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'राउडी राठौर': फ़ॉर्मूले के रण में राठौर

फिल्म रिव्यू: पढ़िए जाने-माने फिल्म समीक्षक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया 'राउडी राठौर' का रिव्यू।

Dainik Bhaskar

Jun 01, 2012, 09:38 PM IST

(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे हर शुक्रवार को दैनिकभास्कर डॉट कॉम के लिए फिल्म रिव्यू करेंगे।)








‘मैं नहीं डरता मौत से। मौत डरती है मुझसे’, एएसपी विक्रम राठौर दहाड़ते हैं। जब वे बीसियों लोगों का सिर फोड़ देते हैं और एक ही मुक्के से उन्हें मच्छरों की तरह उड़ा देते हैं तो आपको उनकी बात पर भरोसा होने लगता है। धरती थरथराती है। जब आखिरकार राठौर धराशायी होते हैं तो लगता है कि शायद उन्होंने अब दम तोड़ दिया है। लेकिन ठीक तभी बादल घिर आते हैं, उनके मुंह पर पानी की एक बूंद गिरती है और धुंआधार बारिश होने लगती है।







राठौर फिर से रण में हैं। तालियां। तड़, तड़ाक! लेकिन, वास्तव में यह शख्स आखिर है कौन? फिल्म में इससे पहले जब नायक एक कमरे में महिलाओं से घिर जाता है, तो वे उससे यही सवाल पूछती हैं। बॉलीवुड के अन्य सितारों का हवाला देते हुए वे उससे पूछती हैं : तुम आमिर की तरह क्यूट नहीं,तुम्हारी बॉडी सलमान-सी नहीं, तुम ऋतिक रोशन सरीखे बांके-छबीले नहीं.. तुम अपने को समझते क्या हो? ‘आप खिलाड़ी को भूल गईं,’ नायक उन्हें याद दिलाता है। आह, खिलाड़ी, यक़ीनन, हम उसे भूल गए थे।







1990 के दशक के दौरान जब बॉलीवुड की सभी फिल्में कमोबेश एक-सी हुआ करती थीं, इस फिल्म के नायकअक्षय कुमार फिल्म पत्रिकाओं में महिलाओं के बीच खिलाड़ी और ‘खिलाड़ी’ श्रृंखला की फिल्मों‘खिलाड़ी’, ‘मैं खिलाड़ी तू अनाड़ी’, ‘सबसे बड़ा खिलाड़ी’, ‘खिलाडि़यों का खिलाड़ी’, ‘मिस्‍टर एंड मिसेज़ खिलाड़ी’, ‘इंटरनेशनल खिलाड़ी’, ‘खिलाड़ी 420’ के एक्शन स्टार हुआ करते थे। यहां वे उचित ही दर्शकों को अपनी मौजूदगी का अहसास कराते हैं और इसकी वजह यह है कि शायद ‘कॉमिक-एक्शन मसाला एंटरटेनर्स’ की वापसी हो चुकी है, जिसका श्रेय दक्षिण भारतीय फिल्मों की रीमेक्स और पहले आमिर खान की ‘गजनी’ (2008) और उसके फ़ौरन बाद आई सलमान खान की ‘वांटेड’ (2009) जैसी फिल्मों की कामयाबी को दिया जाना चाहिए। तेलुगु फिल्म ‘पोखिरी’ पर आधारित ‘वांटेड’ एक ‘चांस हिट’ थी और इस फिल्म के कारण सालों बाद देशभर के सिंगल स्‍क्रीन छविगृहों में सिक्कों की बारिश हुई थी।







इसके बाद सलमान ने इसी तरह की तीन और ‘सुपर हिट’ फिल्में दीं : ‘दबंग’ (2010), ‘रेडी’(2011) और‘बॉडीगार्ड’ (2011)। ‘दबंग’ की ही तरह ‘राउडी राठौर’ भी कॉप-ड्रामा है, जिसकी आंशिक पृष्ठभूमि पूर्वी भारत है (पूर्वी उत्तरप्रदेश के बजाय गंवई बिहार), ‘रेडी’ के ‘ढिंका चिका’ की ही तरह इस फिल्म में भी हीरो ‘चिंताता चिता चिता’ की धुन पर ठुमकता है और (बेतुकी और बकवास) ‘बॉडीगार्ड’ की ही तरह माना जा सकता है कि यह फिल्म भी किसी के भी बारे में नहीं है। हम देख सकते हैं कि हमारे फिल्मकार किन फिल्मों से प्रेरणा पा रहे हैं।







