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ज़ायकेदार एक्टिंग से भरा ज़ोरदार ‘लंचबॉक्स’

कहानी का ज़ायका बढ़ाने के लिए इरफान, नवाज़ुद्दीन, भारती आचरेकर और निमरत कौर जैसे अद्भुत और एफर्टलेस सितारे।

Dainik Bhaskar

Sep 17, 2013, 12:09 AM IST
The Lunchbox review

किसी आदमी के दिल में जाने का रास्ता उसके पेट से होकर जाता है। इस लंचबॉक्स की खूबी यही है। लगभग उबाऊ-सी ज़िंदगी जीनेवाले एक आदमी के रूटीन में एक मामूली-सा लंचबॉक्स क्या रस घोलता है, फिल्म की कहानी इसी पर है। बेहद सादी-सी लेकिन कमाल की...ऊपर से कहानी का ज़ायका बढ़ाने के लिए इरफान, नवाज़ुद्दीन, भारती आचरेकर और निमरत कौर जैसे अद्भुत और एफर्टलेस सितारे।

इरफान ख़ान उर्फ साजन फर्नांडीस की इतनी भी उम्र नहीं थी, जितना बूढ़ा वो खुद को मानने लगे थे। बीवी के देहांत के बाद, तनहाई ने इश्क, प्यार और मुहब्बत की खिड़कियां ही बंद कर दी थी। दिल की धड़कनें सिर्फ जीने के लिए ही चलती थीं और दिमाग ने समय से पहले ही रिटायरमेंट लेने का फैसला कर लिया था। बस फिर एक दिन अचानक, किसी का दिल खाने के डब्बे में बंद होकर मिस्टर फर्नांडीस के पास आया। वो डब्बा निमरत कौर उर्फ इला के पति राजीव के लिए था, लेकिन कहते हैं न कि दाने-दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम। साजन फर्नांडीस की किस्मत की खिड़कियां ऐसी खुलीं कि न उन्हें खूबसूरत इला के स्वादिष्ट खाने का मज़ा मिलने लगा, बल्कि लंचबॉक्स से निकली महक साजन के दिल को छू गई। अब हर रोज़ सरकारी कर्मचारी साजन जी घड़ी में टाइम देखते कि कब लंचबॉक्स खोलेंगे और खाने के साथ चिट्ठी में आए दिल का दीदार भी करेंगे। इसी बीच एंट्री होती है नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी उर्फ असलम मियां की। लेकिन घबराइए मत, असलम शेख इला और साजन की लव स्टोरी में हड्डी बनकर नहीं आते, बल्कि कहानी में उनकी कॉमिक टाइमिंग और परफॉर्मेंस इतनी बेहतरीन है कि आप खुद ही कहेंगे, ‘जब मिल बैठते हैं साजन और शेख, तब आता है असली मज़ा’।

इला के पति राजीव के पास मोबाइल और ऑफिस के अलावा किसी चीज़ के लिए वक्त नहीं है और साजन से चिट्ठी के बहाने बातें करने से न सिर्फ इला का मन हल्का हो जाता है, बल्कि साजन भी दोबारा हंसना सीख जाते हैं। लेकिन कम्बख़्त कहानी में साजन को यह समझाने वाला कोई नहीं होता कि प्यार में उम्र नहीं देखी जाती, बस दिल जवां होना चाहिए। ऐसे में इला से लगभग 15 साल बड़े साजन उनसे जानबूझकर मिलने का मौका खो देते हैं। फिर कैसे इन दोनों की एक-दूसरे से मिलने की बेकरारी बढ़ती जाती है और दोनों मिलने की कोशिश करते हैं, यही है फिल्म लंचबॉक्स की कहानी।

वहीं, इन दो अनजाने दिलों को मिलवाने के बीच भारती आचरेकर उर्फ मिसेज़ देशपांडे का भी बहुत बड़ा हाथ है, जिन्होंने ही इला को चिट्ठियों के ज़रिए साजन से रू-ब-रू होने के लिए उकसाया था। इला की यह आंटीजी उन्हें किस सब्ज़ी में कौन-सा और कितना मसाला डालना है, यह भी बताती थीं। चिट्ठी में क्या लिखना है, यह भी और इला की इकलौती साथी भी थीं।

फिल्म का रिपोर्ट कार्ड

इस परफॉर्मेंस बेस्ड फिल्म में एक्टर्स इरफान ख़ान, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और भारती आचरेकर की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है। साल 2011 में पद्मश्री अवॉर्ड, साल 2012 में पान सिंह तोमर के लिए बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड और कैरेक्टर रोल्स के लिए मशहूर अभिनेता इरफान ख़ान को इस फिल्म में देखकर लगता है कि यह रोल उनके अलावा कोई दूसरा कर ही नहीं सकता। वो एफर्टलेस एक्सप्रेशन्स कोई और ला ही नहीं सकता था। इरफान ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बेहतर से बेहतर स्क्रिप्ट उनके अभिनय के बिना अधूरी है। वहीं, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी जो पहले ही कहानी और गैंग्स ऑफ वासेपुर जैसी फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से सभी का दिल जीत चुके हैं। इस फिल्म में भी उनकी परफॉर्मेंस देखने लायक है और दर्शकों को पलकें न झपकाने पर मजबूर कर देती हैं।

