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हिंदी सि‍नेमा के 100 साल: अछूत कन्‍या से दबंग बनने की बॉलीवुड की कहानी

हिंदी सि‍नेमा के सौ साल पूरे होने पर वि‍शेष रि‍पोर्ट

Danik Bhaskar | May 03, 2013, 08:51 AM IST
सौ बरस के सफर में हिंदी सिनेमा जिंदगी का हिस्सा बन गया। फिल्में रंगीन हुईं, सपनों में रंग भरने लगे...यहां तक कि भावनाएं भी फिल्मों को देखकर व्यक्त होने लगीं। इस स्वर्णिम सफर में कई उतार-चढ़ाव भी आए। लेकिन बॉलीवुड रुका नहीं, आगे ही बढ़ता गया और दुनियाभर में अपनी जगह बना ली। इसका श्रेय जाता है उन निर्देशकों, कलाकारों, संगीतकारों, गायकों और परदे के पीछे के उन महत्वपूर्ण लोगों को जिन्होंने फिल्मों को न सिर्फ बनाया बल्कि जीया। इन्हीं लोगों की कोशिशों ने आज हिंदी फिल्म जगत को शीर्ष पर पहुंचा दिया।
ऐसे मिली हमारी फिल्मों को नायिका
अनिल राही
‘मैं बन की चिडिय़ा बनके...’ यह गाना फिल्म ‘अछूत कन्या’ में देविका रानी पर फिल्माया हुआ है। फर्स्‍ट लेडी ऑफ इंडियन स्क्रीन... देविका रानी। इतनी पढ़ी-लिखी। इतनी आधुनिक। फिर भी उस जमाने की फिल्में देखिए कि चिडिय़ा उड़ती है, डालें हिलती हैं, पत्ते हिलते हैं, लेकिन हीरोइन नहीं हिलती। और आज की हीरोइन। चिकनी चमेली, जलेबी बाई, शीला, मुन्नी, बबली बदमाश। ये फासला तो सिर्फ 70 साल की हीरोइन के रूप का है। आइए चलते हैं, हीरोइन के जन्मकाल में...
ओ माइ गॉड... कितने परेशान रहे होंगे दादा साहेब फालके। कल्पना कीजिए 100 साल पहले की, 1913 की। जब औरतें फिल्मों में काम करने को वेश्यावृत्ति से भी नीचा काम समझती थीं। ‘राजा हरिश्चंद’ की रूपरेखा बना चुके दादा साहेब फालके तारामती के रोल के लिए वेश्याओं के पास गए, लेकिन उनसे तक ‘न’ सुनने को मिली। फिर गए एक कैंटीन में। टेंशन मिटाने के लिए। एक कप चाय पीने के लिए। और वहां उन्हें मिली उनकी हीरोइन। सालुंखे। जी नहीं, यह कोई नहीं थी। वेटर था, लेकिन चाल-ढाल स्‍त्रि‍यों जैसी। चाय का गिलास पकड़ाते वक्त सालुंखे की उंगलियां जो फालके साहेब की उंगलियों से छू गई, उन्हें करंट-सा लगा और ढेर सारे पैसे का लालच देकर सालुंखे को बना दिया तारामती। (वेश्‍या का दर्द: जिस बेटे को दी इज्‍जत की जिंदगी, वह महसूस करता है 'बेइज्‍जती')
लेकिन सालुंखे और उस जैसे पुरुषों का भविष्य बतौर हीरोइन ज्यादा उज्जल नहीं था। दादा साहेब को उसी साल अपनी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में पार्वती के रोल के लिए किसी पुरुष एक्टर को तलाशने की जरूरत नहीं पड़ी। इस बार उन्हें मिली कमला बाई। घरेलू हालात से परेशान। पैसे के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तैयार। फिल्मों के जरिए कमला बाई की अमीरी और लोकप्रियता ने वेश्याओं को फिल्मों की ओर खूब आकर्षित किया।
जल्दी ही खुले माहौल में पली-बढ़ी एंग्लो इंडियन लड़कियां भी हीरोइन बनने के लिए कतार लगाने लगीं। पेशेंस कूपर, सुसान सोलोमा आदि के अलावा कई एंग्लो इंडियन लड़कियां तो नाम बदलकर फिल्मों में हीरोइन बनीं। जैसे कि रशेल चोहेन फिल्मों में रामला देवी हो गईं तो एस्थर अब्राहम, प्रमिला बन गईं। धीरे-धीरे दूसरे तबकों से भी औरतें फिल्मों में आने लगीं। तारक बाला, सीता देवी, सुल्ताना, जुबैदा आदि उस साइलेंट ईरा की स्टार थीं तो सुपर स्टार थीं रूबी मायर्स यानी सुलोचना। देखा जाए तो सुलोचना उस जमाने की कैटरीना कैफ थीं। हिंदी नहीं आती थी, खूबसूरत बहुत थीं, उनकी खूबसूरती के दम पर फिल्में चलती थीं। दुर्भाग्य से 1931 में फिल्म ‘आलम आरा’ के जरिए सिनेमा ने आवाज पा ली और साइलेंट सिनेमा की ज्यादातर हीरोइनें संवाद ठीक से न बोल पाने के कारण हाशिए पर चली गईं, फिर भी सुलोचना के भाग्य ने साथ न छोड़ा। कैटरीना की तरह सुलोचना के मुंह से खराब हिंदी सुनकर भी दर्शक एक्स्ट्रा एंज्वाय करते थे। सुलोचना ने साइलेंट ईरा की उन सुपर स्टार गौहर तक की दुकान बंद कर दी, जिन गौहर का फोटो माचिस पर छापने से बंद होती माचिस फैक्ट्री न सिर्फ चल निकली थी, बल्कि टॉप पर पहुंची थी।
और फिर पर्दे पर आईं देविका रानी, जिन्होंने हीरोइन के वजूद को ही बदल डाला। बेहद पढ़ी-लिखी और संभ्रांत परिवार की देविका रानी के हीरोइन बनने से हीरोइन के प्रति देश की सोच ही बदलने लगी। उनके दीवानों में पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे और वे उन्‍हें लव लेटर लिखा करते थे (पढ़ें- बॉलीवुड से जुड़े कुछ ऐसे ही दिलचस्‍प फैक्‍ट्स)। देविका रानी सम्मानित परिवारों से लड़कियों का फिल्मों में आना शुरू हुआ। उनके बाद तो ऐसी हीरोइनों की लंबी सूची है। वैजयंती माला, हेमा मालिनी, माला सिन्हा, शर्मिला टैगोर, श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, करिश्मा कपूर, काजोल, करीना कपूर से लेकर सोनाक्षी सिन्हा तक।
हीरोइन की सौ साल की यात्रा का नतीजा यह है कि आज बहुत से माता-पिता अपनी बेटी को हीरोइन बनने में मदद करते हैं या बनाना चाहते हैं। आज करिश्मा, करीना के हीरोइन बनने पर बबीता-रणधीर कपूर को नाज है तो सोनाक्षी सिन्हा पर शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा को भी कम फख्र नहीं है।
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5 दृश्य जो हमेशा याद रहेंगे 
 
