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'दबंग 2':सिर्फ सलमान का दबदबा, दबंग का दही

पढ़िए आज रिलीज़ हुई सलमान खान और सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म 'दबंग 2' का रिव्यू।

Dainik Bhaskar

Dec 21, 2012, 02:20 PM IST
movie review: dabangg 2

उत्‍तरी मुंबई में कुर्ला के एक मॉल में दबंग 2 का प्रीमियर हुआ था। मैंने सबसे पहले वहीं इस फिल्‍म को देखने की कोशिश की थी। इस बात के चर्चे थे कि यहां सलमान आने वाले हैं। हर तरफ सलमान के प्रशंसकों का सैलाब उमड़ा पड़ा था, जिनमें नौजवानों की तादाद अधिक थी।

ये लोग एस्‍केलेटर पर खड़े चीख रहे थे, लॉबी में दौड़ लगा रहे थे, बैरिकेड्स की ओर गर्मजोशी से लपक रहे थे। मल्‍टीप्‍लेक्‍स में घुसने की कोशिश करना तो दूर, मैं इस सबसे तंग आकर बाहर से ही उल्‍टे पांव लौट आया। मुझे अपनी जान जो प्‍यारी थी।

दूसरी बार मैंने नाइन पीएम पर फर्स्‍ट डे फर्स्‍ट शो के रूप में यह फिल्‍म देखने की कोशिश की। थिएटर खचाखच भरा था। लोग डायलॉग सुनने से पहले ही हंस-हंसकर दोहरे हुए जा रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो वे पहले ही तय करके आए थे कि वे इस फिल्‍म पर फुल फिदा हो जाएंगे।

हम फिल्‍मों की समीक्षा कर सकते हैं, लेकिन लोगों के इस अंधे विश्‍वास की समीक्षा कैसे की जाए, क्‍योंकि आप पर कभी भी कुफ्र का इल्‍जाम लग सकता है।

इस तरह की घटनाओं के बारे में समीक्षकगण ज्‍यादा कुछ नहीं कर सकते। मैं उम्‍मीद करता हूं कि चेन्‍नई के समीक्षकगणों को हमारी इस हालत का कुछ-कुछ अंदाजा होगा, क्‍योंकि हमारे सुपर हीरो सलमान की तरह उनके पास भी तो रजनीकांत नामक एक महानायक है।

लिहाजा दबंग 2 में पुलिस इंस्‍पेक्‍टर चुलबुल पांडे कानपुर की गंदगी को साफ कर देने के मकसद से मौजूद हैं। वास्‍तव में पांडे जी वन मैन आर्मी हैं और लोगों को बड़ी सफाई से ठिकाने लगा देने के लिए उन्‍हें सरकार ने चुपचाप छूट-सी दे रखी है।

उनके बॉस यानी एसपी (मनोज पहवा) लगभग उनके नौकर की तरह है और वे अपने बारे में कहते हैं कि 17 साल की सर्विस में उन्‍होंने यह नहीं सीखा कि क्‍या करना है, बल्कि यह सीखा कि क्‍या नहीं करना है। पांडे जी लालगंज के देहाती इलाकों से यहां आए हैं और केवल से ही माफिया राजनेता बच्‍चा सिंह (प्रकाश राज) के कहर से कानपुर को बचा सकते हैं।

यकीनन ‘कुंगफू रॉबिनहुड पांडे’ एक अद्भुत पुलिस वाले हैं। जहां वे एक तरफ बड़ी ढिठाई से घूस लेते हैं, वहीं खराब व्‍यवहार करने वाले ट्रैफिक हवलदारों को गरियाने से भी नहीं चूकते। जब उनकी जीप एक दीवार को फोड़कर निकलती है तो पूरी पृथ्‍वी कांप उठती है। वे अपने दुश्‍मनों की गर्दनें मरोड़ देते हैं और उनकी हड्डी-पसलियां बराबर कर देते हैं। हवा में गोलियां उड़ती रहती हैं और हमारे सिर के ऊपर से निकल जाती हैं।

लेकिन दुख की बात है कि अब पांडेजी पहले की तरह रोमांस नहीं कर सकते, क्‍योंकि अब उनकी शादी हो गई है। उनकी बीवी रज्‍जो (सोनाक्षी सिन्‍हा) उनकी कमाई के पैसों से खरीदारी करती है, उनके लिए खाना पकाती है और उनका घर बुहारती है, क्‍योंकि पांडे जी को यही पसंद है।

