रिव्यूज़

--Advertisement--

'तेरी-मेरी कहानी': टेढ़ी-मेढ़ी कहानी

फिल्म रिव्यू: पढ़िए दैनिकभास्करडॉटकॉम से जुड़े जाने-माने फिल्म समीक्षक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया रिव्यू।

Dainik Bhaskar

Jun 22, 2012, 08:10 PM IST

टेढ़ी-मेढ़ी कहानी

जब आपके पास सुनाने को एक भी कहानी न हो, तो मेरा ख्याल है कि आप तीन कहानियां भी सुना सकते हैं और दो सुपर सितारों की कीमत पर एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा तीन रूमानी फिल्में बना सकते हैं। तो लीजिए, यहां दो पीरियड फिल्में हैं और शहरी युवाओं को लुभाने के लिए एक बबलगमनुमा हिस्सा भी है। लेकिन दर्शकों को इस सबके लिए केवल एक ही टिकट का पैसा चुकाना होगा।





फिल्म की अलग-अलग सेटिंग्स के कारण साउंडट्रैक में कव्वाली के साथ ही डिस्कोथेक सॉन्ग की भी गुंजाइश हो सकती है। कहिए, कैसा बिजनेस प्रपोजल है? यकीनन,इस बात के मद्देनजर बहुत खूब कि किसी ने यहां करोड़ों रुपए लगाए हैं। आप समझ सकते हैं कि फिल्म के लीड एक्टर्स अपनी-अपनी भूमिकाओं से क्यों संतुष्ट होंगे।





भारत के दो सबसे चमकीले युवा सितारों को अपना हुनर दिखाने का शायद इससे अच्छा मौका नहीं मिल सकता था। लगता है जैसे शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा दोनों ही यहां अपनी भविष्य की भूमिकाओं की तैयारी कर रहे हों। उन्होंने बढ़िया काम किया है। शाहिद ने 1960 की बंबई के एक शर्मीले संगीतकार, 2012 के इंग्लैंड के पढ़ाकू कॉलेज ब्वॉय और 1910 के पंजाब के एक देहाती दिलफेंक की भूमिकाएं निभाई हैं। प्रियंका ने इन्हीं कालखंडों में एक मूवी स्टार, एक चुलबुली कॉलेज किड और एक स्वतंत्रता सेनानी की बेटी की भूमिकाएं निभाई हैं।





ज़ाहिर है, यहां कॉस्टयूम डिजाइनर अपनी कल्पना को उड़ान दे सकते थे।लेकिन आखिर फिल्म कहना क्या चाहती है? अच्छा सवाल है। हीरो एक मूवी स्टार से प्यार नहीं कर सकता, क्योंकि उसकी सबसे अच्छी सहेली भी उस पर फिदा है। तो? कॉलेज किड्स की कहानी में यह रोड़ा है कि लड़का किसी और लड़की से प्यार करता था, लेकिन अब उनमें ब्रेकअप हो गया है। तो फिर आखिर प्रॉब्लम क्या है? स्वतंत्रता सेनानी की बेटी हीरो से इसलिए शादी नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पिता शादी की इजाजत नहीं देंगे। शायद इसलिए, क्योंकि लड़का मुस्लिम और लड़की सिख है। लेकिन फिल्म कभी इसका जिक्र नहीं करती। जब मुसीबतें इतनी लचर और बेतुकी हों तो कहानी से भला कितनी उम्मीद की जा सकती हैं। लेकिन फिर भी आप जानते हैं कि आखिर यह फिल्म थिएटर में क्यों दिखाई जा रही है।





फिल्म ट्रेड आंकड़ों के पंडित अक्सर ‘सिंगल स्क्रीन’ बनाम ‘मल्टीप्लेक्स’ या ‘स्मॉल टाउन’ बनाम ‘मेट्रो’ सरीखे श्रेणीकरण करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि फिल्म दर्शकों के बीच सबसे बुनियादी विभाजन है लड़कों और लड़कियों की अभिरुचि का भेद। इस शुक्रवार रिलीज हुई फिल्मों के मार्फत आप इसकी पड़ताल कर सकते हैं।





लड़कों ने शायद ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ को देखना पसंद किया होगा। लेकिन इस फिल्म में, मैं थिएटर में युवा लड़कियों से घिरा हुआ था। मैं बार-बार पीछे देखकर यह जानने की कोशिश कर रहा था कि आखिर वे किस बात पर खिलखिला रही हैं। उन्हें देखकर तो यही लगता था कि वे एंजॉय कर रही हैं। लेकिन ऊब के मारे मेरी आंखेंमुंद जाती हैं। बहुत बुरी बात है। क्योंकि मुझे टिकट के पैसे भी वापस नहीं मिलने वाले।





(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे www.dainikbhaskar.com से जुड़े हैं)



X
Click to listen..