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REVIEW: 'सन ऑफ सरदार'

Mayank Shekhar

Nov 14, 2012, 09:30 AM IST

यदि आप इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें पालकर सिनेमाघर में आए हैं तो हो सकता है कि सन ऑफ सरदार के बजाय सरदर्द के बाप से आपका पाला पड़ जाए।

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यदि आप इस फिल्म से ज्यादा उम्मीदें पालकर सिनेमाघर में आए हैं तो हो सकता है कि 'सन ऑफ सरदार' के बजाय सिरदर्द के बाप से आपका पाला पड़ जाए।

फिल्म में कुछ पागलपन भरे मजेदार दृश्य जरूर हैं, लेकिन उन्हें भी आप केवल तभी तक बर्दाश्त कर सकते हैं जब तक आपको सिरदर्द शुरू न हो जाए।

अजय देवगन ने फिल्म में हीरो की भूमिका निभाई है। चूंकि इस तरह की फिल्मों में हीरो का कोई न कोई तकिया कलाम होता है, लिहाजा इसमें उनका तकिया कलाम है 'कभी हंस भी लिया करो'। निश्चित ही हम हंसते हैं, लेकिन कुछ ही मौकों पर और वे मौके भी कभी-कभार ही मिलते हैं।


गोलमाल सीरीज की फिल्मों के बाद आप यह तो समझ ही गए होंगे कि अजय देवगन को कॉमेडी करना आता है। फिर उनकी बाजुओं में इतनी ताकत भी है कि वे सरदार लड़ाकों की 'सवा लाख से एक लड़ाऊं' वाली मिसाल पर फिट बैठते हैं।

फिल्म में संजय दत्त ने उनके दुश्मन की भूमिका निभाई है। वे भी कुछेक लाख लोगों को अकेले ही ठिकाने लगा सकते हैं। यह बच्चों की फिल्म की तरह है, अलबत्ता इस फिल्म को देखने आने वालों की भीड़ में अधिकतर खुशमिजाज राउडीनुमा बाशिंदे हैं, ठीक वैसे ही जैसे 'जब तक है जान' देखने वालों में लड़कियों, आंटियों और फैमिली ऑडियंस की तादाद ज्यादा है।

दूसरे देशों में त्योहारों के मौके पर रिलीज होने वाली फिल्मों का मतलब होता है एक बेहतर कलात्मक फिल्म। लेकिन भारत में त्योहारों पर इस जैसी ऊटपटांग फिल्में रिलीज होती हैं, जिन्हें देखने के लिए अलसुबह से ही लोग कतार में लगे नजर आते हैं।


फिल्म की कहानी पंजाब के एक पिंड में घटित होती है जो भारत का पॉप-कल्चरल कैपिटल है।

ऐसा लगता है कि यह फिल्म खुद गुरमुखी स्क्रिप्ट में लिखी गई हो। वो तो भला हो बॉलीवुड की फिल्मों का जिनके कारण हम आधी पंजाबी तो यूं ही सीख गए हैं, लिहाजा इस फिल्म की भाषा समझने में ज्यादा दिक्कतें नहीं आतीं। हालांकि इस फिल्म और साउथ की अनेक ब्लॉकबस्टर फिल्मों के मद्देनजर यह कहना ही ठीक रहेगा कि भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी नहीं हिस्टीरिया है।

सुना है कि 'सन ऑफ सरदार' एसएस राजमौली की तेलुगु हिट फिल्म 'मर्यादा रामन्ना' का रीमेक है, जो खुद बस्टर कीटन की साइलेंट कॉमेडी अवर हॉस्पिटैलिटी से प्रेरित थी।


फिल्म में जिस तरह लोग दिनदहाड़े तलवार और बंदूकें लेकर घूमते दिखाए गए हैं, उससे लगता है कि हम पंजाब नहीं बल्कि तालिबान वाले अफगानिस्तान में हैं।

इस समाज की बुनियाद तीन चीजों पर टिकी है बदला, इज्जत और मेहमान-नवाजी, जिसमें मेहमान को भगवान का दर्जा दिया जाता है।

इसका मतलब यह है कि रंधावा परिवार के देवगन का संधू खानदान तब तक बाल भी बांका नहीं कर सकता, जब तक कि वह संधू खानदान के घर में ठहरा हुआ है और उनका मेहमान है। दूसरी तरफ संधू खानदान पहले ही बदले की आग में झुलसते हुए रंधावा खानदान के अनेक लोगों को ठिकाने लगा चुका है।


फिल्म की मंशा जाहिर है। इसमें कॉमेडी की खासी गुंजाइश है। पूरी फिल्म में कुल मिलाकर महज पांच या छह महत्वपूर्ण दृश्य हैं। राजामौली की ही फिल्म 'ईगा' की तरह जिसकी हिंदी रीमेक 'मक्खी' हाल ही में रिलीज हुई थी। इस फिल्म में भी एक बुनियादी आइडिया तो है।

इसके बावजूद यह हमें निराश करती है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा यह एक फेस्टिवल फिल्म है। इस मौके पर किसी भी बे सिर-पैर की फिल्म से काम चल जाएगा। ये फिल्में भी कामयाब साबित हो सकती हैं, क्योंकि उम्मीदें यही लगाई जा रही थीं कि यह फिल्मी ऐसी ही होगी।
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