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REVIEW: जानिए कैसी है जब तक है जान

फिल्म यश चोपड़ा की सर्वश्रेष्ठ भले ही न हो लेकिन यह जरूर साबित करती है कि वो बॉलीवुड के सबसे युवा निर्देशक थे।

Dainik Bhaskar

Nov 13, 2012, 06:33 PM IST
Film Review Jab Tak hai Jaan
हीरो (शाहरुख खान) गरीब है। हीरोइन (कैटरीना कैफ) जो एक बार फिर एक ओवरसीज इंडियन की भूमिका निभा रही हैं, ताकि अपने अजीबो-गरीब हिंदी उच्चारण को न्यायोचित ठहरा सकें, अमीर है। हीरो हीरोइन को बताता है कि गरीब होने के क्या सुख हैं।
लड़की सहज होती है और जिंदगी के दूसरे सुखों को समझती है। दोनों की आपस में खूब बनती है। यह कहानी 'टाइटेनिक' जितनी पुरानी है और इम्तियाज़ अली की 'रॉकस्टार' जितनी नई भी!। देखें जब तक है जान के प्रीमियर की खास तस्वीरें
फिल्म के लीड कपल एक-दूसरे को चाहते हैं। दोनों को यह बात लगभग एक साथ पता चलती है। लेकिन एक छोटी-सी समस्या यह है कि लड़की पहले ही किसी के साथ इंगेज्ड है। लेकिन यह कोई ऐसी समस्या नहीं, जिसका कोई हल न खोजा जा सके। वक्त अब बदल चुका है।
अब हमारे पडोसी और सगे-संबंधी हमारी किस्मत का फैसला नहीं करते। आज सगाई तोडना कोई बडी बात नहीं है। कम से कम लंदन में तो नहीं है। इस फिल्म की कहानी इसी शहर में घटित होती है। पढ़ें फिल्म जब तक है जान देखने वालों ने क्या कहा
लेकिन हीरो का एक्सीडेंट हो जाता है। हीरोइन उसकी जिंदगी के लिए प्रार्थना करती है। वह भगवान से वादा करती है कि यदि हीरो की जान बच गई तो वह उसे कभी नहीं देखेगी। केवल यश चोपडा जैसा कोई निष्णात निर्देशक ही यह कर सकता है कि इतनी कमजोर कहानी पर साढे तीन घंटों तक आपको अपनी सीट पर बैठे रहने को मजबूर कर दे। यह कहानी कुछ इसी तरह की है, जिसे कुछ समीक्षक इडियट प्लाट कहते हैं। एक ऐसी समस्या, जिसे महज एक बातचीत से सुलझाया जा सकता है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।
लेकिन ऐसा कहने का मतलब तो यह होगा कि हम फिल्में कहानियों के लिए देखते हैं। नहीं, यह सच नहीं है। हर बार तो नहीं ही है। और कम से कम यश चोपडा की रोमांस कथाओं के साथ तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
इन फिल्मों में लोग किसी सुपर सितारे को देखने जाते हैं, हालांकि शाहरुख की हार्डकोर महिला प्रशंसिकाएं इस फिल्म में उन्हें देखकर जरा निराश हो सकती हैं, या वे हीरोइन की कॉस्ट्यूम्स को देखने जाते हैं, या खूबसूरत लोकेशंस देखने जाते हैं, या उसके सुमधुर गीतों के लिए जाते हैं, हालांकि इस फिल्म के संगीत में कोई खास बात नहीं है और बैकग्राउंड स्कोर का एक बडा हिस्सा भी 'द मोटरसाइकिल डायरीज' से लिया गया है।
जाहिर है कि निर्देशक को अच्छी तरह पता है कि इन तमाम मसालों का इस्तेमाल कैसे किया जाए। उसे पता है और हमेशा से पता रहा है कि किसी अच्छे सीन को कैसे डील किया जाए। इस फिल्म में ऐसे कई मौके आते हैं, जो इस बात को साबित करते हैं। बस, बात इतनी ही है कि एक दर्शक के रूप में हम यह नहीं समझ पाते कि आखिर निर्देशक हमें कितनी कहानियां सुनाना चाहता है।
