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मूवी रिव्यूः लाइफ की तो लग गई

के के मेनन और सिंगर से एक्ट्रेस बनी नेहा भसीन की एक्टिंग देखने के लिए इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए।

Dainik Bhaskar

Apr 27, 2012, 12:45 AM IST

'लाइफ की तो लग गई' फिल्म की कहानी में इतने प्लॉट्स हैं कि जिससे इस फिल्म की भी सच में 'लग गई' है। चार प्लाट्स की कहानी को एक स्क्रीनप्ले में ना तो लेखक ठीक से लिख पाए और ना ही डायरेक्टर इसे पर्दे पर रच पाए।



यही कारण है कि बढ़िया डायलॉग; के के मेनन, रणवीर शौरी, प्रद्युम्न सिंह और नेहा भसीन जैसे प्रतिभाशाली एक्टरों और बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी के बावजूद इसके प्रभावशाली फिल्म बनने में कसर रह गई।





'लाइफ की तो लग गई' मुंबई में रह रहे चार लोगों की कहानी है, जिनकी लाइफ की अलग-अलग कारणों से 'लगी हुई' है। सलमान(के के मेनन) अपने मां-बाप के हत्यारों से बदला लेना चाहते हैं। एसीपी चौटाला(मनु ऋषि) एक महत्वाकांक्षी पुलिस ऑफिसर हैं जो सीनियर्स के सामने अपने आपको प्रूव करना चाहते हैं। अमोल गांगुली( रणवीर शौरी) बंगाली हैं, जिनका दिल टूट चुका है और वह सुसाइड करने के कगार पर हैं। डॉली( नेहा भसीन) चंडीगढ़ से मुंबई एक्ट्रेस बनने के लिए आई हुई हैं और यहां लोगों को चीट करके सर्वाइव कर रही हैं।




इन चार प्लॉट्स की कहानियों के कैरेक्टर कैसे एक-दूसरे से मिलते और जुड़ते हैं, यही 'लाइफ की तो लग गई' की कहानी है। यह फिल्म चार कहानियों को मिलाकर एक कहानी कहती है।





स्टोरी ट्रीटमेंटः- फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी स्क्रीनप्ले है। इसमें चार कहानी को एक कहानी में लेखक ठीक से पिरो नहीं पाए। इसलिए, सिचुएशन्स भी इस फिल्म में अजीबोगरीब हैं और क्लाइमेक्स भी संतोषजनक नहीं है। फिल्म की शुरूआत अच्छी है लेकिन बाद में यह बोरिंग होने लगती है।




स्टार कास्टःके के मेनन शानदार एक्टर माने जाते हैं और यहां भी उनकी एक्टिंग उसी लेवल की है। रणवीर शौरी अपने बंगाली अवतार में काफी असहज नजर आए हैं। प्रद्युम्न सिंह ने बेहतर एक्टिंग की है लेकिन उन पर फिल्माए गए सिचुएशंस इतने अतार्किक हैं कि वह प्रभावहीन लगने लगते हैं।




मनु ऋषि ने अच्छी एक्टिंग की है और वह दर्शकों को हंसाने में कामयाब रहे हैं। नेहा भसीन की तारीफ करनी होगी क्योंकि सिंगर से एक्ट्रेस बनी नेहा ने अपनी पहली ही फिल्म में गजब की एक्टिंग की है। शरत सक्सेना ने अपनी भूमिका बेहतर निभाई है।




डायरेक्शनः- राकेश मेहता इस कमजोर स्क्रीनप्ले को ठीक से डायरेक्ट नहीं कर पाए हैं। डायलॉग लेखक के रूप में उनको कुछ प्वाइंट्स दिए जा सकते हैं क्योंकि एसीपी चौटाला के सिक्वेंसेस के डायलॉग अच्छे बन पड़े हैं। एक प्लॉट से दूसरे प्लॉट तक घूमते-घूमते फिल्म थकाऊ हो जाती है।




म्यूजिक/डायलॉग/सिनेमेटोग्राफी-फिल्म का संगीत पक्ष कमजोर है। अच्छी सिनेमेटोग्राफी और डायलॉग इस फिल्म की जान हैं।




क्यूं देखें-के के मेनन और सिंगर से एक्ट्रेस बनी नेहा भसीन की एक्टिंग देखने के लिए इस फिल्म को जरूर देखना चाहिए। फिल्म के डायलॉग भी मजेदार हैं और सिनेमेटोग्राफी बहुत सुंदर है। फिल्म के ये दो मजबूत पक्ष इसे देखने लायक बनाते हैं।


उभरते नए प्रतिभाशाली एक्टरों को देखने के शौकीन लोग इस फिल्म को देख सकते हैं।









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