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MOVIE REVIEW: सत्याग्रह

Mayank Shekhar

Aug 30, 2013, 04:37 PM IST

फिल्‍म की ऐन शुरुआत में हम अजय देवगन को एक नौजवान के रूप में देखते हैं, जो अपने सबसे अच्‍छे दोस्‍त की शादी में एक छोटे शहर जा रहा है।

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बक बक बक...

फिल्‍म की ऐन शुरुआत में हम अजय देवगन को एक ऐसे नौजवान के रूप में देखते हैं, जो अपने सबसे अच्‍छे दोस्‍त की शादी में एक छोटे शहर जा रहा है। दोस्‍त के पिता (अमिताभ बच्‍चन) एक सिद्धांतवादी किस्‍म के व्‍यक्ति हैं, जो पहले किसी स्‍थानीय स्‍कूल के प्रिंसिपल हुआ करते थे।

घर पर खाने के दौरान पिता (हम उन्‍हें बीएफएफ के नाम से बुला सकते हैं) उस नौजवान से पूछते हैं कि उसने अपने आने वाले कल के बारे में क्‍या सोचा है, वग़ैरह-वग़ैरह। नौजवान उन्‍हें बताता है कि वह पढ़ाई पूरी करने के बाद अपना कोई बिज़नेस करना चाहता है।

उसका इतना कहना भर था कि बीएफएफ भड़क उठते हैं और उस पर और उसके जैसे दूसरे लोगों पर लालची और खुदगर्ज होने का इल्‍जाम लगा देते हैं। वे उस दुनिया की लानत-मलामत करने लगते हैं, जहां पैसा ही इकलौता धर्म है और बाजार ही इकलौती नैतिकता। जहां तक मेरा खयाल है वह बेचारा नौजवान तो उस समय तक अपनी मास्‍टर डिग्री ही हासिल करने की कोशिश कर रहा था।

बाद में रात को जब वह अपने दोस्‍त के साथ ड्रिंक कर रहा होता है तो बीएफएफ महोदय छत पर भी चले आते हैं और लेक्‍चर झाड़ने लगते हैं। वे यह मान लेते हैं‍ कि उनका बेटा एक बुरी सोहबत में है। जबकि उनका बेटा पीडब्‍ल्‍यूडी में इंजीनियर है। रात खत्‍म होते-होते वह नौजवान ऑटो-रिक्‍शा पकड़ता है और शादी अटेंड किए बिना ही लौट जाता है।

यह फिल्‍म का शुरुआती सीक्‍वेंस है और यह नाटकीयता से भरी इस फिल्‍म की दिशा तय कर देता है। ढाई घंटे की इस फिल्‍म में हम आखिर तक यही समझ नहीं पाते कि आखिर यहां सभी लोग इतने गंभीर क्‍यों है और नैतिकता का ढिंढोरा क्‍यों पीट रहे हैं। हम बस इतना ही समझ पाते हैं कि कोई है जो सही है और बाकी सब गलत हैं।

बहरहाल, महज तीन साल में अजय देवगन की कुल संपत्ति छह हजार करोड़ रुपए हो जाती है। उनका सबसे अच्‍छा दोस्‍त अब इस दुनिया में नहीं है। एक रोड एक्‍सीडेंट में उसकी मौत हो चुकी है। उसके पिता कलेक्‍टर को तमाचा जड़ देने के जुर्म में लॉकअप में कैद हैं। बेटे की मौत पर सरकार द्वारा दिया जाने वाला मुआवज़ा उन्‍हें अभी तक नहीं मिला है।

चंद ही मिनटों में नाटकीय बदलाव होता है और हमें बताया भी नहीं जाता कि ऐसा चमत्‍कार कैसे हुआ, लेकिन अजय देवगन बीएफएफ, या मास्‍टरजी, या दद्दूजी को छुड़वाने के लिए एक आंदोलन छेड़ देते हैं। दिल्‍ली की एक बड़ी पत्रकार (करीना कपूर) तो उस छोटे कस्‍बे को ही अपना ठिकाना बना लेती है।

उसके द्वारा दिए जाने वाले मिस्‍ड कॉल की तादाद से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि वह कितनी धुरंधर पत्रकार होंगी। वह एक मंत्री को 17 मिस्‍ड कॉल देती है तो अजय देवगन को 203। वह प्रधानमंत्री का इंटरव्‍यू करने का एक असाइनमेंट ठुकरा देती है और उसका संपादक कुछ नहीं कर पाता। वह अधिकृत रूप से भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन में भी शामिल हो जाती है। एक लोकल दादा (अर्जुन रामपाल) भी उसके साथ हो जाता है और एक जूनियर पुलिस वाला भी।

