बॉलीवुड गपशप

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100 YEARS: असल जिंदगी में मर्द था बॉलीवुड फिल्मों की पहली हीरोइन

हर साल 3000 से ज्यादा फिल्में बनाने वाले बॉलीवुड की फिल्में 90 देशों में दिखाई जाती हैं।

Dainik Bhaskar

May 03, 2013, 10:54 AM IST
indian cinema rare and interesting facts
भारतीय सिनेमा यानी बॉलीवुड आज अपने 100 साल पूरे कर चुका है। अमेरिकन फिल्म इंडस्ट्री के केंद्र हॉलीवुड और भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई को मिलाकर भारतीय फिल्म जगत का नाम 'बॉलीवुड' रखा गया। 100 साल के लंबे सफर में बॉलीवुड ने देश-दुनिया के कई महान कलाकार दिए। हर साल 3000 से ज्यादा फिल्में बनाने वाले बॉलीवुड की फिल्में 90 देशों में दिखाई जाती हैं।
बॉलीवुड आज दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म निर्माता है। 'प्यासा' (1957), 'कागज के फूल' (1959), 'आवारा' (1951), 'श्री 420' (1955), 'मदर इंडिया' (1957), 'मुगल-ए-आजम' (1960), 'दो बीघा जमीन' (1957) और 'मधुमति' (1958) जैसी यादगार फिल्मों को अपने इतिहास में समेटे बॉलीवुड का सफर आज भी बदस्तूर जारी है। फिल्मों का स्वरूप, टेक्नोलॉजी और ट्रेंड जरूर बदल गया है, लेकिन सिनेमा के प्रति लोगों की दीवानगी बढ़ती ही जा रही है।
इंडियन सिनेमा के 100 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में dainikbhaskar.com आपको इंडस्ट्री से जुड़े कुछ अनजाने फैक्ट से रूबरू करवा रहा है।
तो फिल्मी दुनिया की अनसुनी बातें जानने के लिए आगे की स्लाइड्स पर क्लिक कीजिए।
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किस्मत थी पहली सुपरहिट फिल्म
 
1943 में प्रदर्शित फिल्म 'किस्मत' ने अशोक कुमार की किस्मत बदल दी और उन्हें स्टार बना दिया। यह फिल्म कई मायनों में लीक से हटकर थी। इस फिल्म में अशोक कुमार ने हीरो की स्थापित छवि के विपरीत भूमिका की और हिंदी फिल्मों में एंटी हीरो की एक नई छवि सामने आई। किस्मत ने कोलकाता के रॉक्सी थियेटर सिनेमा हॉल में लगतार तीन साल तक चलने का रिकॉर्ड बनाया।सिनेमाघर के बाहर इस फिल्म को देखने के लिए पांच किलोमीटर तक की लाइन लगी रहती थी। यह इंडियन सिनेमा की पहली सुपरहिट फिल्म थी कहा जाता है। स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने भी इस फिल्म को लगभग पचास बार देखा था।
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महात्मा गांधी ने देखी केवल एक फिल्म
 
क्या आप जानते हैं कि अपने पूरे जीवन में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने केवल एकमात्र फिल्म देखी थी। इस फिल्म का नाम रामराज्य था। मराठी निर्देशक विजय भट्ट द्वारा तैयार यह दो घंटे की फिल्म गांधी जी को काफी पसंद आई थी। यह फिल्म गांधी जी की पसंदीदा पुस्तक वाल्मीकि द्वारा रचित 'रामायण' पर आधारित थी जो कि 1943 में रिलीज़ हुई थी।
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वेटर बना पहली बॉलीवुड हीरोइन
 
