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FIRST SHOW FIRST REACTION: सत्याग्रह

अन्ना हज़ारे की ही तरह फिल्म में गांधीवादी विचारधारा पर चले हैं दादूजी उर्फ द्वारका आनंद उर्फ अमिताभ बच्चन।

Dainik Bhaskar

Aug 30, 2013, 02:24 AM IST
Satyagraha first show first reaction

भले ही प्रकाश झा लाख बार कहें कि उनकी इस हफ्ते रिलीज़ हुई फिल्म सत्याग्रह का अन्ना हज़ारे से कुछ लेना-देना नहीं है, लेकिन कहानी में अमिताभ उर्फ दादूजी उर्फ द्वारका आनंद के विचार और उनका व्यक्तित्व इस बात की ओर साफ संकेत करता है कि प्रकाश झा की फिल्म अन्ना हज़ारे द्वारा भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ छेड़ी गई जंग से प्रेरित है।अन्ना हज़ारे की ही तरह फिल्म में गांधीवादी विचारधारा पर चले हैं दादूजी उर्फ द्वारका आनंद उर्फ अमिताभ बच्चन। असल ज़िंदगी में समजासेवी अन्ना हज़ारे ने देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा था, उसे परदे पर पेश करने की कोशिश की है प्रकाश झा ने। अन्ना की देश भक्ति ने हिंदुस्तान को ऐसा हिला दिया था कि हर शहर में इसका प्रभाव दिखा, लोग घरों से निकलकर अन्ना के समर्थन में सड़कों पर उतर आए, 24 घंटे न्यूज़ चैनल पर अन्ना के चर्चे होते और अन्ना के नारे बच्चों तक ने गलियों में लगाने शुरू कर दिए थे।

जहां अन्ना ने जन लोकपाल बिल की मांग की थी, वहीं परदे पर दादूजी भी जन सत्याग्रह चलाके भ्रष्टाचार के बोझ से दबी लाखों फाइलों से धूल हटाना चाहते थे। साल 2011 में अन्ना ने सिस्टम को सुधारने की जो जंग छेड़ी, वो जज़्बा जो उनकी आंखों में नज़र आता था देश के लिए कुछ कर गुज़रने का, वो ताकत जो 70 पार अन्ना में दिखी थी, वही जोश, वही जज़्बा, वही विचार बिग बी ने सत्याग्रह में अपने किरदार दादूजी में पिरोए। अन्ना की तरह अनशन भी किया, खुद को कमज़ोर नहीं होने दिया, पब्लिक के लिए अपना मन ही नहीं, तन भी न्यौछावर कर दिया।

यानी देश के हीरो के किरदार को बच्चन साहब ने सिर्फ निभाया ही नहीं, बल्कि जीकर भी दिखाया। शायद इसी के चलते बिग बी बॉलीवुड के शाहंशाह कहे जाते हैं।

अमिताभ के अलावा कहानी का एक अहम रोल राजनेता बलराम सिंह का किरदार निभाया है मनोज वाजपेयी ने, जिनकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम होगी। हालांकि, इस तरह के सीरियस, इंटेंस और ग्रे-शेड वाला किरदार मनोज ने पहली बार नहीं निभाया। लेकिन कहना होगा कि नेशनल अवॉर्ड विनर मनोज के बिना यह फिल्म बनाना मुमिकन नहीं था। लेकिन जनता- जनार्दन के लिए फिल्म की कहानी भी उतनी ही ज़रूरी है, जितने कि इसके किरदार। तो क्या राजनीति पर फिल्में बनाने में माहिर प्रकाश झा सत्याग्रह की कहानी के साथ इंसाफ कर पाए?

