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ओलंपस हैज़ फ़ॉलन

इसी तरह कुछ आतंकी अमेरिका को बंधक बना लेते हैं।

Dainik Bhaskar

Mar 23, 2013, 09:23 AM IST
movie review: olyumpus has fallen

भारतीय परिवेश और एक भिन्‍न कालखंड में, मान लीजिए 1990 के दशक के अंतिम दिनों में, क्‍या निर्देशक अनिल शर्मा इस फिल्‍म के साथ न्‍याय कर पाते? शायद हां। इस फिल्‍म का जिंगोइज्‍़म ‘गदर’ के अनुरूप है। और उसकी कहानी की मैडनेस भी। निश्चित ही, यहां हम अमेरिकी राष्‍ट्रवाद की बात कर रहे हैं।

अमेरिकी फ़ौजें दुनिया को बचाने के लिए तैनात हैं, लेकिन यदि खुद अमेरिका पर ही किसी तरह की मुसीबत आ जाए, तो क्‍या पूरी दुनिया भी उसके साथ ही समाप्‍त हो जाएगी? फिल्‍म का टाइटिल तो यही बताता है, और इसीलिए हम फिल्‍म में लगातार यह सुनते रहते हैं कि ‘ईश्‍वर यूनाइटेड स्‍टेट्स ऑफ अमेरिका की रक्षा करे।’ वैश्विक आतंकवादियों को इस चेतावनी को गंभीरता से लेना चाहिए।

इस फिल्‍म में दिखाए गए आतंकी उत्‍तरी कोरियाई हैं। वे जितने आराम से व्‍हाइट हाउस में घुस जाते हैं, उसके मद्देनजर हमें अमेरिका के बारे में और संजीदगी से प्रार्थना करना चाहिए।

सुरक्षा तंत्र के पास प्रतिक्रिया करने का भी समय नहीं है। रक्षा तंत्र ध्‍वस्‍त हो चुका है। प्रेसिडेंट (आरोन एकहार्ट) अपने खुफिया बंकर में अपने शीर्ष कैबिनेट साथियों के साथ छुपे हैं। आतंकी चाहते हैं कि दक्षिण कोरिया की हिफाजत कर रही अमेरिकी फौजें फौरन लौट आएं।

उन्‍हें अमेरिका के एटमी हथियारों के कोड्स भी चाहिए। इस बिंदु पर आकर हम सोचते हैं कि कोई भी राजनीतिक प्रसंग चलेगा। वैसे भी हम इस फिल्‍म को तर्क के आधार पर देखने नहीं आए हैं। हम खूब सारी धांय-धांय, ढिशूम-ढिशूम और खून-खराबे के दृश्‍यों को देखने के लिए आए हैं।

वॉशिंगटन मेमोरियल भरभराकर ढहता है और मलबे में लोग दफन हो जाते हैं। हॉलीवुड की किसी फिल्‍म में 11 सितंबर, 2001 के हमले को पुनर्जीवित करने का यह नज़दीकी सीक्‍वेंस है। निश्चित ही यह रौंगटे कर देने वाला दृश्‍य है। 9/11 के हमलावरों के निशाने पर पेंटागन भी था।

इसी तरह कुछ आतंकी अमेरिका को बंधक बना लेते हैं। भारत से उलट, अमेरिका एक पॉलिसी के तौर पर आतंकियों से बातचीत नहीं करता है। ऐसे में कार्यवाहक प्रेसिडेंट (मोर्गन फ्रीमैन) को कुछ न कुछ करना ही होगा। फ्रीमैन की शख्सियत में कुछ ऐसी बात है कि उन्‍हें देखते ही हमें लगता है कि हम उन्‍हें अमेरिका के पहले अश्‍वेत राष्‍ट्रपति के रूप में देखना चाहेंगे। उनकी तुलना में ओबामा आधे अश्‍वेत ही हैं, या कहें आधे श्‍वेत हैं।

जेरार्ड बटलर इस फिल्‍म में सन्‍नी देओल नुमा रोल में हैं। वे प्रेसिडेंट के बॉडीगार्ड हुआ करते थे, लेकिन एक कार क्रैश में उनके बॉस की पत्‍नी की रक्षा करने में नाकाम रहने पर उन्‍हें नौकरी से हटा दिया जाता है। लेकिन वे व्‍हाइट हाउस से बखूबी वाकिफ हैं और प्रेसिडेंट और उनके नन्‍हे बेटे को बचाने के मिशन पर निकल पड़ते हैं, ताकि उन्‍हें बचाकर पूरी दुनिया की रक्षा कर सके। वास्‍तव में यह फिल्‍म 1990 के दशक की याद दिलाती है।

तब इस तरह की फिल्‍मों में आमतौर पर स्‍टीवन सेगल (अंडर सीज), सिल्‍वेस्‍टर स्‍टेलॉन (रैम्‍बो) जैसे सितारे हुआ करते थे। भारत के हॉलीवुड प्रशंसक इन सुपर सितारों को अपना मानकर चलते हैं। ब्रूस विलिस की डाई हार्ड (1988) इस तरह की फिल्‍मों की टेक्‍स्‍टबुक है और इस फिल्‍म का फॉर्मूला भी उसमें ही छुपा है।

इस विधा की फिल्‍मों में हम लगभग हर कदम का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। क्‍लाईमैक्‍स भी हमें पहले ही पता होता है। कलाकार डायलॉग के तौर पर रटी-रटाई बातें बोलते हैं। लेकिन इसके बावजूद ये फिल्‍में हमें ‘कंफर्ट फिल्‍में’ लगती हैं। ‘कंफर्ट फूड’ की ही तरह ये सभी को लुभाती हैं।

मैं इस तरह की फिल्‍मों को देखकर अपने पुराने दिनों में पहुंच जाता हूं और शायद यही कारण है कि अनेक अन्‍य लोग भी इस फिल्‍म से निराश नहीं होंगे। हां, यह जरूर है कि यह फिल्‍म अपने आपको कुछ जरूरत से ज्‍यादा ही गंभीरता से लेती है। ऐसे में हमारे लिए यही बेहतर होगा कि हम इसे कतई गंभीरता से न लें।

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