रिव्यूज़

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फिल्म रिव्यू: मैक्सिमम

शहर है मुंबई। फिल्म में सभी लोग डांस बारों में पार्टियां मनाते हैं।

Dainik Bhaskar

Jun 29, 2012, 08:49 PM IST

कैमरा निरंतर क्लोज-अप में है। आप अभिनेता विनय पाठक की ठोढ़ी के नीचे एक तिल भी देख सकते हैं। पाठक एक राजनेता की भूमिका निभा रहे हैं, जो पुलिस और पत्रकारों के गठजोड़ की अगुवाई करता है। पत्रकार पुलिस का ‘मुंशी’ है। पुलिसवाले अंडरवर्ल्ड से भी अधिक कुख्यात हैं और शहर के निर्माण उद्योग के लिए ब्रोकर्स की भूमिका निभाते हैं। यहां कम से कम दो हीरो या टॉप एनकाउंटर विशेषज्ञ सबसे बड़े ‘भाई’ हैं : सोनू सूद और नसीरुद्दीन शाह ने ये घिसी-पिटी उबाऊ भूमिकाएं निभाई हैं। वे शहर की पुलिस फोर्स में प्रतिद्वंद्वी धड़ों के भाड़े के टट्टू हैं और एक-दूसरे के मुखबिरों को ठिकाने लगाते रहते हैं।




शहर है मुंबई। फिल्म में सभी लोग डांस बारों में पार्टियां मनाते हैं, जबकि इन बारों पर 2005 में ही ताले लग चुके हैं। शहर की मुख्य सड़कों पर गोलीबारी होना आम बात है। पुलिसवाले जींस में रिवॉल्वर्स फंसाकर घूमते हैं। बॉलीवुड की तारिकाएं टॉप कॉप (सूद) पर लट्टू हैं, जो कि अपने आपमें एक सेलेब्रिटी है। ये किरदार शायद दया नायक, विजय सालस्कर, प्रदीप शर्मा जैसे पुलिसकर्मियों पर आधारित हैं.. सालों पहले वे टैब्लॉइड खबरों की सुर्खियों में छाए रहते थे। उन्होंने कथित रूप से जितने एनकाउंटर किए हैं, उससे अधिक फिल्में तो उनके जीवन पर बन चुकी हैं।





शीमित अमीन की ‘अब तक छप्पन’ (2004) इनमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म थी। यह फिल्म रामगोपाल वर्मा की ‘सत्या’ (1998) होने की कोशिश करती है। ‘सत्या’ मास्टरपीस थी और उसे दोहराया नहीं जा सकता। अब उस बारे में कुछ नया कहने को तकरीबन कुछ नहीं बचा है। देखिए, खुद रामगोपाल वर्मा ही इस विधा को कहां तक पहुंचा सके हैं। इस विषय की आखिरी बूंद तक निचोड़ी जा चुकी है और अब यह अप्रासंगिक-सा लगता है। और इसीलिए यह फिल्म भी अप्रासंगिक और घिसी-पिटी लगती है। जाहिर ही है।




(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे www.dainikbhaskar.com से जुड़े हैं)


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