यह कहानी है अम्बिकापुर की, जहां अपने बेटे अखिलेश आनंद के साथ रहता है उसका 70 साल का पिता द्वारका आनंद। द्वारका ज़िले के स्कूल का पूर्व प्रिंसिपल है, लेकिन अभी भी बच्चों को पढ़ाकर सामाजिक कार्य में जुटा हुआ है। अपने आदर्शों का पक्का, हर पल देश की उन्नति के लिए सोचना उसका धर्म है और न सिर्फ न्याय की राह पर चलता है, बल्कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ भी उठाता है।

पिता की तरह उसका होनहार इंजीनियर बेटा अखिलेश उर्फ इंद्रनील सेनगुप्ता भी है, जो सरकार के लिए अच्छी, पक्की सड़क बनाना चाहता है और रिटायरमेंट के बाद ज़िले के बच्चों के लिए स्कूल खोलना चाहता है।

साल 2011 के बाद अमृता को आप अब देखेंगे और वो भी अखिलेश की पत्नी सुमित्रा के किरदार में। सुमित्रा न सिर्फ अपने पति का ख्याल रखती है, बल्कि अपने ससुर द्वारका का भी पूरा सम्मान करते हुए उन्हीं की विचारधारा को अपनाती है। लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है, जब अखिलेश की ट्रक दुर्घटना में मौत हो जाती है और अखिलेश का बेस्ट फ्रेंड मानव उर्फ अजय देवगन अपने दोस्त के परिवार को संभालने के लिए अम्बिकापुर आता है।

वैसे तो मानव खूब पैसा कमाना चाहता है और सफलता की ऊंचाइयों को छूना चाहता है, लेकिन अखिलेश की अचानक मौत के बाद न सिर्फ अम्बिकापुरा में नया अध्याय लिखा जाता है, बल्कि मानव की ज़िंदगी भी बदल जाती है। ऐसा तब होता है, जब द्वारका आनंद कलेक्टर साहब को पूरे ऑफिस के सामने एक ज़ोरदार तमाचा जड़ते हैं, इसलिए नहीं कि वो अखिलेश की मौत के बाद 25 लाख रुपए का मुआवज़ा देने में देर लगाता है, बल्कि इसलिए कि द्वारका की बहू सुमित्रा भ्रष्ट सरकारी नौकरों को फाइल पास कराने के लिए घूस नहीं देती।

कलेक्टर को चांटा मारने के अपराध में मास्टर आनंद को सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है। मानव की उन्हें छुड़ाने की मुहिम इतनी बड़ी हो जाती है कि उसमें पूरी जनता शामिल हो जाती है। फिर यह जंग सिर्फ एक आदमी की नहीं, बल्कि देश के सभी लोगों की बन जाती है।

जनता का आक्रोश सड़कों पर दिखने लगता है। हर गली, हर नुक्कड़ में जन सत्याग्रह का नारा लगाता आम आदमी दिखता है। द्वारका आनंद उर्फ दादूजी का वो शिष्य, जिसका स्कूल से ही गुंडागर्दी में ध्यान था, अब बड़ा होकर वो राजनीति में जाना चाहता है। वह भी सच के लिए चल रही जंग में दादूजी के साथ खड़ा हो जाता है। अर्जुन रामपाल का नाम कहानी में भी अर्जुन ही है।

जैसे अन्ना हज़ारे की जंग वकील प्रशांत भूषण के बिना अधूरी थी, वैसे ही दादूजी की जंग वकील इंद्रजीत के बिना अधूरी थी, जिनकी शक्ल भी हुबहू प्रशांत भूषण से मिलती है।

फिल्म में करीना एक पत्रकार यासमीन अहमद की भूमिका निभा रही हैं। लेकिन यह ऐसी पत्रकार हैं जिन्हें लोग कहानी में सुनना कम और इनकी खूबसूरती निहारना ज़्यादा पसंद करेंगे।

कहानी का फर्स्ट हाफ भले ही दर्शकों को थिएटर की कुर्सी पर चिपकाए रखता है, लेकिन इंटरवल के 5 मिनट बाद ही आप कहानी से अपना इंटरेस्ट खोने लग जाते हैं। सेकेंड हाफ में कहानी के हीरो यानी दादूजी की मौत, खून खराबा, दंगा-फसाद, हिंसा, टकराव कहानी को न सिर्फ ढीला करता है, बल्कि ट्रैक से भी दूर ले जाता है।

कहानी में स्टार वैल्यू की कोई कमी नहीं। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि ये सभी एक्टर्स काफी दमदार हैं, लेकिन ढीले स्क्रीनप्ले के चलते प्रकाश झा इन एक्टर्स के साथ जस्टिस नहीं कर पाए। यानी कहानी और भी ठीक से बताई जा सकती थी। पब्लिक का महत्व और कहानी में दिखाए गए आंदोलन में आग और जोश ज्यादा दिख सकता था।

