रिव्यूज़

--Advertisement--

हरियाणा ही नहीं हर गांव की कहानी है 'जलपरी'

आज भारतीय शहरी युवा के लिए ग्रामीण जीवन उतना ही एग्जॉटिक हो गया है, जैसा कि वह किसी जमाने में पश्चिम के लिए हुआ करता था।

Dainik Bhaskar

Sep 01, 2012, 11:47 AM IST
review of 'jalpari, the desert mermaid'

बच्चों के साथ अपने गांव जाते डैड (प्रवीण डब्बास, हमेशा की तरह संजीदा) कहते हैं कि हम आमतौर पर अपनी फिल्मों में गांवों को कितना ‘रोमांचक’ दिखाते हैं। निश्चित ही गरीबी में कोई कविता नहीं है और अज्ञान में उससे भी कम रूमानियत है। आज भारतीय शहरी युवा के लिए ग्रामीण जीवन उतना ही एग्जॉटिक हो गया है, जैसा कि वह किसी जमाने में पश्चिम के लिए हुआ करता था। इसलिए किसी फिल्म में उसका यथार्थवादी चित्रण देखकर अच्छा लगता है। पिता (प्रवीण) पेशे से डॉक्टर है। वह अपने गांव का भला चाहता है, लेकिन हम समझ जाते हैं कि उसे कहां से प्रेरणा मिलती है: “बंजर सोच, बंजर गांव, बंजर ही रहेगा”। हम देखते हैं कि हमारे सामने रूढि़यों और गैरजागरूकता के अनेक वर्षों के बोझ तले दबा एक गांव है। सड़कों पर मुश्किल से ही महिलाएं नजर आती हैं। पराए पुरुषों के स्पर्श की मनाही के कारण महिलाओं को डॉक्टर के पास भी नहीं ले जाया जाता। यहां अस्पताल भी नहीं हैं। डॉक्टर एक अस्पताल खोलना चाहता है। पूरी संभावना है कि उसके इस कदम का विरोध किया जाएगा। पश्चिमी दवाइयों के बजाय यहां नीम-हकीमों का बोलबाला है। डॉक्टिर के लिए हालात अनुकूल नहीं हैं। लेकिन, वह ठीक ही कहता है, ‘यह एक आजाद मुल्क है। लोगों को मूर्खतापूर्ण हरकतें करने की भी आजादी है।’ दुनिया को बदलना तकरीबन नामुमकिन है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हम कोशिशें करना बंद कर दें। शुरुआत करने के लिए कला की मुख्यधारा अच्छी कोशिश हो सकती है।

हम हरियाणा के अंदरूनी इलाकों में हैं। यह भारत का वह इलाका है, जहां से दुनिया के कुछ बेहतरीन ओलिंपिक मुक्केबाज निकले हैं। उनमें से एक इस नेक डॉक्टहर का शिष्ह है। डॉक्टर बॉक्सर के ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए पैसा देता है। बॉक्सर (राहुल सिंह) एक खुशमिजाज शख्स है। उसकी मुक्केबाजी का दस्ताना लट्ठ से बंधा रहता है और वह कुछ-कुछ ओलिंपिक मेडलिस्ट् विजेंदर सिंह जैसा दिखता है। अपने अनपढ़ होने के बारे में यह ठट्ठेबाज जाट कहता है : ‘बिन पढ़ा जाट पढ़े जैसा। पढ़ा-लिखा खुदा जैसा।’ मैंने इससे मिलता-जुलता एक मुहावरा सुना है, जिसमें कहा जाता है : ‘बिन पढ़ा जाट विद्वान, पढ़ा-लिखा जाट भगवान!’ जाहिर है, इस क्षेत्र में निरक्षरता का राज है और उसी से अंधविश्वाढस को भी बढ़ावा मिलता है। डॉक्टर भी शायद यही चाहेगा कि उसके बच्चे इस दुनिया से दूर रहें।

लेकिन चूंकि वह उन्हें अपने साथ लाया है, इसलिए उनके इर्द-गिर्द घटने वाली कहानियों से अप्रभावित रह पाना कठिन है। एक कहानी पहाडि़यों पर रहने वाली एक डायन के घर के बारे में है, जहां कोई नहीं जाता। वह एक रहस्यहपूर्ण जगह है। पिता अपने बच्चों को हिदायत देते हैं कि वे उसके आसपास भी न जाएं। बच्चे उनकी बात मानने से इनकार कर देते हैं। डॉक्टर की पत्नी की मौत हो चुकी है और वह अपनी मां की मदद से अपने दोनों बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा करता है। कहानी का यह हिस्सा हमें सीधे 1962 की हॉलीवुड क्लासिक फिल्म ‘टु किल अ मॉकिंगबर्ड’ की याद दिलाता है, लेकिन समानताओं का यहीं अंत भी हो जाता है।

इस फिल्म में कहानी की भूमिका यह है कि वह एक महत्वपूर्ण बिंदु को हमारे सामने स्पष्ट करे। यह जुगत कारगर साबित होती है। राष्ट्रीय पुरस्काकर जीतने वाली पंजाबी पृष्ठाभूमि की फिल्म ‘अन्हेक घोड़े दा दान’, जो जिंदगी की ही तरह धीमी और वास्तीविक है, कुछ हफ्तों पहले सिनेमाघरों में दिखाई गई थी। बहुत कम लोग उस फिल्म को देखने गए होंगे। लेकिन अनेक लोग शायद इस फिल्म को एक बार देखना चाहें, क्योंकि यह ‘पैरेलल’ सिनेमा नहीं है। फिल्म के कथानक में गानों और ह्यूमर जैसे तत्वों को जान-बूझकर गूंथा गया है। यदि थोड़ी-बहुत लाउड एक्टिंग और खराब कास्टिंग (खासतौर पर बच्चे्) और एकाध कमजोर कडि़यों (जैसे जरूरत से ज्यादा सूचनाएं देने वाला बैकग्राउंड स्कोर) को छोड़ दिया जाए तो दर्शकों का इस फिल्म से अच्छा मनोरंजन हुआ है। संदेश भी प्रभावी रूप से प्रसारित कर दिया गया है। एक अच्छी-खासी फिल्म से और भला क्या उम्मीदें की जाती हैं? इतना भर करना काफी है।



X
review of 'jalpari, the desert mermaid'
Click to listen..