हर चंद मिनटों बाद हमें स्‍क्रीन पर फेसबुक के स्‍टेटस और ट्वीट दिखाई देते हैं। एक के बार एक रैलियां होती रहती हैं। भाषणबाजी होती है, श्रोता सिर हिलाते हैं, संघर्ष का नारा बुलंद करते हैं और वाटर कैनन से जूझते हैं। निश्चित ही, भ्रष्‍टाचार का विरोध कर रही यह जनता भ्रष्‍टाचार से पूरी तरह महरूम है। वह बात-बात पर घूस मांगने वाले कलेक्‍टोरेट से तंग आ चुकी है। दद्दू चाहते हैं कि 30 दिन के भीतर सभी लंबित सरकारी अर्जियों का निपटारा कर दिया जाए!

अब तक आप समझ चुके होंगे कि यह किस तरह की फिल्‍म है। यह एक पॉलिटिकल थ्रिलर है। फिल्‍म के निर्देशक प्रकाश झा हैं, जिनकी अपनी एक खास शैली बन चुकी है।

फिल्‍म की लोकेशन है भोपाल। फिल्‍म में दिखाए गए लोग कुछ-कुछ बिहारी लहजे में बात करते हैं। यह लगभग झा की पिछली फिल्‍म आरक्षण की एक सीक्‍वेल की तरह है और इसमें भी अमिताभ ने एक नैतिकतावादी व्‍यक्ति की भूमिका निभाई है। उनका दिल उस सताई हुई जनता के लिए धड़कता है, जो शातिर गृह मंत्री (मनोज बाजपेयी) जैसे नेताओं से परेशान है। विपक्ष के नेता (विपिन शर्मा) भी कोई कमखुदा नहीं हैं।

फिल्‍म में हम जो भ्रष्‍टाचार विरोधी आंदोलन देखते हैं, वह हमें वर्ष 2011 के अन्‍ना हजारे के आंदोलन की याद दिलाता है। इस फिल्‍म की ही तरह वह आंदोलन भी पहले सोशल मीडिया पर सुर्खियों में आया था और फिर कुछ समय के लिए ही सही, पर पूरे देश में छा गया था।

इस फिल्‍म में दिखाया गया आंदोलन अलबत्‍ता एक छोटे शहर की पृष्‍ठभूमि पर है, लेकिन उसकी मांगें लगातार बदलती रहती है। कभी आंदोलनकारी कलेक्‍टर को हटाने की मांग करते हैं, कभी लोगों द्वारा उसका चयन करने की बात करते हैं, कभी वे इस बात पर अड़ जाते हैं कि कोई अध्‍यादेश पारित किया जाए, अलबत्‍ता दद्दूजी और उनके साथी उसके बारे में कम ही बात करते हैं।

वे भ्रष्‍टाचार की मुखालफत कर रहे हैं। हम अच्‍छी तरह समझ जाते हैं। लेकिन आखिर कहानी क्‍या है? कहानी की खोज में फिल्‍मकार अजय के दोस्‍त के कातिलों की खोज में जुट जाता है। यह चरित्र समाजसेवी सत्‍येंद्र दुबे के जीवन से प्रेरित है, जिन्‍होंने नेशनल हाईवे प्रोजेक्‍ट की गड़बडि़यों का खुलासा किया था। वर्ष 2005 में सरकार का प्रश्रय प्राप्‍त माफिया ने उनकी हत्‍या कर दी थी।

लेकिन जब यह कहानी भी रफ्तार नहीं पकड़ पाती तो हम फिर रैलियों की ओर लौट आते हैं। फिल्‍म हमें भूख, गरीबी और भ्रष्‍टाचार के बारे में अधकचरे विचार परोसती रहती है।

वह इंटरटेनिंग होने के साथ ही इंटेलीजेंट होने की भी भरसक कोशिश करती है, अलबत्‍ता वह न तो इंटरटेनिंग साबित हो पाती है और न ही इंटेलीजेंट। कुछ समय बाद हम खुद से कहने लगते हैं : ‘अब बस बहुत हो गया यार, बंद करो बक-बक।’ वह टीवी पर पहले ही काफी होती है!

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