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'गैंग्स ऑफ वासेपुर': इस धनबाद फिल्म के लिए धन्यवाद

Mayank Shekhar

Jun 22, 2012, 02:30 PM IST

फिल्म रिव्यू: पढ़िए दैनिकभास्करडॉटकॉम से जुड़े जाने-माने फिल्म समीक्षक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया रिव्यू।

film review: gangs of wasseypur
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रामधीर सिंह (तिग्मांशु धूलिया) वासेपुर का दबंग माफिया डॉन है। वासेपुर कभी गांव-देहात हुआ करता था, लेकिन अब वह धनबाद का एक ख़ासी आबादी वाला इलाक़ा है। आप देख सकते हैं कि किस तरह कोयला खदानों वाले इस क़स्बे में अंडरवर्ल्ड डॉन पनपे और फिर 1970 के दशक के प्रारंभ में कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकृत होने के साथ ही धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में प्रभावशाली होते चले। रामधीर अब रसूख़दार विधायक है।




अपने कॅरियर की शुरुआत में ही उसने मुख्य ‘पहलवान’ शाहिद खान से छुटकारा पा लिया था। रामधीर को लग गया था कि शाहिद उसकी राह का रोड़ा साबित हो सकता है। एक रात उसने शाहिद को तलब किया, उसे अपनी जीप में बैठाकर कहीं ले गया और उसके बाद शाहिद कभी घर लौटकर नहीं आया। शाहिद का बेटा अपने बाप की राह देखता रह गया। फिर वह समझ गया कि रामधीर ने उसके पिता को ख़त्म कर दिया है।




यह लड़का सरदार खान (मनोज बाजपेयी, एक बेहतरीन वापसी) अपने दिलोदिमाग़ में बदले की चाह लिए बड़ा हुआ। उसने सिर मुंडा लिया और क़सम खाई कि रामधीर को ठिकाने लगा देने के बाद ही वह बाल बढ़ाएगा। यह फिल्म की पृष्ठभूमि है। हम समझ जाते हैं कि सरदार हीरो है, रामधीर विलेन है और फिल्म‍ एक रीवेंज ड्रामा है। लेकिन इसके बावजूद अगर आप इन धारणाओं के साथ यह फिल्म देख रहे हैं तो यह आपकी सबसे बड़ी भूल होगी। फिल्म देखने का मज़ा जाता रहेगा। वास्तव में दर्शकों को यह सुझाव भी दिया जा सकता है कि वे इसे एक फ़ीचर फिल्म की तरह भी न देखें। यह फिल्म से ज्यादा एक मल्टी–पार्ट मिनी-सीरिज़ है, कश्यप की ही ‘ब्लैक फ्राइडे’ (2004) की तरह।




अधिकांश फिल्मों की एक निश्चित शुरुआत (पृष्ठभूमि), कथानक में मोड़ (टर्निंग प्वाइंट) और अंत (क्लाइमैक्स) होता है। लगता नहीं कि इस फिल्म के साथ ऐसा कुछ है, कम से कम ऊपरी तौर पर तो ऐसा नहीं लगता। जो विधा इस फिल्म के सबसे क़रीब ठहरती है, वह है एपिक - महाभारत, रामायण सरीखी मिथक-गाथाओं की तरह। आप केवल हीरो के अंतिम लक्ष्य की फिक्र करने के बजाय इन मिथक-गाथाओं के अलग-अलग हिस्सों को पसंद करते हैं। सरदार खान की दो बीवियां हैं। एक (रिचा चड्ढा) से उसे तीन बच्चे हैं। दूसरी आसनसोल की एक बंगालन है। उससे भी उसे एक बच्चा है।




सरदार के पिता, जैसा कि हम ग़ौर करते हैं, ब्रिटिश हिंदुस्तान में डकैत हुआ करते थे। यह उस दौर की बात है जब किसी सुल्तानी डाकू का नाम ही इन इलाक़ों में दहशत का बायस बन जाता था। फिल्म के अंत तक सरदार के बच्चे भी बड़े हो जाते हैं। उनमें से एक (नवाजुद्दीन, पिछले कुछ सालों की सबसे बेहतरीन खोज) वासेपुर के गिरोह में शामिल होने का अरमान मन में पाले हुए है। तीन पीढि़यों की दास्तान कहने वाली यह फिल्म स्वतंत्रता पूर्व से लेकर 1990 के दशक तक के कालखंड तक फैली हुई है।




