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'इंकार': शहरी अपर क्लास लव सेक्स और धोखा

यह फिल्‍म यौन प्रताड़ना के बारे में नहीं है। या कम से कम उस तरह नहीं है, जैसे डिस्‍क्‍लोजर (1994) जैसी फिल्‍म या उसकी बॉलीवुडीय नकल ऐतराज (2004), या ऐसी ही फिल्‍में थीं।

Dainik Bhaskar

Jan 18, 2013, 05:41 PM IST
movie review: inkaar

यह फिल्‍म यौन प्रताड़ना के बारे में नहीं है। या कम से कम उस तरह नहीं है, जैसे डिस्‍क्‍लोजर (1994) जैसी फिल्‍म या उसकी बॉलीवुडीय नकल ऐतराज (2004) या ऐसी ही फिल्‍में थीं।

वास्‍तव में यह एक वर्कप्‍लेस की मनोवै‍ज्ञानिक पड़ताल है। यह फिल्‍म कमाल के ब्‍योरेवार पैनेपन के साथ लोगों के एक समूह, उनके कार्य-व्‍यवहार और उनकी विचार प्रणाली का जायजा लेती है।

यह किसी भी कॉरपोरेट सेटअप की सच्‍चाई हो सकती है। यदि आपने किसी भारतीय शहरी ऑफिस में चंद मिनटों के लिए भी काम किया है तो आप इन चरित्रों को फौरन पहचान जाएंगे।

एक बदमिजाज सुपर-बॉस (कंपनी का अमेरिकी हेड) के अलावा यहां एक चतुरसुजान अंकलजी नुमा कर्मचारी (विपिन शर्मा ने इस भूमिका में कमाल किया है) भी है। वह एक ही पद पर सालों से बना हुआ है और उसे लगता है कि वही सबसे अधिक समझदार है।

निचले स्‍तर के कर्मचारियों में ईर्ष्‍या और स्‍पर्धा के भाव से भरे लोग हैं, जिन्‍हें पूरा भरोसा है कि उनकी नाकामी के लिए किसी और की गैरवाजिब कामयाबी जवाबदेह है। फिल्‍म में एक अत्‍याचारी फीमेल बॉस भी है, जिसे ‘अल्‍फा वुमैन’ कहकर संबोधित किया जाता है।

वह दबावों को बर्दाश्‍त नहीं कर सकती और शीर्ष पर पहुंचने के लिए घटिया हथकंडे आजमाने से भी उसे कोई गुरेज नहीं है। कभी वह अति महत्‍वाकांक्षी हुआ करती थी और वास्‍तव में अब भी है। उसे इस संस्‍थान में एक समांतर सत्‍ता केंद्र रचने के लिए बुलाया गया था।

जब अच्‍छे-खासे लोगों को अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करना पड़ता है, तो वे यही सब करते हैं। कुछ लोगों द्वारा जिस स्‍तर की इंटर-केबिन राजनीति की जाती है, उसे देखकर आपको हैरत हो सकती है कि क्‍या वे इसके अलावा कोई और काम भी करते होंगे। हकीकत यही है कि वे इसके अलावा और कोई काम नहीं करते।

यह गलाकाट प्रतिस्‍पर्धा का नतीजा है। ऐसे में हर व्‍यक्ति का सबसे बड़ा जॉब यह बन जाता है कि वह अपने जॉब को बनाए रखे और उसे न्‍यायोचित साबित करता रहे। इसीलिए राजनीति युद्ध की कला होती है।

यह सेंट्रल मुंबई है। हम अपने आपको विज्ञापन उद्योग के अधबीच में पाते हैं, जो देश को उत्‍पादों के साथ ही सपने भी बेचता है। बोर्डरूम टेबल पर हेड के रूप में इस एजेंसी की महिला क्रिएटिव हेड और पुरुष सीईओ बैठे हैं।

क्रिएटिव हेड ने सीईओ के खिलाफ यौन प्रताड़ना का मामला दर्ज कराया है। उनके इर्द-गिर्द बैठे लोगों में चंद चश्‍मदीद गवाह और एक जज भी है। फिल्‍म फ्लैशबैक में चलती है। जैसे-जैसे कहानी आगे-पीछे होती रहती है, हमें उसकी और तफसीलें पता चलती रहती हैं।

यह बहुत हद तक ऑस्‍कर विजेता फिल्‍म सोशल नेटवर्क (2010) की तरह है। घटना एक ही है, लेकिन लोगों के अलग-अलग नजरियों के कारण वह अलग-अलग दिखाई देती है। इसे रशोमोन इफेक्‍ट कहते हैं। इस इफेक्‍ट का यह नाम कुरोसावा की फिल्‍म के आधार पर पड़ा है।