‘वांटेड’ के निर्देशक प्रभु देवा ने उस फिल्म के जरिए उम्र की चालीसा पार कर चुके सलमान खान को किसी दक्षिण भारतीय सुपर सितारे के समकक्ष ला खड़ा कर दिया था। सलमान हिंदी फिल्मों के रजनीकांत और गरीबों के मसीहा बन गए। प्रभु देवा ‘राउडी राठौर’ के भी निर्देशक हैं। शायद सुपर सितारे के ओहदे तक एक ही व्यक्ति पहुंच सकता है : रजनी या सलमान, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि दूसरे कोशिश करना छोड़ दें।







हम उम्मीद कर सकते हैं कि दूसरों की कोशिशें कारगर साबित हों। पिछले साल ‘सिंघम’ में अजय देवगन ने ऐसी ही गुर्राहट भरी कोशिश की और वे कामयाब हुए। अक्षय कुमार ‘राउडी राठौर’ में दोहरी ताक़त से कोशिश करते हैं। इस फिल्म में वे दोहरी भूमिका में हैं। फिल्म का पोस्टर दर्शकों को लुभाता है : ‘एक टिकट में डबल धमाका’। ज़ाहिर है, हम सभी रोमांचित हो उठते हैं।







और यक़ीनन, फिल्‍म की कहानी बहुत शानदार ही होगी। फिल्म के तेलुगु मूल ‘विक्रमकरुडु’, जिसमें रवि तेजा नायक थे, का तमिल और कन्नड़ संस्करण बन चुका है और उसके एक बांग्ला संस्करण पर काम चल रहा है। फिल्म को मलयालम, हिंदी और भोजपुरी में पहले ही डब करके रिलीज किया जा चुका है। आखिर, इस कहानी में भला ऐसी क्या बात है? देवगढ़ (जिसके नाम की तुक ‘शोले’ के रामगढ़ से मिलती है) नामक एक वीरान क़स्बे में बापजी (शायद यह नाम सनी देओल की ‘नरसिम्हा’ से प्रेरित है) की तूती बोलती है। महिलाओं का बलात्कार करना उसका प्रिय शग़ल है। वह पुलिसवालों की बीवियों को भी उठा ले आता है और वे हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हैं। इसी चूहेदानी में राठौर का पदार्पण होता है। राठौर के दफ्तर की दीवार पर गांधी के बजाय भगत सिंह की तस्वीर टंगी है। हम समझ जाते हैं कि वह बापजी को ठिकाने लगा देगा।







लेकिन अचानक राठौर गुम हो जाता है, या शायद उसे मार दिया गया है। उसका एक हमशक्ल मुंबई में है, जिसका नाम है शिवा। उसे राठौर की जगह बड़ी आसानी से फिट किया जा सकता है, बस उसकी मूंछें तनिक ऐंठदार हैं। वह एक मामूली ठग है। सोनाक्षी सिन्हा ने उसकी गर्लफ्रेंड की भूमिका निभाई है और उनकी भूमिका राठौर की ही तरह बेतरतीब है। लेकिन यह हमशक्ल भोंदू नहीं है और वह राठौर की ही तरह दुश्मनों का भुर्ता बनाने में सक्षम है। जैसा कि वह कहता भी है : ‘जो मैं बोलता हूं, वो मैं करता हूं। जो मैं नहीं बोलता, वो डेफिनेटली करता हूं।’ तब हमारा जी करता है कि काश उसने एक्शन के बजाय थोड़ी और कॉमेडी की होती, ‘डॉन’ के हमशक्ल विजय की तरह, लेकिन उसके शब्द यहां उसे दग़ा दे जाते हैं।








अक्षय कुमार दोहरी भूमिकाओं में भी एक जैसे ही हैं, ठीक वैसे ही, जैसे यह फिल्म भी हाल ही में या गुजरे सालों में रिलीज हुई किसी भी अन्य एक्शन फिल्म से अलग नहीं है। एक पिटे हुए फ़ॉर्मूले की यही गत होती है। जहां तक बॉक्स ऑफिस के अंकगणित का सवाल है तो फिल्म के निर्माताओं संजय लीला भंसाली और यूटीवी को पूरा यक़ीन है कि आज के दर्शक यही देखना चाहते हैं। शायद यह सच भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दर्शक इससे बेहतर के हक़दार नहीं हैं? पता नहीं।








एक टिकट की क़ीमत के लिहाज से फिल्म में पर्याप्त बारूद है। ‘डोंट एंग्री मी,’ अक्षय कुमार का किरदार एक बार फिर दहाड़ता है (क्रुक या कॉप, इससे फ़र्क नहीं पड़ता)। प्लीज, प्लीज, डोंट एंग्री मी एनीमोर,’आप मन ही मन प्रार्थना करने लगते हैं, और आपका सिर, जो एक समय के बाद दर्द करने लगा था,ठीक होने का नाम नहीं लेता





























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