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फिल्म रिव्यूः ‘प्लेयर्स’

अब्बास-मस्तान निर्देशित ‘प्लेयर्स’ फिल्म द इटैलियन जॉब (1969 और 2003 का वर्जन) का ऑफिशियल इंडियन रीमेक है।

Dainik Bhaskar

Jan 06, 2012, 04:52 PM IST

अब्बास-मस्तान निर्देशित ‘प्लेयर्स’ फिल्म द इटैलियन जॉब (1969 और 2003 का वर्जन) का ऑफिशियल इंडियन रीमेक है। फिल्म को लेकर यह बातें कई बार कहीं गईं कि इसमें दर्शकों को देखने के बाद कहीं भी नहीं लगेगा कि यह रीमेक है लेकिन ये भी नेताओं के दावों की तरह चुनावी दावे ही साबित हुए। हालांकि फिल्म में कई बदलाव किए गए हैं लेकिन इसे इतना लंबा कर दिया गया है कि यह उबाऊ लगने लगती है। साथ ही फिल्म के कई एक्टरों ने रही-सही कसर निकाल दी है। नील और बिपाशा को छोड़ दिया जाए तो बाकियों को देखकर कभी लगता ही नहीं है कि वे किसी एक्शन फिल्म में काम कर रहे हैं।





चार्ली (अभिषेक बच्चन) एक चार्टर्ड अकाउंटेंट है और उसका सपना है कि वह बच्चों के लिए एक ऐसा स्कूल बनाए जिसमें वे रह भी सकें। इसके लिए चार्ली रशिया से रोमानिया जाने वाले अरबों रुपये का सोने को चुराने का प्लान बनाता है। लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है इसलिए वह इस काम में अपने उस्ताद विक्टर(विनोद खन्ना) की मदद लेता है जो जेल में बंद है लेकिन अपराध की दुनिया में उसका दबदबा है। तब विक्टर चार्ली को एक टीम बनाने को कहता है जिसका हर सदस्य चालाक और अपने काम में माहिर है। बिलाल बशीर (सिकंदर खेर) विस्फोट विशेषज्ञ है, स्पाइडर (नील नितिन मुकेश) कम्प्यूटर हैकर है, सनी मेहरा (ओमी वैद्य) हर काम में उस्ताद है, रॉनी (बॉबी देओल) को जादूगरी आती है। चार्ली की पार्टनर रिया (बिपाशा बसु) भी उससे जुड़ जाती है और ये सब निकल पड़ते हैं रशिया की ओर अपने काम को अंजाम देने के लिए। सोना चुरा भी लिया जाता है लेकिन गैंग का ही कोई सदस्य सारा उड़ा ले जाता है। यह कौन है औऱ क्या चार्ली का सपना पूरा हो पाता है, यही फिल्म की बाकी कहानी है।

स्टार कास्ट:अभिषेक बच्चन ने अपनी एक्टिंग से धूम सीरिज वाली फिल्म की याद दिला दी। इसमें उन्होंने अच्छे और बुरे आदमी के बीच स्विच करने में कोई अंतर ही नहीं रखा है। बिपाशा बसु ने जरूर अपने एक्सप्रेशन और आवाज में कॉन्फिडेंट दिखाई है जो दर्शकों पर एक इम्पैक्ट छोड़ती है। सोनम कपूर के काम में एक्टिंग ढ़ूंढना एक मुश्किल काम है। कई जगह वे बिल्कुल बनावटी ही दिखाई देतीं हैं। नील नितिन मुकेश ने चौंकाने वाला प्रदर्शन किया है। बॉबी देओल तो ज्जादातर समय एक मूक दर्शक की तरह नजर आते हैं। सिकंदर खेर और ओमी वैद्य ठीक-ठाक रहे हैं। विनोद खन्ना अपनी छोटी लेकिन निर्णायक भूमिका में खूब जमे हैं। एक कार मैकेनिक के रूप में जॉनी लीवर ने फिल्म में कुछ कॉमेडी मोमेंट्स डालने का प्रयास किया है।

डायरेक्शनः अब्बास-मस्तान ने हमेशा ही एक डायरेक्टर के तौर पर धूम मचाई है लेकिन इस बार रोहित जुगराज व सुदीप शर्मा के लिखे गए कमजोर स्क्रीनप्ले और डायलॉग्स के कारण वे असफल साबित हुए हैं। प्यार में विश्वासघात और पार्टनर्स की अदला-बदली देखकर अचानक से ही अब्बास-मस्तान की लास्ट रिलीज रेस की याद आ जाती है। इसमें कोई शक नहीं है कि फिल्म में रॉबरी सीक्वेंस लाजवाब है और यह फिल्म की यूएसपी है।


म्यूजिक/सिनेमैटोग्राफी/डायलॉग्स/एडिटिंगः
फिल्म का संगीत लोगों के दिलों में कोई खास जगह नहीं बना पाया है। वहीं क्लाइमैक्स में सीक्वेंस के अनुसार बैकग्राउंड म्यूजिक सिंक नहीं हो पाया जिसके कारण यह बहुत अजीब लगता है। रॉबरी को दिखाने के लिए जिस तरह से लोकेशंस को कैप्चर किया है उसके लिए सिनेमैटोग्राफी की तारीफ की जानी चाहिए। डायलॉग्स में कोई दम नहीं है जिसके कारण एक्टर्स भी बेदम नजर आते हैं। फिल्म को और छोटी बनाने में एडिटिंग का अहम योगदान हो सकता था लेकिन ऐसा कहीं भी नजर नहीं आया।

क्यों देखें: अब्बास-मस्तान व रॉबरी पर बनी फिल्मों को देखने के शोकीन हैं।



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