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MOVIE REVIEW: आत्मा

Dainik Bhaskar

Mar 22, 2013, 03:53 PM IST

हम दर्शकों की चहल-पहल से अंदाजा लगा सकते हैं कि कोई हॉरर फिल्‍म उन्‍हें डराने में कामयाब हो पा रही है या नहीं।

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हम दर्शकों की चहल-पहल से अंदाजा लगा सकते हैं कि कोई हॉरर फिल्‍म उन्‍हें डराने में कामयाब हो पा रही है या नहीं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि फिल्‍म बहुत अच्‍छी है या बहुत बुरी, दर्शक हंसते जरूर हैं। लेकिन हमें यह पता करना होता है कि कहीं दर्शकों की सिट्टी-पिट्टी तो गुम नहीं है और कहीं वे अपना डर भगाने के लिए तो नहीं हंस रहे हैं?

वर्ष 2003 की फिल्‍म भूत को याद करें। या कहीं ऐसा तो नहीं कि दर्शक इसलिए हंस रहे हैं, क्‍योंकि उन्‍होंने जिसे हॉरर फिल्‍म समझा था, वह तो कॉमेडी है। और अब वर्ष 2012 की फिल्‍म 'भूत रिटर्न्‍स' याद करें।

मैं जिस थिएटर में यह फिल्‍म देख रहा था (यह एक प्रेस प्रिव्‍यू था और वहां अच्‍छी-खासी तादाद में लोग मौजूद थे), वहां मैं लगातार दूसरी तरह की हंसी सुनता रहा। लोग किसी डर को दबाने के बजाय मजे से हंस रहे थे। लेकिन यह हमारे होस्‍ट और स्‍क्रीन पर दिखाए जा रहे (या नहीं दिखाए जा रहे!) घोस्‍ट दोनों के लिए अच्‍छी खबर नहीं थी।

भूत परदे पर नजर आया हो या नहीं, इतना तो तय है कि वह लोगों को डराने में नाकाम रहा। हां, भूत एक बार एक स्‍कूल टीचर को डराने के लिए जरूर आता है, लेकिन हमें यह सोचकर हैरानी होती है कि आखिर यह टीचर इतनी देर रात को सूने स्‍कूल में अकेले कॉपियां क्‍यों जांच रही थी। मैं तो समझता था कि टीचर्स आमतौर पर इस तरह का काम घर पर करते हैं, अलबत्‍ता यह भी उनके लिए बुरी बात ही है कि उन्‍हें घर पर भी काम करना पड़ता है।

टीचर को आईनों में भूत नजर आता है। मिस्‍टर इंडिया की तरह हम भी उसे कभी-कभार रेड लाइट में देख सकते हैं। वह फोन पर कॉल कर सकता है और खुद को कम्प्‍यूटर स्‍क्रीन पर भी चिपका सकता है। लेकिन इसके बावजूद हम यह समझ नहीं पाते कि आखिर वह करना क्‍या चाहता है। जिंदगी में हर आदमी का कोई मकसद होता है, भूतों का भी होना चाहिए।

इस भूत की भूमिका नवाजुद्दीन ने निभाई है। उसने अपनी पत्‍नी से तलाक ले लिया था और अपनी इकलौती बच्‍ची के साथ अलग रहता था। जब वह जिंदा था तो एक शक्‍की और हिंसक पति हुआ करता था। उच्‍च मध्‍यवर्ग में आमतौर पर इस तरह के पति नहीं पाए जाते। हमें यह भी नहीं बताया जाता है कि आखिर उसके द्वारा ऐसा व्‍यवहार करने के पीछे क्‍या कारण है। अब जब वह मर चुका है तो वह अपनी बच्‍ची को लेकर पजेसिव हो जाता है।

उसकी पत्‍नी (बिपाशा) को बुरे सपने आते हैं। जब वह उसे बाथरूम में देखती है, तभी उसे उसकी एक दोस्‍त का फोन आता है, जो उससे कहती है : मैं तुम्‍हारे नाइटमेयर्स के बारे में सोच रही थी। एक शार्प ऑब्‍जेक्‍ट अपने तकिये के नीचे रखो, नहीं आएंगे। लेकिन तभी हवा में चाकू लहराने लगते हैं। यदि आप दर्शकों के बीच बैठकर यह सब देख रहे हों तो यकीनन सिर पीट लेंगे।

इसके बाद अनेक मौतें होती हैं। हर कत्‍ल की जांच करने एक ही पुलिस वाला आता है, जो हमेशा बहुत गंभीर नजर आता है। उसका चेहरा हमेशा चढ़ा हुआ रहता है। हम मुस्‍करा देते हैं। फिल्‍म में मनोवैज्ञानिक भी हैं और आध्‍यात्मिक गुरु भी। गुरु दृश्‍य में दाखिल होते हैं और धीमे-से कहते हैं : मैं हरिद्वार जा रहा हूं। वहां गुरुजी से इसके बारे में पूछूंगा। अब हम खिलखिलाकर हंसने लगते हैं।

धार्मिक और हॉरर कहानियों का चोली-दामन का साथ होता है। हम इन फिल्‍मों के बारे में सोचते नहीं, उन पर भरोसा करते हैं। या नहीं करते हैं। भगवान जानता है कि इस देश का हर ग्रामीण व्‍यक्ति अपनी जिंदगी में कभी न कभी भूतों से मिल चुका है।

रामसे ब्रदर्स (वीराना, दो गज जमीन के नीचे, वगैरह) ने इस तरह के दर्शकों के लिए अनेक लो-बजट फिल्‍में बनाईं। इस फिल्‍म में होम डेकोरेशन बहुत खूबसूरती से किया गया है और इसका छायांकन भी बहुत बढि़या है, लेकिन शायद इसी से फिल्‍म का मूड बहुत नीरस भी हो जाता है। इतना तो तय है कि इससे दर्शकों को वह मजा नहीं आता, जो उन्‍हें चीप किस्‍म की हॉरर फिल्‍में देखकर आता होगा।

लेकिन उस बच्‍ची का क्‍या हुआ। किसी मासूम-से दिखने वाले बच्‍चे के दिमाग में चल रही भयावह चीजों से ज्‍यादा डरावना नजारा शायद और कोई नहीं हो सकता। वर्ष 1982 की फिल्‍म ‘पोल्‍टरग्रीस्‍ट’ शायद इस तरह की फिल्‍मों की जनक कही जा सकती है।

भूत की बेटी यह मानने से इनकार कर देती है कि उसके पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। वह अपने मृत पिता से बातें करती रहती है और आखिर में इसी की वजह से बहुत खूनखराबा हो जाता है। आखिरकार, उसे अपने इर्द-गिर्द बहुत सारे मुर्दा नजर आते हैं। मुझे अपने आसपास बहुत सारे मूर्ख नजर आते हैं। निश्चित ही, परदे पर।

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