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'हिम्‍मतवाला'

यह 1980 के दशक में आधारित फिल्‍म नहीं है, यह 1980 के दशक में बनी फिल्‍मों के दायरे में रहने वाली फिल्‍म है, लिहाजा इसे एक विचित्र पीरियड फिल्‍म ही कहा जा सकता है।

Dainik Bhaskar

Mar 29, 2013, 04:59 PM IST
movie review:himmatwala

यह 1980 के दशक में आधारित फिल्‍म नहीं है, यह 1980 के दशक में बनी फिल्‍मों के दायरे में रहने वाली फिल्‍म है, लिहाजा इसे एक विचित्र पीरियड फिल्‍म ही कहा जा सकता है।

अधिकांश रीमेक्‍स में, जैसे कि फरहान अख्‍तर की डॉन, करन मलहोत्रा की अग्निपथ, या यहां तक कि राम गोपाल वर्मा की आग तक में निर्देशक मूल कथानक और चरित्रों को तो यथावत रखता है, लेकिन फिल्‍म को वह अपने ढंग से बनाता है। इसीलिए इस तरह की फिल्‍मों को सीधी नकल के बजाय रीमेक कहा जाता है।

फिर कुछ फिल्‍में ऐसी होती हैं, जो किसी बीते कालखंड को अपनी आदरांजलि देती है, जैसे फराह खान की बेहतरीन फिल्‍म ओम शांति ओम, या मिलन लूथरिया की डर्टी पिक्‍चर।

उस जमाने के दर्शक इस तरह की फिल्‍मों को देखकर मुस्‍करा देते हैं और उसका मजा लेते हैं। लेकिन इस हिम्‍मतवाला को तो वर्ष 1983 में जीतेंद्र की हिम्‍मतवाला के साथ ही रिलीज किया जा सकता था और दोनों का असर एक जैसा ही होता।

फर्क इतना ही है कि इस फिल्‍म में हिम्‍मतवाला रवि की भूमिका अजय देवगन निभा रहे हैं। हीरोइन हंटरवाली है और वह अपने ड्राइवर पर इस हंटर का इस्‍तेमाल करती है, क्‍योंकि वह उसे लेने स्‍टेशन नहीं आया था।

‘आई हेट गरीब्‍स’, वह बार-बार दोहराती रहती है। लेकिन पता नहीं कब उसे गरीबों से प्‍यार हो जाता है और वह उनकी खातिर अपने अमीर बाप को बरबाद करने पर भी आमादा हो जाती है।

1980 के दशक में बनने वाली अनेक मेनस्‍ट्रीम फिल्‍मों की पृष्‍ठभूमि बहुत सीधी-सरल होती है। तब की फिल्‍में भेलपूरी की तरह हुआ करती थीं, इमोशन भी हो, ड्रामा भी हो, रोमांस भी हो, एक्‍शन भी हो, सब कुछ हो, सिवाय स्‍टोरी न हो। उस जमाने के निर्माता भी जानते थे कि दर्शकों को भी इससे ऐतराज न होगा।

निश्चित ही, दर्शकों को इस पर कोई ऐतराज नहीं था, इसीलिए तो तब एक ही फिल्‍म के अनेक संस्‍करण धड़ाधड़ रिलीज कर दिए जाते थे।

इनमें भी कुछ निर्माता साउथ के हुआ करते थे। हिंदी पर उनकी पकड़ नहीं थी, इसीलिए मूल फिल्‍म से उठाकर ताथैया-ताथैया और ताकि-ताकि जैसे शब्‍द यहां भी चला दिए जाते थे। कैमरा भी आमतौर पर हीरोइन के नितंबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता था।

गनीमत है कि इस फिल्‍म में ऐसा नहीं होता। लेकिन 1983 के हिम्‍मतवाला के कुछ सामाजिक सरोकार भी हुआ करते थे। वह बाढ़ पीडि़तों की मदद के लिए ग्रामीणों को एकजुट करता है। लेकिन इस वाले हिम्‍मतवाले को ऐसा कोई शौक नहीं है। उसे अपने टाइगर, अपनी हीरोइन और अपने इर्द-गिर्द मौजूद विलेनों से फुरसत मिले, तब ना।