सेकंड हाफ में जिस तरह कहानी और उसके किरदार इधर-उधर बिखरते दिखाई देते हैं, दर्शकों का जज़्बा भी कम होता जाता है। कहानी का एंड सबसे ज़्यादा निराश करने वाला है। इस मल्टीस्टारर फिल्म में महात्मा गांधी के सत्याग्रह के संदेश को प्रकाश झा जितनी बखूबी से पहुंचा सकते थे, ऐसा नहीं हुआ।

इस फिल्म की शूटिंग दिल्ली, भोपाल और अन्ना हज़ारे के गांव रालेगांव सिद्धी में हुई है। डायरेक्टर के पास लोकेशन्स की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पब्लिक का जोश उतना नहीं दिखा कि दर्शकों को इंस्पायर कर सके।

कहानी में म्यूज़िक सलीम-सुलेमान, आदेश श्रीवास्तव और इंडियन ओशन बैंड ने दिया है, जो कानों को चुभता तो नहीं है, लेकिन थोड़े और जोश जगाने वाले बोल और म्यूज़िक की ज़रूरत थी।

क्यों इस फिल्म को हमारी तरफ से ढाई स्टार्स मिलते हैं ?

1- कहानी के हीरो यानी दादूजी का हिंसा के दौरान मरना, जैसे शरीर से आत्मा का निकलना होता है। अगर कहानी में अंत तक अहिंसा के तहत संदेश दर्शकों के दिलों में घर कर दिया जाता, तो फिल्म की रेटिंग बढ़ सकती थी।

2- कहानी में पब्लिक में जोश की कमी नज़र आई, क्योंकि फिल्म में लड़ाई ही पब्लिक के लिए थी। ऐसे में आंदोलन की आग कम दिखी। फिल्म का अंत सबसे ज़्यादा निराश करता है। ढीली स्क्रिप्ट और स्क्रीनप्ले का साफ संकेत मिलता है।

3- लीक से हटकर बहुत ही कम ऐसी फिल्में होती हैं जो बॉक्स ऑफिस पर पैसों की बरसात कर पाती हैं।

इस मल्टीस्टारर फिल्म में बड़े एक्टर्स की कोई कमी नहीं थी। अमिताभ, करीना, अजय, अर्जुन जैसे सारे एक्टर्स मौजूद थे जो कमर्शल ही नहीं, लीक से हटकर फिल्मों के लिए भी काफी फायदेमंद साबित हुए हैं। लेकिन इस कहानी में संदेश था, संदेश अहिंसा के मार्ग पर चलकर न्याय पाने का, देश की हालत सुधारने का, घूसखोरों को बेनकाब करने का, आम आदमी का हक दिलाने का और हिंदुस्तान की प्रगति की तरफ कदम बढ़ाने का।फर्स्ट हाफ में आपको ऐसा प्रतीत ज़रूर होगा, लेकिन सेकंड हाफ आते ही कहानी अपनी मंज़िल से इधर-उधर होती नज़र आती है। फिल्म का टाइटल सत्याग्रह रखा है, लेकिन फिल्म में खून-खराबा और मसाला डालने के लिए फिज़ूल का करीना-अजय का किस, लव-मेकिंग सीन दर्शकों को कहानी की थीम से भटकाता है। यानी सोशल मैसेज देने वाली फिल्म में कमर्शल फील देने का तड़का जमा नहीं।

4- अर्जुन रामपाल कैमरे में तो सारा समय रहे, लेकिन उनके रोल को और दमदार बनाया जा सकता था। उनकी भूमिका एक साइड हीरो की तरह दिखी। अमिताभ और मनोज की एक्टिंग के आगे कोई नहीं टिका।

5- फिल्म दामुल से हिंदी फिल्मों में कदम रखने वाले डायरेक्टर प्रकाश झा से दर्शकों को बेहद उम्मीद थी। मृत्युदंड, गंगाजल और राजनीति जैसी दमदार फिल्मों के बाद, प्रकाश की यह फिल्म उतनी दमदार नहीं लगी और दर्शकों तक कहानी का संदेश उस कदर नहीं पहुंचा पाई कि देखने वाले के दिल में देश भक्ति की लौ जल जाए।

इसलिए फिल्म को ढाई स्टार्स

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