वे एक विलेन चुन्‍नी को नसीहत देते हुए कहते हैं कि लड़कियों जैसे नाम के साथ वह यहां क्‍या कर रहा है, वह ‘जाये, घर बसाये, और बाप बनने का सुख दे’। लेकिन कृपया उन्‍हें गलत समझने की कोशिश न कीजिएगा। पांडे जी अपनी मासूम-सी बीवी को सचमुच प्‍यार करते हैं।

वे उससे कहते हैं, ‘तुम मेरी गुलाम नहीं हो, तुम चाहो तो मेरी डांट-डपट के जवाब में मुझे भी डांट-डपट सकती हो’। हमें यह सुनकर राहत मिलती है। पांडे जी की कमजोरी है उनका परिवार। उनके घर-संसार में पिता (विनोद खन्‍ना) और भाई (अरबाज) भी हैं। हम कल्‍पना कर सकते हैं कि पांडे जी तो बड़े बोरिंग इंसान होंगे, लेकिन ऐसी बात नहीं है। पिक्‍चर में अभी बहुत कुछ बाकी है दोस्‍तो।

फिल्‍म के चरित्रों के साथ ही उसके गाने भी दोहराव भरे मालूम होते हैं और फिल्‍म के एक्‍शन दृश्‍य वैसे ही हैं, जैसा कि इस तरह की फिल्‍मों से उम्‍मीद की जाती है। जैसा कि मैंने कहा, स्‍क्रीन पर जो चाहे दिखाएं, दर्शकों इसका कतई बुरा न मानेंगे।

पिछले कुछ समय में जिस तरह की फिल्‍में हिट हुई हैं, उनके मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि किसी फिल्‍म की कामयाबी के लिए तीन बातों की जरूरत है : सलमान, सलमान और सलमान। चूंकि इस फिल्‍म में सलमान हैं, इसलिए इसका चलना तो तय ही है। यह कतई कॉम्प्लिकेटेड मामला नहीं है।

सलमान स्‍क्रीन पर अवतरित होते हैं और उनके दर्शक थिएटरों में जुट जाते हैं। तीसरे दर्जे की ‘रेडी’ और ‘बॉडीगार्ड’ इसी तरह हिट हुई थीं। किसी को भी इन फिल्‍मों के निर्देशकों या सह कलाकारों के नाम तक याद नहीं हैं।

अभिनव कश्‍यप की दबंग (2010) बहुत बड़ी कमर्शियल सक्‍सेस होने के बावजूद इससे अलग फिल्‍म थी। उस फिल्‍म को सुपर सितारे के दीवाने दर्शकों के अलावा दूसरों ने भी पसंद किया था।

सलमान आम तौर पर अपनी फिल्‍मों में खुद को ही अभिनीत करते हैं, लेकिन उस फिल्‍म में उन्‍होंने कैरेक्‍टर में डूबकर काम किया था। फिल्‍म का एक खास परिवेश था और वह पूरी तरह मनोरंजक थी। आखिर इसीलिए तो उसका सीक्‍वेल बनाने की जरूरत महसूस की गई।

दो साल के भीतर उसी फिल्‍म को अक्षय कुमार (राउडी राठौर, खिलाड़ी 786) और अजय देवगन (सिंघम) दोहरा चुके हैं। कह सकते हैं कि अक्षय और अजय की इन फिल्‍मों से तो 'दबंग 2' फिर भी बेहतर है, लेकिन दबंग से उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती।

कहा जा रहा था कि 21 दिसंबर को दुनिया का अंत हो जाएगा। यदि वास्‍तव में ऐसा हो गया होता और आप उस समय यह फिल्‍म देख रहे होते तो आप अपने आपको एक कमअक्‍ल-कमजर्फ की तरह महसूस करते, जो पृथ्‍वी के अंतिम दिन इस तरह का कूड़ा-करकट अपने दिमाग में भरकर अपनी बुद्धिमत्‍ता का अपमान कर रहा है। लेकिन यदि यह कोई सामान्‍य दिन होता तो आप कुछ खास महसूस नहीं करते।

थिएटर में आप सल्‍लू के भक्‍तों से घिरे होते, जो वास्‍तव में इस बात में विश्‍वास करते हैं कि यदि प्रलय हुई भी तो उनका सुपर हीरो उन्‍हें बचा लेगा। दुनिया की तमाम आस्‍थाओं की तरह इसे भी समझ पाना मुश्किल है।

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