल धनाढ्य वर्ग में ही देखा जाता था।

विकल्‍पों से पेचीदगियां पैदा होती हैं। एक बिग-बजट बॉलीवुड रोमांटिक फिल्‍म होने के बावजूद इस फिल्‍म में दिखाई गई ये वास्‍तविक पेचीदगियां ही इस फिल्‍म को खास बना देती हैं। इस तरह की आखिरी बेहतरीन फिल्‍म थी वर्ष 2011 में आई जोया अख्‍तर की जिंदगी मिलेगी ना दोबारा। हम यहां उस फिल्‍म के अनेक संदर्भ भी पाते हैं। निर्देशक अयान मुखर्जी की वेक अप सिड (2009) भी ऐसी ही ताजी हवा के झोंके जैसी फिल्‍म थी। इसमें कोई शक नहीं कि आज अयान मुखर्जी बॉलीवुड के बेहतरीन युवा लेखकों-निर्देशकों की कतार में खड़े हो चुके हैं। इस फिल्‍म की पटकथा से ही हम इस बात का अंदाजा लगा सकते हैं, जिसे इतनी हुनरमंदी के साथ लिखा गया है कि ऐसा लगता है जैसे फिल्‍म की कहानी को अच्‍छी तरह पता है, कब पीछे लौटना है, कब कोई गाना गुनगुनाना है, कब संवादों और ड्रामा की आंच को मद्धम करना है। बस इकमात्र बात जो अखरती है, वह यह कि फिल्‍म की लंबाई कुछ और कम की जा सकती थी और गानों में भी कटौती की गुंजाइश थी। वैसे भी 160 मिनट किसी के भी धैर्य और ब्‍लेडर की परीक्षा लेने के लिए काफी होते हैं।

यह फिल्‍म एक और आयाम पर रोशनी डालती है, जो कि इन दिनों हमारे उच्‍च मध्‍यवर्गीय युवाओं का शगल बनता जा रहा है। वह है घुमक्‍कड़ी। फिल्‍म में रनबीर कपूर यायावर हैं, उन अनेक युवाओं की तरह, जो एक-एक रुपया इसलिए बचाते हैं ताकि दुनिया देख सकें। वे जानते हैं कि वे ऐसा कर सकते हैं। हालांकि कुछ लोगों के लिए यात्राएं भटकाने वाली साबित हो सकती हैं, लेकिन कुछ यात्राएं ऐसी भी होती हैं, जो हमारी जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दें। जो लोग ज्‍यादा यात्राएं करना पसंद नहीं करते, वे यह फिल्‍म देख सकते हैं। मैं उन्‍हें यकीन दिला सकता हूं कि यह उनके लिए एक सुखद यात्रा साबित होगी।

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