वह रामनगर का वासी है, जहां का सबसे लोकप्रिय हथियार रामपुरी चाकू है। उसे अपने बाप की मौत का बदला लेना है। उसकी मां और बहन को गांव से निकाल बाहर कर दिया गया है। अमीर सरपंच, जो निश्चित ही गांव का ठाकुर है, का एक चमचा है, जिसका बेटा रवि की बहन से शादी कर लेता है।

वह उसे प्रताडि़त करता है। रवि सरपंच के पास पहुंच जाता है और वह दावा करता है कि उसने उसकी बेटी को प्रेगनेंट कर दिया है। अब विलेन हीरो के रहमोकरम पर है। इस पागल संसार में भला कोई औरत बनकर क्‍यों पैदा होना चाहेगा? बशर्ते, रवि यह न कहे कि – जब तक औरत पर होगा जुल्‍म, तब तक इंसान बनेगा हिम्‍मतवाला।

वैसे हिम्‍मतवाला उस जमाने में बहुत बड़ी हिट थी, जब टीवी, भले ही उसमें दूरदर्शन ही चलता हो, बहुत इफरात में नहीं हुआ करती थीं। ऐसे में लोग बड़े परदे पर सिनेमा देखकर ही खुश हो जाते थे। लेकिन मुझे नहीं लगता कि कुछेक लोगों को छोड़कर वह फिल्‍म आज किसी की यादों में जिंदा होगी। इस तरह की
फिल्‍मों को देखने का केवल एक ही तरीका है और वह यह कि उसमें दिखाए जाने वाले पागलपन का भरपूर
मजा लिया जाए। यही कारण है कि कांति शाह की सी-ग्रेड फिल्‍म गुंडा (1994) इंटरनेट पर कल्‍ट फिल्‍म
की हैसियत पा जाती है। यह फिल्‍म भी कुछ-कुछ उसी की तर्ज पर बनाई गई है। ‘बहन का भाई और मां का
बेटा’ हिम्‍मतवाला है।
महेश मांजरेकर मुख्‍य विलेन की भूमिका निभा रहे हैं, जबकि यह रोल मोहन जोशी पर ज्‍यादा फबता। उसके चमचे की भूमिका परेश रावल ने निभाई है, जो कादर खान की नकल करते नजर आते हैं। लिहाजा हम फौरन समझ जाते हैं कि यह फिल्‍म किन लोगों के लिए बनाई गई है। इस फिल्‍म से भी यही उम्‍मीद की जा रही है कि वह बॉक्‍स ऑफिस पर सौ करोड़ रुपए कमाने में कामयाब होगी।
फिल्‍म का सुपर सितारा हीरो गुजराती, पंजाबी, बंगाली, मराठी हर भाषा बोल लेता है ताकि इन सभी क्षेत्रों के अपने
दर्शक वर्ग को लुभा सके। लेकिन हम सिनेमा हॉल के भीतर बैठे यही उम्‍मीद करते रहते हैं कि कब य‍ह
फिल्‍म खत्‍म हो। हमें लगता है कि ‘दि एंड’ ही हमारा इकलौता दोस्‍त हो सकता है। आखिरकार यह फिल्‍म
खत्‍म होती है और हमें परदे यह लिखा हुआ नजर आता है : इट्स अ साजिद खान इंटरटेनर। सच कहें तो इस
फिल्‍म का निर्देशक ही इसे फिल्‍म नहीं कहना चाहता।
यह है भी नहीं। मैं तो बस यही सोच रहा हूं कि क्‍या हो अगर इसके बाद एक और नया ट्रेंड शुरू हो जाए और कहीं हम फिर से कंचे, लूडो, सांप-सीढ़ी वगैरह न
खेलने लग जाएं।
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