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MOVIE REVIEW: जंजीर

1973 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्‍म जंजीर की ऑफिशियल रीमेक यह फिल्म उतनी दमदार नहीं है।

Dainik Bhaskar

Aug 02, 2018, 01:55 PM IST
Zanjeer film reviews

यकीनन इसका श्रेय तो फिल्‍मकारों को ही दिया जाना चाहिए। एक ऐसी जानदार फिल्‍म, जिसने बॉलीवुड सिनेमा की दिशा बदलकर रख दी थी, को इस मजाकिया रूप में पेश करने के लिए खासा दमगुर्दा चाहिए : इस्‍पात से बनी जंजीरों जैसा ही दमगुर्दा। यदि यह फिल्‍म एक पोपट कॉमिक स्ट्रिप ही होती तो हम इसका ज्‍़यादा मज़ा ले पाते। निश्चित ही फिल्‍मकारों की मंशा यह तो नहीं ही रही होगी कि ऑरिजिनल फिल्‍म का मखौल उड़ाया जाए।

आखिर यह वर्ष 1973 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्‍म जंजीर की ऑफिशियल रीमेक है। फिल्‍म के सभी किरदारों के नाम वही हैं, जो मूल फिल्‍म में थे। लेकिन फिल्‍म में दो घंटे तक हमारी आंखों के सामने जो कुछ होता है, उसे पैरोडियों की परेड के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता। बेहतर होगा, अगर हम एक-एक कर इन पैरोडियों का जायजा लें।

प्रियंका चोपड़ा इस फिल्‍म में एक चुलबुली कमअक्‍़ल किस्‍म की लड़की की भूमिका निभा रही हैं, जो अपने एक फेसबुक फ्रेंड की शादी में न्‍यूयॉर्क से मुंबई आई है। वह शादी में एक आइटम नंबर करती है। यह इस फिल्‍म में दिखाए गए आधा दर्जन से भी अधिक आइटम नंबरों में से एक है। उसका नाम माला है। मूल फिल्‍म में जया बच्‍चन (तब भादुड़ी) ने यह भूमिका निभाई थी और एक सड़कछाप लड़की के जानदार अभिनय से पूरे देश का दिल जीत लिया था। इस फिल्‍म की ही तरह। बहरहाल, माला को मदद की दरकार है।

उसने एक कत्‍ल होते देखा है और उसे मानसिक और शारीरिक, दोनों तरह की सुरक्षा चाहिए। वह कातिल को पहचानती है, लिहाजा कत्‍ल में मुब्तिला माफिया उसके पीछे पड़ जाता है। असिस्‍टेंट कमिश्‍नर के घर में उसे पनाह मिल जाती है। यह घर एक अजीब किस्‍म के विटनेस प्रोटेक्‍शन प्रोग्राम की तरह है।

घर के किचन में पर्याप्‍त जगह है कि वहां एक और आइटम डांस किया जा सके। वह असिस्‍टेंट कमिश्‍नर के दफ्तर कच्‍चा अंडा और कांदा लेकर जाती है। दफ्तर का नाम है येलो स्‍टोन पुलिस स्‍टेशन। शायद यह नामकरण एक अमेरिकी नेशनल पार्क के नाम पर किया गया है। यकीनन, हमें लगने लगता है कि हम एक चिडि़याघर में हैं।

माला इससे पहले कभी भारत नहीं आई थी, लेकिन इसके बावजूद वह एक टूरिस्‍ट गाइड की भूमिका निभा सकती है, क्‍योंकि उसने इफरात में भारतीय फिल्‍में देखी हैं। जाहिर है, जिस फिल्‍म में वह यह संवाद बोल रही है, वह उसे नहीं देख सकती थी, क्‍योंकि तब यह फिल्‍म बनाई ही जा रही थी। लेकिन यदि वह भारत को फिल्‍मों के जरिए ही जानती है, शायद अधिकतर अस्‍सी के दशक की फिल्‍मों के जरिए, तो वह हमें यह समझाने के लिए एक बेहतर स्थिति में होती कि यहां हो क्‍या रहा है।

विलेन तेल माफिया चलाता है। उसका काम है पेट्रोप पंप तक पहुंचने से पहले ही गैसोलिन हथिया लेना। यह एक करोड़ रुपए का धंधा है। हम पाते हैं कि यह आदमी टाइम और फोर्ब्‍स दोनों के कवर पर छप चुका है।