किसी भी फिल्म को लोगों के दिलों तक पहुंचाने में उसके खूबसूरत दृश्य, संवाद और गीतों की अहम भूमिका होती है। हिंदी सिनेमा में न जाने कितने खूबसूरत दृश्य हैं, जिन्हें लोगों ने पसंद किया, दिलों में जगह दी। वक्त भले बदल गया हो, हमारी याद में ये दृश्य अब भी ठहरे हैं : 
 
1- पाकीज़ा 
राजकुमार, मीना कुमारी 
ट्रेन रफ्तार से बढ़ती जा रही है। मुसाफिर मंजि़ल के इंतजार में पहलू बदल रहे हैं। साहेब-जान भी समय काटने की गरज से बर्थ पर लेटी किताब पढऩे में मशगूल हैं कि धीरे-धीरे नींद ने उनको आगोश में ले लिया। उनके मेहंदी लगे गुलाबी पांव, ट्रेन की गति के साथ हौले-हौले हिल रहे हैं। सफेद पैरहन बेपनाह सौंदर्य को और उजला बना रहा है। यहां तक कि यह नजारा देखकर नौजवान सलीम भी एक लम्हे के लिए थम गया, जो भूलवश उस कंपार्टमेंट में चला आया था। एक पल को उसकी निगाहें साहेब-जान के खूबसूरत पैरों पर जाकर ठहर गईं। जाने उनमें ऐसी क्या बात थी, जो जाते-जाते भी वह उनके नाम एक पैगाम छोडऩा न भूला। नींद खुलने पर साहेब-जान को ये संदेश उसकी किताब से मिला। उसमें लिखा था ‘इत्तफाकन आपके कंपार्टमेंट में चला आया। आपके पैर देखे....बहुत हसीं हैं ये... इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे।’ 
 