संभव है एक सीमा के बाद आपका धैर्य जवाब दे जाए। ऐसा ही होता भी है। लेकिन जैसे ही ऐसा होता है, फिल्म निर्देशक सफलतापूर्वक एक रोचक दृश्य में दाखिल हो जाता है, एक मनोरंजक कतरन या कहानी में एक छोटा-सा पेंच, और आप फिर पिक्चर में पहले की तरह दिलचस्पी लेने लगते हैं।




फिल्म की कहानी का उद्देश्य वास्तव में बंगाल और झारखंड के इलाक़े के उस स्याह-मटमैले लैंडस्के‍प को कैप्चर करना है, जहां नियम-क़ायदे ग़ैरमौजूद हैं और डायलॉगबाज़ी और ‘रंगदारी’ जहां के उजड्ड शेखीबाज़ों का शग़ल है। इन उजड्डों की अपनी हुकूमत है। फिल्म इन बारीकियों पर मुस्तैदी से नज़र रखती है। प्रांतीय क़स्बों की पृष्ठभूमि में बनाई जाने वाली फिल्मों में आमतौर पर यह देखने को नहीं मिलता।




हिंदी फिल्मों का परंपरागत दर्शक इस तरह के सिनेमा को बहुत पसंद नहीं करता। वह अपने जीवन के कठोर यथार्थ से ही इतना त्रस्त रहता है कि वह फिल्मों में उसे देखना नहीं चाहता। जैसा कि हम फिल्म में देखते हैं, दर्शक 1970 के दशक की यश चोपड़ा की ‘त्रिशूल’ जैसी मेलोड्रैमिक फिल्म पर लट्टू हो जाते हैं, लेकिन वे चोपड़ा की ही विलक्षण ‘काला पत्थर’ (1979) को भी इतना ही पसंद करते हैं जो धनबाद की कोयला खदानों में फिल्माई गई थी। इस मायने में फिल्म में माफिया की सेटिंग एकदम सटीक है।




यह भारत का ऐसा इलाक़ा है, जहां आज भी दिवंगत सूरजदेव सिंह सरीखे खूंखार डॉन का नाम लोगों की रीढ़ में सिहरन पैदा कर देता है। विशाल भारद्वाज ने भी अपने मास्टरपीस ‘मक़बूल’ (2004) के दूसरे भाग को धनबाद में ही फिल्माना चाहा था, जहां फिल्म की पटकथा डॉन अब्बाजी (पंकज कपूर) के प्रारंभिक जीवन और उसके उदय की पड़ताल कर सकती थी। यदि वह फिल्म बनाई जाती तो वह शायद इस फिल्म से बहुत अलग होती।




'गैंग्स ऑफ वासेपुर' ख़ून में लथपथ इतिहास की एक वास्तविक कहानी है। फिल्मों की भी लैंगिकता होती है। इस मायने में यह पूरी तरह से एक पुरुष फिल्‍म है। इस पिक्चर में जिस तरह लोगों को जान से मारा गया है, उसे देखकर तो यह चमत्कार ही लगता है कि वे सब अब भी जीवित होंगे! कुरैशियों का समुदाय अन्य मुसलमानों पर टूट पड़ता है। कट्टों का शोर, रायफ़लें, रिवॉल्वर, कसाइयों के चाकू, दरांतियां हमारे दिलो-दिमाग पर हावी हो जाते हैं।




यदि यह एक फिल्म न होती, तो यह एक क्राइम बेस्ड ग्राफिक नॉवल होता। लेकिन तब आपको एक यादगार बैकग्राउंड स्कोर और बेहतरीन साउंड डिज़ाइन से महरूम होना पड़ता। यह फिल्म उन मिनी सीरीज़ की तरह है, जिन्हें आप किसी डीवीडी सेट में आने वाले कई वर्षों तक सहेजकर रखना चाहेंगे। जी हां, यह सहेजकर रखे जाने वाली फिल्म है।

(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे www.dainikbhaskar.com से जुड़े हैं)



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