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शुद्ध देसी रोमांस

वह अपनी शादी की रात मंडप से भाग जाता है। कोई एक पखवाड़े बाद इत्‍तेफाक से लड़का और लड़की की फिर मुलाकात होती है।

Dainik Bhaskar

Sep 07, 2013, 06:04 AM IST
Movie Review Shuddh Desi Romance

इस रोमांस-कथा की पूंछ उसके शरीर से भी बड़ी है। हो भी क्‍यों ना, आखिर इस फिल्‍म में हमें उस तमाम इजहार-इकरार, भाग-दौड़, कंफ्यूजन वग़ैरह से जो बचा लिया गया है, जो कि आमतौर पर सभी प्रेम कहानियों की बुनियाद में होते हैं। इन मायनों में यह फिल्‍म पोस्‍ट-रोमांटिक है।

फिल्‍म शुरू होने के चंद मिनटों बाद ही हम पाते हैं कि लड़का और लड़की साथ रहने लगे हैं। लड़का लड़की से मिलता है, उसे चूमता है, जबकि वह अपनी खुद की वेडिंग-बस पर सवार था। वास्‍तव में वह इस होने वाले रिश्‍ते से खुश ही नहीं था। लेकिन लड़के की उस लड़की की पटरी फौरन बैठ जाती है। वह अपनी शादी की रात मंडप से भाग जाता है। कोई एक पखवाड़े बाद इत्‍तेफाक से लड़का और लड़की की फिर मुलाकात होती है।

‘देसी’ लड़की की भूमिका परिणति चोपड़ा ने निभाई है : भरे बदन वाली, जिंदगी से भरपूर। वह ऐसी लड़की नहीं, जिसका पोस्‍टर आप अपने कमरे की दीवार पर चिपकाएं, बल्कि इसके बजाय आप बड़ी आसानी से यह कल्‍पना कर सकते हैं कि वह आपके साथ है, डेट पर। सुशांत सिंह राजपूत (काई पो चे फेम) का इस भूमिका के लिए चयन बिलकुल ठीक किया गया है। वे एक जयपुरी लड़के रघुराम सीताराम की भूमिका निभा रहे हैं, जिसे रघु कहकर पुकारा जाता है। उनमें सहज आकर्षण और मासूमियत है। परिणति और सुशांत बॉलीवुड के युवा कलाकारों की उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्‍व करते हैं, जिन्‍हें स्‍टार सिस्‍टम से भले कोई ऐतराज न हो, लेकिन जो चाहते हैं कि उन्‍हें उनके काम और किरदारों के लिए भी याद रखा जाए। फिल्‍म के पहले भाग में परिणति का अभिनय तो किसी नेशनल अवार्ड जीतने वाली अदाकारा से कमतर नहीं है।

इन दोनों किरदारों में खासी समानताएं हैं। दोनों जिंदगी के प्रति एक आजाद नजरिया रखते हैं। वे शादी-ब्‍याह को ऑफिशियली अपना साइड प्रोफेशन भी बना लेते हैं। वे ऐसी बारातों में बाराती बनकर शामिल हो जाते हैं, जिनमें लड़के वालों की ओर से कोई नहीं आ सकता। पता नहीं ऐसा आमतौर पर होता है या नहीं। अलबत्‍ता इसमें कोई शक नहीं कि मैरिज फंक्‍शन अटेंड करना हमारी राष्‍ट्रीय हॉबी है।

इन लोगों की जिंदगी के मार्फत यह फिल्‍म हमें भारत के मिडिल क्‍लास के बारे में छोटी-मोटी बातें बताती रहती है : गुप्‍ताजी जो शोरगुल करने वाले पड़ोसी हैं, अजमेर वाले मौसा जिनसे सभी परिचित हैं, अंग्रेजी के ज्ञान के चलते बन गईं सामाजिक खाइयां और भारतीय परिवारों के पाखंड। रघु, जो अब एक एक्‍सपर्ट वेडिंग गेस्‍ट है, कहता है कि शादियों में पूरे हिंदुस्‍तान का झूठ और डबल स्‍टैंडर्ड बाहर आ जाता है। ऋषि कपूर ने उसके पार्ट टाइम बॉस की भूमिका निभाई है और वे एक किस्‍म के वेडिंग ऑर्गेनाइज़र हैं। इस फिल्‍म में वे हमेशा की तरह पूरी लय में नज़र आए हैं।

