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REVIEW: अंदर तक झकझोर देती है 'हारुद'

यह ऐसी फिल्म है जो हमें दूसरे लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना देती हैं।

Dainik Bhaskar

Jul 27, 2012, 05:57 PM IST
REVIEW: 'Harud' , a touching depiction of kashmir
हारूद का मतलब होता है पतझड़। यही इस फिल्म का मौसम है। लेकिन हमें पता नहीं साल कौन-सा है। पत्रिकाओं के कवर पर अटल बिहारी वाजपेयी की तस्वीरें सजी हैं, जिससे पता चलता है कि यह वर्ष 2005 से पहले का समय है। कश्मीर के कुछ लोग कुछ रोमांचित नजर आते हैं, क्योंकि भारत सरकार ने कश्मीसरवासियों को ईद के खास तोहफे के रूप में सेलफोन कनेक्टिविटी दी है। रफीक नामक एक नौजवान लौटकर घर आता है। उसे देखकर लगता है कि दुख और असहायता की भावनाओं के ज्वार के नीचे वह भावनाशून्य हो गया है। उसकी दुनिया भी ऐसी ही बेहलचल है। उसकी मनोदशा को शब्दों में बयां नहीं कर सकते। वह खुद कभी-कभार ही कुछ बोलता है। कश्मीर के हजारों लापता बच्चों की ही तरह रफीक का भाई भी लापता है। हो सकता है कि वह अब इस दुनिया में न हों। या शायद वे सभी बच्चे आतंकवादी बन गए हों, जिन्हें पाकिस्तान में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। या शायद वे भारतीय सेना की हिरासत में हों। सच किसी को नहीं पता। रफीक के पिता ट्रैफिक कांस्टेबल हैं। उनकी भावनाएं इस तरह पथरा गई हैं कि लगता है जैसे वे किसी भयावह पेंटिंग से निकलकर आ रहे हों। उनके दोस्त इस तरह जी रहे हैं, मानो उनके सिर पर कोई बम टिक-‍टिक कर रहा हो। उनमें से कुछ-एक बेहतर जीवन की तलाश में कहीं चले जाना चाहते हैं, लेकिन बाकी वहीं रहकर अपनी त्रासद नियति का सामना करने को तैयार हैं। रफीक भी एक बार सरहद पार करने की कोशिश कर चुका है। लेकिन वह नाकाम रहा था। हम फौरन समझ जाते हैं कि उसने ऐसा कदम क्यों उठाया था। फिल्म का ट्रीटमेंट अपनी विषयवस्तु के अनुरूप है। यह किसी तेजतर्रार कथानक वाली फिल्म नहीं है। फिल्म की बारीक बुनावट कुछ दर्शकों को उबाऊ भी लग सकती है। लेकिन फिल्म अपने परिवेश को प्रभावी रूप से रचती है। डॉक्यू–ड्रामा का रूखापन हमें एक ऐसी दुनिया में ले जाता है, जो आमतौर पर समाचारों और आंकड़ों के कारण हमसे अलग-थलग रह जाती है। हम अखबारों में कश्मीर की तकलीफों के बारे में पढ़ते हैं, लेकिन इस लड़के के जीवन का पीछा करता कैमरा हमें अंधकार की घाटी के बीचों-बीच ला खड़ा कर देता है। हमारी रीढ़ में सिहरन दौड़ जाती है। हम उन लोगों की पीड़ा को महसूस कर सकते हैं। सिनेमा का मकसद हमेशा ही हमारा मनोरंजन करना नहीं होता। कुछ फिल्में ऐसी भी होती हैं, जो हमें दूसरे लोगों की जिंदगी का हिस्सा बना देती हैं। यह उसी तरह की फिल्म है। ऐसी फिल्मों को कला फिल्में कहा जाता है, जिन्हें फिल्म समारोहों के दौरान कलाप्रेमियों द्वारा देखा जाता है। लेकिन अब इस तरह की फिल्में सामान्य थिएटरों में भी रिलीज होने लगी हैं। 60 के दशक की फिल्में देखने पर हम पाते थे कि शम्मी कपूर डल झील के शिकारों पर झूम रहे हैं। समय बदला। 90 के दशक के बाद से कश्मीर में केवल उन्हीं लोगों की आवाजें सुनाई दे रही हैं, जो हिंसा और राजनीति की नूराकुश्ती के बीच फंसे हुए हैं। शूजित सरकार की ‘यहां’ (2005) और संतोष सिवान की ‘तहान’ (2008) जैसी फिल्मों ने उन लोगों की आवाज को हम तक पहुंचाने में मदद की थी, हालांकि इस तरह की फिल्मों की तादाद बहुत कम है। यह मूवी उन फिल्मों की फेहरिस्तव में एक वाजिब और महत्वीपूर्ण इजाफा करती है।
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