2- चौदहवीं का चांद 
वहीदा रहमान, गुरुदत्त 
वहीदा रहमान, गुरुदत्त अपने पूरे शबाब पर है। दूर आसमान में चौदहवीं का चांद जगमगा रहा है। घर के अहाते में बने तालाब में दो कमल खिले हुए हैं, जो दो प्रेमियों के प्रेम के साक्षी हैं। खिड़की से छनकर आती चांद की रोशनी वहीदा के चेहरे को रोशन कर रही है, लेकिन गुरुदत्त की आंखों से नींद कोसों दूर है। गहरी नींद में उसका दमकता चेहरा देख गुरुदत्त होश खो बैठते हैं और उस हुस्न की तारीफ में कह उठते हैं- 
चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो, 
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो। 
 
3- मुगल-ए-आज़म, दिलीप कुमार, मधुबाला 
शहजादे सलीम की घर वापसी को लेकर पूरे महल में उत्सव का माहौल है। इस्तकबाल के लिए मशहूर मूर्तिकार को पत्थर का एक बुत तराशने का काम सौंपा जाता है। सलीम उस मूर्तिकार का फन देखना चाहते थे, लिहाजा एक तीर से उस बुत को बेपरदा करते हैं। परदा हटते ही सलीम के होश फाख्ता हो गए। सबकी सांसें थमी रह गईं। उन्हें ऐसा गुमां हुआ, मानो फरिश्ते ने आसमान से उतरकर संगमरमर में पनाह ले ली हो, लेकिन जब उन्हें पता चलता है कि संगतराश समय पर बुत तैयार नहीं कर पाया और उसकी जगह जीती-जागती लड़की खड़ी है तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। वह उसकी दिल खोलकर तारीफ करते हैं। उस बेपनाह हुस्न की दाद में छुपी हुई एक मोहब्बत है। खूबसूरत अनारकली का दृश्य मधुबाला पर फिल्माया गया था, जिसे देखकर आज भी रूह खिल उठती है।
 
4- गाइड 
देवआनंद, वहीदा रहमान 
‘पिया तोसे नैना लागे रे, जाने क्या हो अब आगे रे’ 
गाइड में ‘रोजी’ का वह भावपूर्ण नृत्य आज भी लोगों को फिल्म और उस दृश्य की याद दिलाता है। इस फिल्म के बेहतरीन सेट्स, लाइटिंग का उम्दा प्रयोग, विभिन्न संस्कृतियों का अनूठा संयोजन और अलग-अलग रंगों का अनोखा मिश्रण देखने वालों की आंखें चुंधिया देता है। इसमें कहीं दीवाली के कंदील जल रहे हैं और चारों ओर पटाखे छूट रहे हैं तो कहीं होली के रंगों की बरसात हो रही है। ऐसा लग रहा है, मानो परदे पर होली के कई रंग बिखरकर निखर गए हों। मछुआरों की टोली अपनी पारंपरिक वेश-भूषा में नाचती-गाती डोल रही है। इस दृश्य में अलग ही रूमानियत है, जो बरसों बरस भी स्मृतिपटल पर अंकित रहेगी। 
 
5- देवदास 
शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय 
देवदास पारो से किए वादे के मुताबिक अंतिम बार उससे मिलने उसके घर जाता है। कदम लडख़ड़ा रहे हैं और अब उसके पास बहुत कम समय बचा है। जब पारो को खबर मिलती है कि कोई अजनबी, जिसका नाम देवदास है, बाहर पेड़ के नीचे नाजुक हालत में पड़ा है तो वह नंगे पांव उसे पुकारते हुए बेतहाशा दौड़ती है। तेज हवा से पारो-देवदास के प्यार की निशानी दीये की लौ बुझने लगती है। जब तक पारो देवदास तक पहुंचती है, पारो का नाम लेते-लेते उसकी सांसें थम चुकी होती हैं। पेड़ के नीचे बिछे फूलों के बीच देवदास का मृत शरीर पड़ा है और उस पर शाखाओं से टूट-टूटकर फूल झर रहे हैं। मानो फूल भी उस प्रेम के प्रतीक पर न्योछावर होने के लिए व्याकुल हैं। 
 