फिल्म के पहले भाग में शाहरुख ने वही भूमिका निभाई है, जो वे ताउम्र निभाते आ रहे हैं यानी एक लापरवाह खूबसूरत लवर ब्वॉय की। दूसरे भाग में वे एक ऐसे आर्मी मेजर के शांत, गंभीर और रूखे चरित्र में तब्दील हो जाते हैं, जिसे बमों से डर नहीं लगता। इसी भाग में हीरो को दूसरी हीरोइन (अनुष्का शर्मा) जिन्होंने टॉमब्वॉय बनने की बेतरह कोशिशें की हैं, से ठीक उसी तरह प्यार हो जाता है, जैसे उसे पहली हीरोइन से हुआ था। तीसरे भाग में हीरो अपनी याददाश्त गंवा बैठता है।
यह रुला देने वाली रोमांटिक कहानी है। इस तरह की फिल्में महिला दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, लेकिन याद रखना चाहिए कि हर पुरुष के भीतर एक भावुक महिला होती है। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म खत्म होते-होते हम हीरो की मोहब्बतों के बजाय फिल्म की लंबाई के बारे में सोचने लग जाते हैं। मुझे लगता है यह दिक्कत यश चोपडा को भी समझनी चाहिए थी। वे उन इने-गिने लोगों में हैं, जिन्हें जीते जी भी उतना सम्मान मिलता है, जितना मरने के बाद मिलता है।
चंद दिनों पहले जब उनकी मौत हुई, तब वे अस्सी के पार थे। अपने छह दशकों के करियर में यश चोपडा हमेशा इसलिए शीर्ष पर रहे, क्योंकि उन्होंने चुनौतियां उठाईं। वर्ष 1973 में रिलीज हुई 'दाग' एक निर्माता-निर्देशक के रूप में उनकी पहली फिल्म थी और उसकी कहानी उनकी अंतिम फिल्म 'जब तक है जान' से मिलती-जुलती थी। यश चोपडा ने जो फिल्में बनाईं, वे धीरे-धीरे फार्मूला बनती चली गईं।
वर्ष 1965 में रिलीज हुई 'वक्त' बॉलीवुड की पहली खोया-पाया फिल्म थी। वर्ष 1991 की 'लम्हे' में उन्होंने पहली बार अमीर अप्रवासी भारतीयों को दिखाया। 'चांदनी' को मैं उनकी कमबैक फिल्म मानता हूं और इस फिल्म के बाद वे स्वयं फार्मूला फिल्मों के पर्याय बन गए। लेकिन उनकी प्रतिभा केवल रोमांटिक कहानियों तक सीमित नहीं थी। 1975 में वे 'दीवार' जैसी कसावट भरी एक्शन ड्रामा फिल्म बना चुके थे।
लेकिन साढ़े तीन घंटे लंबी 'जब तक है जान' देखने के बाद आप जब थिएटर से बाहर निकलते हैं तो सोचते हैं कि उनकी आखिरी फिल्म निश्चित ही उनकी सर्वश्रेष्ठ फिल्म नहीं थी। हालांकि अस्सी साल की उम्र में यह उम्मीद करना भी ज्यादती ही होगी कि कोई व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करे। इस फिल्म के कुछ दृश्यों में यश चोपडा की उस शैली की झलक मिलती है, जिसे हम प्यार करते हैं।
हम इन दृश्यों को देखकर समझ जाते हैं कि आखिर क्यों उन्हें सबसे नौजवान फिल्मकार कहा जाता था। शायद उन्हें इस फिल्म के लिए याद न रखा जाए। लेकिन वे अपने पीछे निश्चित ही दूसरी अनेक फिल्मों की ऐसी विरासत छोड गए हैं, जिनके लिए उन्हें भुलाया नहीं जा सकता।

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