फिल्‍म की शूटिंग राजस्‍थान में हुई है और इसके निर्देशक हैं मनीष शर्मा, जिन्‍होंने सफल फिल्‍म बैंड बाजा बारात के साथ बॉलीवुड में पदार्पण किया था। एक दर्शक के रूप में मुझे लगातार यह खटकता रहा कि लड़की इससे बेहतर साथी की हकदार थी। बहरहाल, परदे पर तो वे दोनों एक-दूजे के लिए ही बने लगते हैं। वे साथ रहते हैं और जल्‍द ही शादी करने वाले हैं। लेकिन इस बार लड़की शादी के मंडप से भाग जाती है। मैं जानता हूं कि यह सब ‘अति रैंडम’ है, जैसा कि फिल्‍म के एक गाने में बताया गया है।

लेकिन फिल्‍म का अपना एक अंदरूनी लॉजिक है, जिसमें यह सब ठीक लगता है। इतना ही नहीं, लड़का भी जल्‍द ही उस लड़की के साथ हो जाता है, जिससे पहले उसकी शादी होने वाली थी। वास्‍तव में इस फिल्‍म में बुनियाद में एक सवाल है और वह यह है कि एक थोपे गए रिश्‍ते के तौर पर शादियों का कितना महत्‍व है। वैसे भी अधिकतर मौकों पर शादी एक थोपा हुआ रिश्‍ता ही होती है।

पश्चिमी देशों में यह बहस एक दूसरे स्‍तर पर चली गई है, लेकिन भारत जैसे देश में शादी-ब्‍याह जैसे रिश्‍तों की बागडोर लड़का-लड़की के माता-पिता के हाथों में होती है। बहुत-से पति-पत्‍नी तो एक-दूसरे के साथ इसीलिए खुशी-खुशी रहते हैं, क्‍योंकि उनके माता-पिता यही चाहते हैं। लेकिन इस फिल्‍म में इस तरह की कोई दिक्‍कत इसलिए नहीं आती, क्‍योंकि तीन में से दो किरदारों के माता-पिता नहीं हैं और तीसरे के पिता फिल्‍म में कभी दिखाए ही नहीं जाते।

फिल्‍म की पटकथा जयदीप साहनी ने लिखी है और उनके खाते में बॉलीवुड की मुख्‍यधारा की कुछ बेहतरीन फिल्‍में दर्ज हैं, जैसे कंपनी, खोसला का घोंसला, चक दे इंडिया, बंटी और बबली। उनकी आखिरी फिल्‍म चार साल पहले आई रॉकेट सिंह थी। वह भी अच्‍छी फिल्‍म थी, लेकिन उसका ठीक-ठीक आकलन नहीं हुआ। इस फिल्‍म के साथ उन्‍होंने पहली बार एक रोमांटिक कॉमेडी पर हाथ आजमाया है। उनकी पटकथा मजेदार है और डायलॉग तो ऐसे हैं, मानो ‘शुद्ध देसी’ घी में डूबे हुए हों। यह पूरी तरह से एक पटकथा लेखक की फिल्‍म है। म्‍यूजिक वीडियोज़ के कलेक्‍शन के बजाय एक बातूनी ड्रामा। बस एकमात्र समस्‍या यह है कि फिल्‍म कुछ ज्‍यादा ही लंबी खिंच जाती है।

किसी भी फिल्‍म के किरदार परदे पर क्‍या कहते और करते हैं, इसके अलावा हम यह भी जानना चाहते हैं कि वे आखिर सोचते क्‍या हैं। आमतौर पर साहित्‍य में हमें यह अच्‍छी तरह बताया जाता है कि कोई किरदार क्‍या सोच रहा है। लेकिन इस फिल्‍म में ऐसा लगता है जैसे कलाकार सीधे कैमरे के सामने खड़े होकर बोल रहे हैं। बेहद रोचक पहले हिस्‍से के बाद फिल्‍म उलझ जाती है और इस सवाल का जवाब खोजने में बहुत समय लगा देती है कि किसे किसके साथ होना चाहिए। यकीनन, किरदारों की दुविधा जायज है। वैसे भी यह लड़का-लड़की की आमतौर पर दिखाई जाने वाली फिल्‍मों की तरह नहीं है, जिनमें लड़का आजाद परिंदा होता है और लड़की अपने घरौंदे को सजाने वाली चिडि़या।

बहरहाल, फिल्‍म का अंत एक बहुत ही संतोषजनक मोड़ पर होता है। नौजवानों को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार है, इसके बावजूद कुछ ऐसा है, जिसके बारे में उन्‍हें गंभीरता से सोचना चाहिए। लेकिन इसके लिए उन्‍हें पहले यह फिल्‍म देखना होगी।

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