 
आगे पढ़ें- 6 सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक
 

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6 सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक
 
नौशाद: 1944 में आई रतन फिल्म के ‘सावन के बादलों’ ने उन्हें पहचान दिलाई। मुगल-ए-आजम का ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’ गीत आज भी सुना जाता है। ताजमहल, बाबुल, गंगा जमुना फिल्मों में बेहतरीन संगीत दिया। 
 
खय्याम: कभी-कभी, उमराव जान, रजिया सुल्तान, शोला और शबनम में इन्होंने बेहतरीन संगीत दिया। आशा भोसले का सही उपयोग खय्याम ने ही किया। 
 
एसडी बर्मन: फिल्म इंडस्ट्री के ऑल राउंडर संगीतकार। गीता दत्त द्वारा गाया गया ‘मेरा सुंदर सपना बीत गया’ अविस्मरणीय है। बाजी, बंदिनी, गाइड और आराधना में संगीत दिया। आराधना में खुद भी गाना गया। 
 
मदन मोहन: अपनी गजलों और रोमांटिक गीतों के लिए जाने जाते हैं। ‘वो चुप रहें’, ‘फिर वही शाम’, ‘कौन आया मेरे मन के द्वारे’, ‘कर चले हम फिदा जान ओ तन’, ‘जरा सी आहट होती’ जैसे गीत दिए। 
 
आरडी बर्मन: बॉलीवुड में इलेक्ट्रॉनिक रॉक लाने का श्रेय इन्हीं को है। वे ऊर्जा से भरपूर संगीत निर्माण करते थे। ‘सर जो तेरा चकराए’, ‘ओ मेरे सोना रे सोना’, ‘ओ हसीना जुल्फों वाली’ जैसे गीत दिए। आशा भोसले और किशोर कुमार ने सबसे ज्यादा गाने गाए। 
 
एआर रहमान: इनकी पहचान रोजा फिल्म से बनी। रोजा के टाइटल ट्रैक को टाइम मैगजीन ने ऑल टाइम टॉप टेन अलबम में शामिल किया। दिल से, गुरु, अकबर-जोधा, लगान, रंगीला, पुकार और स्लमडॉग मिलिनेयर में दिया संगीत। 
 
 
आगे पढ़ें- 5 सर्वश्रेष्ठ कॉमेडी फिल्में
 

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5 सर्वश्रेष्ठ कॉमेडी फिल्में
 
चलती का नाम गाड़ी (1958) 
गराज चलाने वाले तीन मैकेनिक भाइयों की कहानी में दिखे थे फेमस एक्टर तिकड़ी किशोर, अशोक और अनूप कुमार। सत्येन बोस द्वारा निर्देशित फिल्म में किशोर कुमार व मधुबाला के बीच नोक-झोंक और प्यार आज भी हंसने को मजबूर कर देते हैं। 
 
पड़ोसन - 1968 
ज्योति स्वरूप निर्देशित इस फिल्म में सुनील दत्त, किशोर कुमार, सायरा बानू और मुकरी ने मुख्य किरदार निभाए थे। भोला (सुनील) बिंदू (सायरा) से प्यार करता है। इस काम में बिंदू का गुरु और उसका प्रेमी मास्टर पिल्लई (महमूद) अडंगा डालता है। तब भोला का गुरू विद्यापति (किशोर) मदद करता है। 
 
चुपके-चुपके (1975) 
निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी (धर्मेंद्र) के खुराफाती दिमाग की थी जो अपनी पत्नी सुलेखा (शर्मिला टैगोर) के जीजाजी (ओम प्रकाश) के साथ मसखरी करने के लिए उनके घर ड्राइवर प्यारेमोहन बनकर आते हैं। 
 
जाने भी दो यारों (1983) 
कुंदन शाह की फिल्म में ‘द्रौपदी के चीरहरण’ के दृश्य ने लोगों को सकते में ला दिया। ऐसा व्यंग्य उन्होंने पहले नहीं देखा था। धृतराष्ट्र कहते रहते हैं ‘ये क्या हो रहा है’, दुर्योधन और दुशासन बनकर आए नसीरुद्दीन शाह और रवि वासवानी द्रौपदी का चीरहरण करने से मना कर देते हैं, फिर ओमपुरी भीम बनकर आ जाते हैं। 
 