भारतीय सिनेमा जगत की पहली फीचर फिल्म राजा हरिश्चंद्र में राजा हरिशचंद्र का किरदार दत्तात्रय दामोदर, पुत्र रोहित का किरदार दादा फाल्के के पुत्र भालचंद्र फाल्के जबकि रानी तारामती का किरदार रेस्टोरेंट मे बावर्ची के रूप मे काम करने वाले व्यक्ति अन्ना सालुंके निभाया था। 
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'राजा हरिश्चंद' की रूपरेखा बना चुके दादा साहेब फालके तारामती के रोल के लिए वेश्याओं के पास गए, लेकिन उनसे तक 'न' सुनने को मिली। फिर गए एक कैंटीन में। टेंशन मिटाने के लिए। एक कप चाय पीने के लिए। और वहां उन्हें मिली उनकी हीरोइन। सालुंखे। जी नहीं, यह कोई लड़की नहीं थी। वेटर था, लेकिन चाल-ढाल लड़कियों जैसी। चाय का गिलास पकड़ाते वक्त सालुंखे की उंगलियां जो फालके साहेब की उंगलियों से छू गई, उन्हें करंट-सा लगा और ढेर सारे पैसे का लालच देकर सालुंखे को बना दिया तारामती।

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हिन्दी फिल्मों की पहली ड्रीम गर्ल
1933 में आई फिल्म 'कर्मा' देविका रानी इतनी ज्यादा सक्सेसफुल हुईं कि उन्हें स्टार कहा जाने लगा। उन्होंने वर्जनाओं को तोड़ते हुए गहरे चुंबन और इंटीमेट सीन्स किए और वे भारत की फर्स्ट फीमेल फिल्म स्टार बन गईं। उन्होंने इस फिल्म में चार मिनट लंबा किसिंग सीन देकर धमाका कर दिया। यह सीन उन्होंने अपने पति हिमांशु राय के साथ दिया था। यह सीन काफी विवादित हुआ। इसका काफी विरोध भी हुआ, पर बॉम्बे टाकीज के बैनर तले बनी ये फिल्म टिकट खिड़ी पर सिर्फ चली नहीं, खूब दौड़ी और देविका की जानदार परफॉर्मेंस ने उन्हें सितारा बना दिया। हिन्दी फिल्मों की पहली स्वप्न सुंदरी ड्रीम गर्ल देविका रानी को कहा जाता है। देविका रानी को पसंद करने वालों की लिस्ट में जवाहर लाल नेहरु भी शामिल थे। उन्होंने देविका को एक लव लैटर भी लिखा था।
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क्या आप जानते हैं कि हिंदी सिनेमा की सबसे सुपरहिट फिल्मों की लिस्ट में शुमार शोले में गब्बर का रोल करने वाले अमजद खान इस रोल के लिए पहली पसंद नहीं थे। उन्हें शुरूआत में ड्रॉप कर दिया गया था क्योंकि जावेद अख्तर को रोल के हिसाब से उनकी आवाज बहुत कमजोर लग रही थी।

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महान कलाकार गुरू दत्त और देव आनंद, दोनों की शर्ट एक बार गलती से लॉंड्री पर बदल गई थी। और फिर उस शर्ट ने ऐसा कमाल कर दिखाया कि वो दोनों बहुत ही घनिष्ठ मित्र बन गए।

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काबुली वाला, लाजवंती, हक़ीक़त, दो बीघा ज़मीन, धरती के लाल, गर्म हवा, वक़्त, दो रास्ते जैसी जबरदस्त फिल्मों के अभिनेता बलराज साहनी साम्यवादी विचारधारा के थे। बलराज साहनी बचपन का शौक पूरा करने के लिये इंडियन प्रोग्रेसिव थियेटर एसोसियेशन (इप्टा) में शामिल हो गये। उन्हें अपने क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट विचारों के कारण जेल भी जाना पडा था। उन दिनों वह फ़िल्म 'हलचल' की शूटिंग में व्यस्त थे और निर्माता के आग्रह पर विशेष व्यवस्था के तहत फ़िल्म की शूटिंग किया करते थे। शूटिंग खत्म होने के बाद वापस जेल चले जाते थे।

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मंसूर खान ने आमिर की डेब्यू  फिल्म ‘कयामत से कयामत तक’ तथा ‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘जोश’  बनाई थी। ‘जोश’ के समय उन्हें महसूस हुआ कि अब वे एकाग्रता से काम नहीं कर पा रहे  हैं। अनजान बेचैनी के दौर में अगर वे फिल्में बनाते रहते तो बुरी और असफल फिल्मों के बनने की संभावना प्रबल थी। ऐसे में उन्होंने अपना घर बेचकर दक्षिण भारत का रुख किया और वहां एक शांत स्थान पर अपनी पत्नी के साथ कई वर्ष सादगी से बिताए और खेती की।

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