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MOVIE REVIEW: दि डे आफ्टर एवरीडे

dainik bhaskar.com

Oct 30, 2013, 05:57 PM IST

MOVIE REVIEW: दि डे आफ्टर एवरीडे

MOVIE REVIEW: the day after everyday
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किसी भी फिल्म को बनाने के लिए क्या चाहिए होता है? एक कहानी, कैमरा, स्क्रिप्ट, पैसा, एक्टर और भी बहुत कुछ। लेकिन शायद इन सबसे बढ़ कर एक और चीज चाहिए होती है और वो है जनून, जो इस शॉर्ट फिल्म में साफ दिखाई देता है।
अनुराग कश्यप एक बार फिर सामने आए हैं एक शॉर्ट फिल्म के साथ, जिसका नाम है 'दि डे आफ्टर एवरीडे'। फिल्म का नाम जितना रोचक है, कहानी और मैसेज उससे कहीं ज्यादा गंभीर है। ये फिल्म है समाज में रहने वाली हम उस महिला की जिसे हर रोज गंदी निगाहों, भद्दी फब्तियों और घर वालों के तानों के बीच जीना पड़ता है।
कहानी की शुरूआत होती है चाय बनाती हुई एक कामकाजी महिला के घर से जिसका पति उसे अखबार में छपी रेप की खबरें सुना रहा होता है। उसके मुताबिक उसकी पत्नी को घर में बैठना चाहिए वरना वो किसी दिन किसी नाले में कटी-पिटी मिलेगी। दूसरे घर में भी एक सास है जो अपनी बहू को परिवार संभालने की सलाह देती है क्योंकि उसने अपनी पूरी जिंदगी पुरुष प्रधान मानसिकता के तले गुजारी है।
सुबह होते ही 3 लड़कियां एक साथ अपने काम पर निकलती हैं। एक बार फिर उन्हीं सबसे टकराती हैं जिन्हें सिर्फ एक मौके की तलाश रहती है। फिर वही जद्दोजहद। आसपास घूमती कैमरे की निगाहें जिनमें चटकारे लेकर वीडियो बनाए जा रहे हैं और यहां-वहां टच होते हुए लोगों के हाथ।
एक बार तो सहन कर लेती हैं, लेकिन जब संयम जवाब देने लगता है तो हाथ-पैर भी उठने लगते हैं। वैसे सिर्फ कोहनी की चोट पर्याप्त नहीं होती है। यहां पर मर्दों की बेशरमी और लड़कियों की कमजोरी एक साथ दिखाई देता है। अब जबकि खुद ही खुद की मदद करनी होती है, तो ये लड़कियां भी जवाब देना सीख जाती हैं।
शाम के वक्त फिटनेस सेंटर से निकलते वक्त दिमाग में यही घूम रहा होता है कि आज जवाब देना है... आज जवाब देना है। साथ में एक और लड़की है जो शायद फिजिकली ट्रेंड है। वही समझाती है कि मजबूती मन में होती है, शरीर में नहीं। जब तक जवाब नहीं दोगी, ऐसे ही चलता रहेगा।
स्ट्रीट लाइट जल तो रही है, लेकिन गली में अंधेरा ही है। दारू ऐसे में और भी बहकाती है। ऐसे में जब मनचले रास्ता रोकने लगते हैं तो इन लड़कियों के चेहरे पर क्रोध साफ दिखने लगता है। पहले तो टालने की कोशिश करती हैं, बाद में मारना शुरू कर देती हैं। पहला मुक्का खाकर तो लड़का ऐसे भाव प्रकट करता है कि धरती पर महाप्रलय आ गई है, लेकिन जब लगातार हाथ पड़ने शुरू हो जाते हैं, तो अपना बचाव करने में जुट जाते हैं।
सड़क पर भीड़ जमा हो चुकी होती है, बालकनी में भी अच्छी-खासी तादात में लोग हैं। मूक दर्शक बन मार-पीट देखना किसे नहीं पसंद होता है। एक लड़की का पति भी इसी भीड़ का हिस्सा बना होता है। उसका खुद के मर्द होने का भ्रम टूट चुका था क्योंकि उसकी पत्नी मनचलों को सड़क पर बिछा चुकी थी।
एक नया दिन आता है। फिल्म के टाइटल की तरह... 'दि डे आफ्टर एवरीडे'। लेकिन ये सुबह कुछ अलग थी। गैस पर बर्तन चढ़ा हुआ है। पति के हाथ में चाय पत्ती है। अपनी पत्नी की तारीफ करते हुए कहता है कि उसने सही किया। ऐसे लोगों को सबक सिखाना जरूरी होता है। जब शक्कर का डिब्बा हाथ में आता है तो पत्नी से सवाल पूछता है- 'तुम कितनी शक्कर लेती हो चाय में...?'
आवाज में घबराहट है, शर्म भी है। इतनी, जितनी कि पुरुष प्रधानता को खत्म करने के लिए काफी है। फिल्म की अच्छी बात ये है कि महिलाओं को जिस संघर्ष के लिए बढ़ावा दिया जाता है, उसे करके भी दिखाया गया है। टीवी पर दामिनी की खबर सभी को सहमाती है, लेकिन शायद ये वो 'बुलेटिन' है, जो उन्हें हिम्मत देगा। उम्मीद है कि हर महिला की जिंदगी में सुबह होगी, लेकिन अलग होगी।
अब ये फिल्म सिनेमाघरों में तो रिलीज नहीं होगी लेकिन हम आपको बता दें कि इसकी कहानी लिखी है नितिन भारद्वाज ने और अनुराग कश्यप का निर्देशन हमेशा की तरह बेहतरीन रहा। अनुराग वैसे तो हमेशा हार्ड प्लॉट की फिल्में बनाते हैं, लेकिन इस बार रियलिस्टिक टॉपिक पर उनकी बनाई गई फिल्म शानदार प्रयास है। स्क्रिप्ट भी सधी हुई है। हमारी तरप से इस फिल्म को 3.5 स्टार।

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