गोलमाल- 1979 
ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित इस फिल्म में अमोल पालेकर, उत्पल दत्त और मंजु सिंह की तिकड़ी ने खूब हंसाया है। रामप्रसाद (अमोल) भवानी शंकर (उत्पल) की बेटी रत्ना (बिंदिया गोस्वामी) से प्यार करता है। पर भवानी को मूंछों वाला लड़का चाहिए। मूंछों को संभालते हुए प्यार के लिए कितने पापड़ बेलने की कहानी है गोलमाल।  
 
 
आगे पढ़ें- यादगार डायलॉग 
 

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यादगार डायलॉग 
 
अगर ऐसा ना हुआ तो सलीम तुझे मरने नहीं देगा और हम अनारकली तुझे जीने नहीं देंगे। - पृथ्वीराज कपूर, मुगल-ए-आजम, 1960
 
कौन कमबख्त है जो बर्दाश्त करने के लिए पीता है। मैं तो पीता हूं कि बस सांस ले सकूं। - दिलीप कुमार, देवदास, 1955 
 
जिनके घर शीशे के होते हैं चिनॉय सेठ वो दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते। -राजकुमार, वक्त, 1965 
 
बाबू मोशाय, जिंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ है। उसे ना आप बदल सकते हैं, ना मैं। -राजेश खन्ना, आनंद 1971 
 
आप के पांव देखे, बहुत हसीन हैं। इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा, मैले हो जाएंगे। -राजकुमार, पाकीजा, 1972 
 
बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना। - धर्मेद्र, शोले 1975
 
सारा शहर मुझे लायन के नाम से जानता है। -अजीत, कालीचरण, 1976 
 
मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता - अमिताभ बच्चन, दीवार, 1975 
 
डॉन को पकडऩा मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। -अमिताभ बच्चन, डॉन 1978 
 
मोगैम्बो खुश हुआ। -अमरीश पुरी, मिस्टर इंडिया, 1987 
 
रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं। नाम है शहंशाह। - अमिताभ बच्चन, शहंशाह, 1988 
 
एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है। -नाना पाटेकर, यशवंत, 1997 
 
ऑल इज वेल। - आमिर खान, थ्री ईडियट्स, 2009
 
हम जहां खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है। -अमिताभ बच्चन, कालिया 1981
 
यह हाथ मुझे दे दे ठाकुर। -अमजद खान, शोले, 1975 
 
पुष्पा आई हेट टीयर्स। -राजेश खन्ना, अमर प्रेम, 1972
 
जली को आग कहते हैं बुझी को राख कहते हैं और जो उस राख से बने उसे विश्वनाथ कहते हैं।’ - शत्रुध्न सिन्हा, विश्वनाथ, 1978
 
अगर मैंने एक बार कमिटमेंट कर दी तो मैं खुद की भी नहीं सुनता। - सलमान खान, वॉन्टेड, 2009
 
थप्पड़ से डर नहीं लगता साहब, प्यार से डर लगता है। - सोनाक्षी सिन्हा, दबंग, 2010 
 
 
आगे पढ़ें- 18 साल लगे फिल्मों को गुनगुनाने में 
 
 

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सलमान खान बनेंगे बॉलीवुड के पहले 'कुंवारे बाप'!  

18 साल लगे फिल्मों को गुनगुनाने में 
अनुपमा ऋतु 
 
18 साल की शैशवावस्था के बाद भारतीय सिनेमा ने 1931 में बोलना सीखने के साथ-साथ गाना भी सीख लिया था। पहली बोलती भारतीय फिल्म ‘आलम आरा’ (1931) में 7 गाने रखे गए थे। गानों की लोकप्रियता के कारण उसी साल आई ‘शीरीं फरहाद’ में 42 और फिर ‘इंद्र सभा’ में तो अब तक के अधिकतम 72 गाने थे। तब से गीत भारतीय फिल्मों का अभिन्न हिस्सा हैं और दुनिया में बॉलीवुड की अलग पहचान भी। लेकिन गीत-संगीत निरंतर बदलता रहा। हम इस बदलाव को मुख्यत: 6 काल खंडों में बांट सकते हैं: 
 