स्‍क्रीन पर एक किस्‍म का धूपछांहीपन है। फिल्‍म को छोटे दृश्‍यों और तेज कट्स के मार्फत बुना गया है। अमेरिकन टीवी ड्रामा देखने वालों को यह तकनीक फौरन लुभा सकती है। क्रिएटिव हेड की भूमिका चित्रांगदा सिंह (वे इस फिल्‍म में बेहद सेंसुअस और मनमोहक लगी हैं) ने निभाई है।

चित्रांगदा ने अपने अभिनय कॅरियर का आगाज सुधीर मिश्रा की मास्‍टरपीस 'हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी' से किया था। लेकिन यह शायद मिश्रा की पहली फिल्‍म है, जो पूरी तरह से शहरी भारत के उच्‍च-मध्‍यवर्ग की पृष्‍ठभूमि पर आधारित है। इस तरह की फिल्‍मों के साथ एक दिक्‍कत यह होती है कि उनकी प्रामाणिकता पूरी तरह से उनके संवादों पर निर्भर करती है। इस तरह के सर्कल में अमूमन अंग्रेजी बोली जाती है।

सुधीर मिश्रा ने इस फिल्‍म में अंग्रेजी गालियों से परहेज किया है, लेकिन इसके किरदारों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी अजीब नहीं लगती। सीईओ की भूमिका अर्जुन रामपाल ने निभाई है। आज से कुछ साल पहले तक कोई कल्‍पना भी नहीं कर सकता था कि अर्जुन रामपाल इतना बेहतरीन अभिनय कर सकते हैं।

पूरी फिल्‍म उनके और चित्रांगदा के इर्द-गिर्द घूमती है। ऑफिस पॉलिटिक्‍स की कोई भी कहानी दशकों पूर्व भी ऐसी ही होती, फर्क यह है कि अब उसकी गतिशीलता बदल गई है। भारत की मौजूदा पीढ़ी पहली ऐसी पीढ़ी है, जो अपने वर्कप्‍लेस में महिलाओं की इतनी बड़ी सहभागिता देखती है।

जाहिर है कि इससे स्‍त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताएं और बढ़ी हैं। जल्‍द ही ऐसा समय आ सकता है, जब पुरुषों का आकलन महिलाओं की सफलता के परिप्रेक्ष्‍य में होगा। शहरी भारतीय पुरुषों या महिलाओं के लिए भी, यह एक नई चुनौती है।

अमेरिका में इस तरह के किस्‍से आम हैं, जहां चमकदार कॅरियर एक झटके में चौपट हो जाते हैं। इस फिल्‍म में रामपाल कहते हैं कि विज्ञापन जैसे रचनात्‍मक उद्योग में लैंगिक सीमारेखाओं का धुंधलाना लगभग तय है। ऐसे उद्योगों में स्‍त्री-पुरुष भावनात्‍मक और रचनात्‍मक विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।

उनके बीच एक बौद्धिक कंफर्ट लेवल होता है। यह रिश्‍ता बड़ी आसानी से शारीरिक भी बन सकता है। निश्चित ही इस फिल्‍म में रामपाल का चरित्रहीनता का शिकार है। यदि उसके सामने क्रिएटिव हेड के रूप में कोई पुरुष होता तो वह इतना असुरक्षित न होता।

क्रिएटिव हेड भी अच्‍छी तरह जानती है कि वह आकर्षक है और पुरुषों पर उसका क्‍या असर पड़ता है। वर्कप्‍लेस पर प्‍यार कर बैठना बहुत बुरा साबित हो सकता है, क्‍योंकि दफ्तर का ठंडापन कभी भी प्‍यार की ऊष्‍मा से भरपूर नहीं हो सकता।

यह फिल्‍म कुछ अवसरों पर विचारोत्‍तेजक, चुस्‍त और मजेदार भी है, लेकिन मूल रूप से यह महत्‍वाकांक्षाओं के बारे में है। जहां तक यौन प्रताड़ना का सवाल है तो मैं इस फिल्‍म में वुमेन राइट्स एक्टिविस्‍ट की भूमिका निभा रही दीप्ति नवल से सहमत होऊंगा।

वे कहती हैं : ‘अगर फ्लर्टिंग लड़की को पसंद न हो तो वह हैरेसमेंट बन जाती है।‘ यदि मैं आपकी जगह होता, तो निश्चित ही इस फिल्‍म को देखने का मौका नहीं गंवाता!

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