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REVIEW :'लाइफ आफ पाइ'

यह एक ऐसी कहानी है, जो हमें दांतों तले अंगुलियां चबाने को मजबूर कर सकती है।

Dainik Bhaskar

Nov 23, 2012, 05:12 PM IST
movie review; life of pi

यह एक ऐसी कहानी है, जो हमें दांतों तले अंगुलियां दबाने को मजबूर कर सकती है। इस कहानी को परदे पर विश्वसनीयता से प्रस्तुत करना तो दूर, उसकी कल्पना करना भी कठिन है। यह एक भारतीय लड़के पिसिन की कहानी है, जिसे पाई कहा जाता है। फ्रेंच भाषा में स्विमिंग पूल को पिसिन कहते हैं।

यह लड़का कनाडा जा रहा है, लेकिन वह जिस जहाज से जा रहा है, वह डूब जाता है। वह अपने परिवार को गंवा देता है, लेकिन लाइफबोट पर होने के कारण उसकी जान बच जाती है। उसकी लाइफबोट पर उसके साथ एक ओरांगउटान, लकड़बग्घा, जेब्रा और बाघ भी है, जो पोंडिचेरी स्थित उसके पिता के चिड़ियाघर के सदस्य थे।

अंत में केवल बाघ और पाई ही सुरक्षित बच पाते हैं। दोनों एक-दूसरे से दोस्ती करने की कोशिश करते हैं। यह कहानी लेखिका यान मार्तेल के दिमाग की उपज है। कम से कम पांच बडे प्रकाशक उनकी इस कहानी की पांडुलिपि को ठुकरा चुके थे। लेकिन 2001 में प्रकाशित होने के बाद यह किताब पूरी दुनिया में बेस्टसेलर साबित हुई।


आमतौर पर माना जाता है कि साहित्यिक कृतियों पर बनने वाली फिल्में मूल कथाकृति से कमतर साबित होती हैं। लेकिन यान मार्तेल की किताब के प्रशंसक पाएंगे कि निर्देशक एंग ली ने इस कहानी को गजब की सिनेमाई कलात्मकता के साथ फिल्माया है।

कोई भी कल्पना नहीं कर सकता था कि इस किताब को फिल्माया भी जा सकता था और वह भी इतने अदभुत ढंग से। यह क्राउचिंग टाइगर हिडन ड्रैगन, ब्रोकबैक माउंटेन, टेकिंग वुडस्टाक जैसी फिल्मों के निर्देशक एंग ली के ही बूते की बात थी।
मनुष्य और पशु की दोस्ती की कहानी यदि टार्जन और मोगली जितनी पुरानी है तो लायन किंग जैसी डिज्नी कथाओं जितनी नई भी है।

इस तरह की कहानियों में जानवरों को बहुत भला और प्यारा दिखाया जाता है और बच्चे उन्हें पसंद करते हैं, लेकिन आमतौर पर जंगल की जिंदगी की उन क्रूरताओं को प्रदर्शित नहीं किया जाता, जिनमें सबसे ताकतवर ही अपना अस्तित्व सुरक्षित रख पाते हैं।

सभ्यता की अनेक सदियां बीतने के बावजूद जंगल के नियम नहीं बदले जा सकते। आज भी नेशनल ज्योग्रैफिक के कवर पर या एनिमल प्लेनेट चैनल में किसी बाघ को देखकर हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह एक वास्तविक डर है।

एंग ली पहले तो हमारे अहसासों को सहलाते हैं। जब थ्री-डी इमेज में रिचर्ड पार्कर नामक बाघ हम पर हमला बोलता है तो हम अपनी सीट से उछल पडते हैं। इन मायनों में यह पूरी तरह से बच्चों की फिल्म नहीं है। हो भी नहीं सकती। यह बहुत गहरी सोच के साथ बनाई गई फिल्म है, जिसकी कहानी को फंतासी के रोमांचक ताने-बाने में बुन दिया गया है।


जब हम भयानक तूफान के बाद उस जहाज को डूबते देखते हैं, तब भी हमारे पास उस असहाय लड़के के लिए दुख मनाने का मौका नहीं होता, जिसने अभी-अभी अपने पूरे परिवार को गंवा दिया है। हम तो क्या, वह लड़का भी अपनी बदनसीबी के लिए दुख नहीं मना सकता, क्योंकि उसके ऐन सामने एक खूंखार जानवर बैठा हुआ है, जो उसे चौकन्ना बनाए हुए है। लेकिन इसके बाद वह खूंखार जानवर ही उसकी जिंदगी का मकसद बन जाता है।

पाई की जिंदगी कुछ ऐसी ही है। सूरज शर्मा ने इस फिल्म में पाई की भूमिका निभाई है। इससे पहले उन्होंने किसी फिल्म में काम नहीं किया था। इरफान खान ने पाई की परिपक्व अवस्था की भूमिका निभाई है, जो राइटर्स ब्लाक से जूझ रहे एक लेखक को यह कहानी सुनाता है।

फिलहाल इरफान ही इकलौते ऐसे भारतीय कलाकार हैं, जो हालीवुड की फिल्मों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभा रहे हैं। इस फिल्म में भी उन्हें स्क्रीन पर अच्छी जगह दी गई है। लेकिन बिना किसी शक के इस फिल्म का वास्तविक नायक कंप्यूटर द्वारा उत्पन्न की गई वह इमेज है, जो इतनी वास्तविक नजर आती है कि हम एक पल को भी शक नहीं करते कि हमारे होश गुम कर देने वाला रिचर्ड पार्कर नामक बाघ वास्तव में एक थ्री-डी पोर्टरेट है।


अनेक सिनेप्रेमी ऐसे हैं, जो थ्री-डी फिल्में देखना पसंद नहीं करते। मैं भी अपवाद नहीं हूं। इसकी सबसे बडी वजह तो यही है कि एक समीक्षक होने के नाते आंखों पर मोटे लेंस का थ्री-डी चश्मा चढ़ाने के बाद मैं नोट्स नहीं ले सकता। लेकिन इस तरह की फिल्मों के साथ ऐसी कोई दिक्कत पेश नहीं आती, क्योंकि उसका एक-एक दृश्य हमारी याददाश्त पर अंकित होता चला जाता है। अनेक निर्देशक थ्री-डी फिल्मों का उपयोग गिमिक्स के रूप में करते हैं, लेकिन यह मेरे द्वारा अब तक देखी गई सर्वश्रेष्ठ थ्री-डी फिल्म है।

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