टीवी शो वागले की दुनिया(1988-1990) की राधिका वागले और दिग्गज़ अभिनेत्री भारती आचरेकर को आप हाल ही में चश्मे बद्दूर और फैटसो जैसी फिल्मों में देख चुके हैं, लेकिन इस बार इन्होंने फिल्म में वो मसाला डाला है, जिसके बिना यह कहानी इस शानदार तरीके से आपके सामने नहीं परोसी जाती। दिलचस्प बात है कि पूरी फिल्म में इनके एक भी बार दीदार नहीं हुए, लेकिन अपनी दमदार आवाज़ और टोन से इन्होंने कहानी में जो भूमिका निभाई है, वो सराहनीय है।

स्टेज एक्ट्रेस निमरत कौर के दीदार आप फिल्म लव शव ते चिकन खुराना में मुस्कान खुराना के रूप में कर चुके हैं, लेकिन इस बार इन्होंने अपने अभिनय का जो लोहा मनवाया है, उसे आप देखेंगे तो इनकी छाप अपने दिलो-दिमाग पर ज़रूर पाएंगे।

कई शॉर्ट फिल्में बना चुके रितेश बत्रा ने पहली बार बॉलीवुड फिल्म डायरेक्ट की है, जिसके बनने के बाद ही करण जौहर फिल्म के प्रोड्यूसर बने। फिल्म के डायरेक्टर और राइटर ने कहानी को इस तरह बताया है कि कोई भी एक्टर अपने किरदार से नहीं भटका है। लेकिन हां, लगता है सारी कसर फिल्म के एंड में ही निकली है, जब फिल्म अचानक से बिना किसी मोड़ पर पहुंचे ही ख़त्म हो जाती है। फिल्म शुरू और बीच में तो बांधकर रखती है, लेकिन अंत में कहानी को ढंग से नहीं बताया गया है।

नवाज़ुद्दीन के डायलॉग्स सुनकर आपको ज़रूर एंटरटेन करेंगे।

मुंबई में सेट इस फिल्म के सिनेमेटोग्राफर माइकल सायमंड्स ने खूब मेहनत की है और डायरेक्टर की सोच को परदे पर भली-भांति उतारा है।

पूरी फिल्म में आपको कोई गाना नहीं मिलेगा, लेकिन कहानी अचानक से ख़त्म होने पर जो गाना चलता है, आप उसे हैरान होने के चलते नहीं सुन पाएंगे। वैसे, मैक्स रिचटर ने फिल्म का म्यूज़िक दिया है।

कहीं फीका ना हो जाए स्वाद !

1- यह एक परफॉर्मेंस बेस्ड फिल्म है। यानी मासेस के लिए नहीं, बल्कि ख़ास ऑडियंस के लिए है। तो अगर आपके पास कुछ काम नहीं है और आप मसाला फिल्में देखकर बोर हो गए हैं तो देखिए यह फिल्म।

2- इस फिल्म में न कोई डांस है, न कोई गाना। ऐसे में अगर आप मौज-मस्ती के मूड में है और एंटरटेन करना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए नहीं है।

3- फिल्म का एंड काफी निराश कर देता है। पूरी फिल्म में आप डूबे होते हैं और जब एंड एक नहीं, कई सवालों के साथ होता है, तो आप सोच में पड़ जाते हैं।

4- कहानी में इला हिंदी में चिट्ठी लिखती है और साजन अंग्रेज़ी में जवाब देते हैं। ऐसे में इस फिल्म की ऑडियंस और भी कम हो जाती है।

तड़का लगाने वाले मसाले !

1- इरफान ख़ान और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अपनी परफॉर्मेंस से आपका दिल जीत लेंगे। इनका अभिनय देखकर आपके पास इनकी तारीफ करने के लिए शब्द भी कम पड़ जाएंगे।

2- कान फिल्म फेस्टिवल 2013 में यह फिल्म पहले ही क्रिटिक्स वीक व्यूअर्स च्वाइस अवार्ड जीत चुकी है।

टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में भी इस फिल्म को दर्शकों ने पसंद किया है।

3- आलोचकों और दर्शकों का मानना है कि ऑस्कर्स में भारत की ओर से भेजी गई यह आधिकारिक फिल्म हो।

इस फिल्म को हमारी तरफ से साढ़े तीन स्टार्स।

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