कठिन शायरी और नकसुरे गायकों का दौर : शुरू में हीरो-हीरोइन अपने गाने खुद गाते थे। तब गीत क्या, एक तरह का मुशायरा फिल्माया जाता था। कठिन उर्दू शायरी और नज्मों को धाराप्रवाह गाया जाता था, जिनके बीच में सिंगर को सांस लेने की जगह भी नहीं छोड़ी जाती थी। फिल्म ‘जवानी की हवा’ (1935) से फिल्म इंडस्ट्री में पदार्पण करने वाली सरस्वती देवी पहली ऐसी म्यूजिक डायरेक्टर थीं, जिन्होंने फिल्म ‘अछूत कन्या’ (1936) से शायरी के बीच में म्यूजिक पीस रेकॉर्ड करने का चलन शुरू किया, क्योंकि इसके अशोक कुमार और देविका रानी नहीं गा पा रहे थे। बहरहाल, 1931 से 1950 का दौर कठिन शायरी, कठिन शाीय संगीत और नाक से गाने वाले सिंगर्स का था, जिनमें के.एल. सहगल, नूरजहां, जोहराबाई अंबालेवाली और शमशाद बेगम प्रमुख नाम हैं। 
 
सार्थक और कर्णप्रिय गीतों का स्वर्ण युग: 1950 से 1970 तक का काल खंड सिने म्यूजिक का स्वर्ण युग कहा जाता है। इसमें एस.डी. बर्मन, मदन मोहन, नौशाद, शंकर-जयकिशन, सलिल चौधरी, सी. रामचंद्र जैसे संगीतकारों ने गीत और संगीत को सर्वग्राह्य और सुगम बनाकर पेश किया। मजरूह सुल्तानपुरी, शकील बदायूनी, राजेंद्र किशन, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, भरत व्यास, शैलेंद्र, आनंद बख्शी जैसे गीतकारों की रचनाएं मोहम्मद रफी, मुकेश, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त जैसे गायकों की आवाज में अमर हो गयीं। 
 
डिस्को दीवानगी का दौर: 1970 और 80 का दशक डिस्को और पाश्चात्य संगीत से प्रेरित रहा। संगीत में गिटार और की-बोर्ड तो आर.डी. बर्मन लेकर आए, लेकिन उस चलन को कमोवेश कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल आदि सभी संगीतकारों ने अपना लिया। मिथुन चक्रवर्ती अभिनीत ‘डिस्को डांसर’ के बाद तो पूरी इंडस्ट्री डिस्कोमय हो गयी। संगीतकार बप्पी लहिरी ने दशक भर इंडस्ट्री पर राज किया। 
 
मेलोडी की वापसी: 1990 के दशक में संगीत ने फिर करवट बदली। गुलशन कुमार की फिल्म ‘आशिकी’ के गीतों ने सफलता के नए मापदंड बनाए। संगीतकार नदीम-श्रवण छा गए। वे स्वर्णकाल की मेलोडी और बप्पी लहिरी के डिस्को के बीच का ऐसा संगीत लेकर आए, जो सबको कर्णप्रिय लगा। इस युग ने गीतकारों में समीर और गायकों में कुमार शानू और उदित नारायण को स्टार बना दिया। 
 
वर्तमान दौर: इस नई सदी की शुरुआत से सिनेमा वैश्वीकरण की ओर बढ़ा है और साथ ही इसका संगीत भी। आज फिल्मों में कई संगीतकार, कई गीतकार और कई गायक होते हैं। गानों में विभिन्नता है। खय्याम के शब्दों में- ‘न सुर है, न भारतीय साज हैं, न भारतीय जज्बातों को बयान करने वाले गीत हैं। फिर भी नई पीढ़ी इसे पसंद कर रही है तो शायद यह अच्छा ही होगा।’
 
 

पर्दे पर अब ‘दबंग’ नहीं ‘राधे’ सलमान खान देखिए  

PICS : भांजी की एंगेजमेंट पर अंबानी ने दी पार्टी, आए शाहरुख, प्रियंका

आमिर, शाहरुख जैसी 'फ्रॉडगिरी' मुझसे नहीं हो सकती : सलमान

भारतीयों की 'सनी लियोनी' से ज्यादा दिलचस्पी 'देसी आंटीज' में!

PHOTOS : देखिए, लिपस्टिक लगा कर कैसे 'सोनिया' बन गए आमिर खान

सलमान खान बनेंगे बॉलीवुड के पहले 'कुंवारे बाप'!