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'कमांडो'

कमांडो फुस्स हुआ

Dainik Bhaskar

Apr 13, 2013, 09:29 AM IST
movie review review: commando

कमांडो फुस्‍स हुआ

यदि एक्‍शन ही एक्‍शन देखना हो तो एक पूरी फिल्‍म क्‍यों देखें, मार्शल आर्ट क्‍यों न देखें। जब हम इस फिल्‍म में दो घंटे से भी अधिक समय तक हड्डियों की चरमराहट और हवा में उड़ते मनुष्‍यों के नॉनस्‍टॉप दृश्‍यों और चीख-पुकार को झेलते रहते हैं तो आखिरकार हमें समझ आता है कि वास्‍तव में यह एक प्रकार का निहायत ही ऊबाऊ मोर्टल कॉम्‍बैट वीडियो गेम था, जिसमें आप कुछ भी नहीं कर सकते थे। जिसमें आपके हाथ में कंसोल कभी नहीं आता और परदे पर दिखाई दे रहा हीरो हर बार जिंदा बच जाता है, चाहे उसे पेट में ही गोली क्‍यों न मार दी जाए, या सिर के बल पहाड़ से नीचे क्‍यों न फेंक दिया जाए।

वास्‍तव में यह एक वीडियो गेम ही है। फिल्‍म का विलेन अंत में हीरो से एक और मुकाबला करने को कहता है, ताकि वह आखिरी लेवल पार करके आखिरकार राजकुमारी को जीत ले। निश्चित ही आखिरी स्‍टेज में हीरो का सीधा मुकाबला विलेन से ही है, जो बिना गन उठाए मैदान में चला आता है, जबकि वह मार्शल आर्ट्स में भी बहुत माहिर नहीं है।

लेकिन कोई ग़लती मत कीजिएगा। यह विलेन बहुत ही खतरनाक है। जरा उसकी कहानी पर तो गौर फरमाइए : ‘अमावस की रात को पैदा हुआ, शैतान के घर शैतान।’ वह अपनी ‘आंखों की पुतलियों’ के बिना भी देख सकता है। दिलेरकोट नामक एक पंजाबी कस्‍बे में उसकी हुकूमत है, जहां वह नौजवानों को सस्‍ते ड्रग्‍स बेचता है और कस्‍बे के सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस को अपने चीफ चमचे और खास आदमी के रूप में नियुक्‍त कर लेता है। हीरो एक आर्मी मैन है और उसका कहना है कि वह भारत की सीमारेखाओं की रक्षा कर सकता है, लेकिन उसके लिए यह ज्‍यादा जरूरी है कि वह पहले ‘अंदर की सफाई’ करे।

राजनेताओं ने इस आर्मी कैप्‍टेन के साथ बहुत बुरा किया था। वह एक रूटीन एक्‍सरसाइज के दौरान चीन की सरहद में दाखिल हो गया था। नेताओं ने खुलेआम उसे पहचानने से इनकार कर दिया। अब उसे बदला लेना ही होगा। लेकिन इसी दौरान वह दिलेरकोट के एक ऐसे खतरनाक डॉन के चंगुल से एक खूबसूरत लड़की को भी छुड़ा लेता है, जो महज मजे के लिए लोगों की जान लेता है और अपने शिकार को एसएमएस पढ़कर सुनाता है, ताकि उनकी मौत तनिक आसान हो जाए। फिल्‍म में अधिकांश समय हीरो और विलेन वॉकी-टॉकी पर एक-दूसरे पर जुमले छोड़ते रहते हैं। हीरोइन हीरो को हौसला दिलाती रहती है। वे जंगल में हैं और विलेन के आदमी उनका पीछा कर रहे हैं। एक-एक कर विलेन के इन सभी आदमियों का कचूमर बना दिया जाता है।

हिंदी फिल्‍मों में मुक्केबाजी की एक परंपरा रही है। मास्‍टर विठल से लेकर धर्मेंद्र तक, उनके बेटे सनी से अजय देवगन और सुनील शेट्टी तक मुक्‍केबाजी वाली फिल्‍में हमेशा से दर्शकों को अपनी ओर खींचती रही हैं। लेकिन इसके बावजूद हमारे पास मुख्‍यधारा की एक्‍शन फिल्‍मों का पूरा लेखाजोखा नहीं है। 1988 में भी कमांडो नामक एक फिल्‍म आई थी, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती और मंदाकिनी मुख्‍य भूमिकाओं में थे। इस तरह की फिल्‍मों में रोमांस, कॉमेडी, ड्रामा और कभी-कभी तो सस्‍पेंस का भी तड़का रहता था। लेकिन इस फिल्‍म में तो शुरू से आखिर तक बस एक्‍शन ही एक्‍शन है।

आज भारत में सिक्‍स-पैक्‍स और बाईसेप्‍स के लिए जो क्रेज है, वैसा ही क्रेज 1980 के दशक में अमेरिका में अर्नाल्‍ड श्‍वार्जनेगर और सिल्‍वेस्‍टर स्‍टैलोन के दौर में हुआ करता था। वे मसल्‍स और मासेस के देवता कहलाते थे। लेकिन इसके बावजूद उनकी फिल्‍में विचारों और कहानियों से खाली नहीं होती थीं। स्‍टैलोन तो रॉकी के लिए ऑस्‍कर के लिए भी नामांकित हुए थे।

लेकिन इस फिल्‍म को एक ही पुरस्‍कार मिल सकता है, और वह यह कि यह हमें सलमान खान, अक्षय कुमार जैसे पचास की उम्र की ओर बढ़ते सितारों के सप्‍लीमेंट्स और स्‍टेरॉयड्स पर पलने वाले बुढ़ाते मसल्‍स से हमें बचा सकती है। लेकिन इस बेसिरपैर की एक्‍शन फिल्‍म के हीरो विद्युत जामवल, जो 34 साल के हैं, ने अपना काम बखूबी निभाया है। फिल्‍म की शुरुआत में हमें बताया जाता है कि फिल्‍म के सारे स्‍टंट्स उन्‍होंने खुद बिना किसी की मदद के किए हैं, लेकिन आप ये स्‍टंट्स घर पर मत आजमाइएगा, क्‍योंकि केवल विद्युत ही उन्‍हें कर सकते हैं।

वे कमांडो हैं। जो लोग नहीं जानते कि कमांडो क्‍या होता है उन्‍हें कर्नल बताते हैं : कमांडो वह होता है जिसका वजन 65 किलो होता है, लेकिन जो 20 हजार फीट की ऊंचाई से कूद जाता है और 50 किलो वजन उठाकर 60 किलोमीटर तक दौड़ जाता है। यानी वह एक हजार सैनिकों की फौज के बराबर होता है। अच्‍छा, ऐसा क्‍या। तो एक काम कीजिए, कमांडो को लेकर एक ठीक-ठाक फिल्‍म बनाइए, हम उसे भी देखना चाहेंगे।

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