वह सत्‍तर के दशक की सफेद सिल्‍कन स्‍मोक जैकेट पहनता है, एक लंबी टेबल पर अपने गुर्गों के साथ शराबनोशी करता और दावत उड़ाता है, अपने अय्याशी के अड्डे पर पार्टियां आयोजित करता है, जहां उसकी मेहबूबा मोना डार्लिंग (माही गिल) कैबरे करती है। उसका नाम है तेजा।

मूल फिल्‍म में यह भूमिका अजित ने निभाई थी और हम जानते हैं कि वे कितने शानदार अदाकार थे। लेकिन प्रकाश राज ने यह रोल इस तरह किया है मानो कोई अजित-जोक सुना रहे हों।

लोग खिलखिलाते हैं। अलबत्‍ता प्रेस शो के दौरान उनमें से कुछ इंटरवल में ही फिल्‍म छोड़कर चले जाते हैं। काश, मैं भी हंस पाता। यदि यह कोई मैड एक्‍शन साउथ रीमेक किस्‍म की फिल्‍म होती, तो भी कोई बात थी। गजनी और वांटेड के बाद मुझे याद नहीं, अक्षय, सलमान और अजय देवगन की ऐसी कितनी फिल्‍में आ चुकी हैं।

इन फिल्‍मों में कोई भी आने वाले कल के लिए मिसाल कायम नहीं करना चाहता, बस दूसरे दर्जे के मनोरंजन से काम चल जाता है। लेकिन इस फिल्‍म के साथ यह मुश्किल है कि यह हमें बार-बार 1973 की उस क्‍लासिक फिल्‍म की याद दिलाती है। अलबत्‍ता मूल फिल्‍म के कई दृश्‍य इसमें नहीं हैं। हीरो के सबसे अच्‍छे दोस्‍त शेर खान का रोल संजय दत्‍त ने निभाया है। मूल फिल्‍म में प्राण साहब ने यह रोल किया था। हम संजय दत्‍त को एकाध दृश्‍यों और एक गाने में ही देखते हैं। हम देखते हैं कि हीरो कुर्सी को लात मारकर शेर खान से कहता है – ये पुलिस स्‍टेशन है, तुम्‍हारे बाप का घर नहीं। वह कांप रहा होता है और उसकी उंगली तनी होती है। हम एक यादगार दृश्‍य को किसी अनाड़ी के द्वारा अभिनीत होता देखते हैं।

विजय खन्‍ना का रोल राम चरन तेजा ने निभाया है, जिनकी तुलना अमिताभ बच्‍चन से की ही नहीं जा सकती। जंजीर ही वह फिल्‍म थी, जिसने अमिताभ को एंग्री यंग मैन का खिताब दिलाया था। लेकिन इस फिल्‍म में जो नायक दिखाया गया है, वह तो वन मैन आर्मी है। उसे हिरासत में हुई एक मौत के कारण सस्‍पेंड कर दिया गया है।

वह एक झुग्‍गी बस्‍ती में अपनी गाड़ी घुसा देता है और एक छोटे-मोटे गांव को जला ही डालता है। किसी को कोई परवाह नहीं है। लेकिन यदि मूल फिल्‍म की पटकथा लिखने वाले सलीम-जावेद इसे देखेंगे तो उन्‍हें ज़रूर तकलीफ़ होगी। उन्‍होंने अपनी पटकथा की हत्‍या किए जाने के लिए बतौर हर्जाना 6 करोड़ की रुपयों की मांग भी की थी।

आजकल रीमेक बनाने का चलन है। गोलमाल, शोले, हिम्‍मतवाला वग़ैरह। सत्‍तर और अस्‍सी के दशक की इन फिल्‍मों की रीमेक इसलिए ज्‍यादा बनाई जाती है, क्‍योंकि आज के अधिकांश फिल्‍मकार उसी दौर में पले-बढ़े थे।

इस फिल्‍म के निर्देशक अपूर्व लखिया ने एक अजनबी, शूटआउट एट लोखंडवाला, मिशन इस्‍तांबुल जैसी फिल्‍में बनाई हैं और वे एक इंटरव्‍यू में कहते हैं कि जंजीर ही वह फिल्‍म थी, जिसने उन्‍हें फिल्‍मकार बनने के लिए प्रेरित किया। अच्‍छा? पता नहीं वे अपने इस फैसले के लिए जंजीर को दोष क्‍यों दे रहे हैं?

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