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मूवी रिव्यूः विल यू मैरी मी?

अच्छी स्क्रिप्ट के साथ युवाओ को टारगेट कर बनाई गई कमजोर फिल्म।

Dainik Bhaskar

Mar 01, 2012, 05:28 PM IST

फिल्म आमिर, शैतान और साउंडट्रैक जैसी बेहद उम्दा फिल्मों में काम कर चुके राजीव खंडेलवाल की एक्टिंग से सजी यह फिल्म निश्चय ही अच्छी स्क्रिप्ट के कारण देखी जा सकती थी लेकिन कई एक्टरों के कमजोर प्रदर्शन व डायरेक्शन के कारण इसे देखने के पहले एक बार सोचना होगा। युवाओं को ध्यान में रखकर बनाई गई इस फिल्म में काफी मसाला डालने की कोशिश की गई लेकिन ज्यादा मसाला आपके मुंह का स्वाद बिगाड़ देता है वैसे ही इस फिल्म के साथ भी हुआ।

फिल्म विल यू मैरी मी? की कहानी तीन दोस्तों राजवीर(राजीव), आरव(श्रेयस) और निखिल(मुजम्मिल) के इर्द-गिर्द घूमती है। इनकी जिंदगी में ट्विस्ट तब आता है जब एक लड़की आरव को उसके कैसेनोवा वाली इमेज के कारण अलग हो जाती है। इसके साथ ही राजवीर की किसी के भी पैसे को खर्च कर देने के कारण वे मुसीबतों में फंस जाते हैं। इन सबके कारण निखिल की शादी भी दांव पर लग जाती है। मामला तब और पेचीदा हो जाता है जब आरव और राजवीर एक ही लड़की स्नेहा(मुग्धा) से प्यार करने लगते हैं। निखिल क्या अपनी च्रीम गर्ल से शादी कर पाता है और स्नेहा का दिल कौन जीतता है, यही फिल्म की बाकी कहानी है।

स्टार कास्टः राजीव के लिए यह बोलना ही बेमानी होगा कि उन्होंने फिल्म के लिए अपना 100 प्रतिशत दिया है लेकिन कुछेक मौकों पर उनकी ओवर एक्टिंग खलती है और उनके जैसे सीनियर एक्टर से इसकी अपेक्षा नहीं की जाती है। यही बात फिल्म के अन्य कलाकार श्रेयस तलपड़े के लिए भी कही जा सकती है जिन्होंने अपनी एक्टिंग में सुघार तो दिखाया है लेकिन मुग्धा के सामने एक कूल डूड दिखने के चक्कर में वे ओवर एक्टिंग के शिकार हो गए। वैसे सबसे चौंकाने वाला प्रदर्शन किया मुजम्मिल इब्राहिम ने जिन्होंने फिल्म धोखा से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। मनोज जोशी ने एक एलीट पिता के तौर पर निश्चित रूप से निराश किया है। उनसे किसी को इस तरह की आशा नहीं रही होगी। परेश रावल ने छोटा लेकिन बहुत ही महत्वपूर्ण रोल किया है। सेलिना जेटली एक फिलर ही नजर आती हैं। मुग्धा का रोल क्या था यह बात शायद डायरेक्टर साहब भी नहीं समझ पाए।

डायरेक्टरः आदित्य दत्त ने एक अच्छी स्क्रिप्ट को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया। सबसे बड़ी बात यह कि फिल्म का टाइटल विल यू मैरी मी क्यों रखा गया, यह बात समझ में नहीं आई क्योंकि पूरी फिल्म कभी भी इस टाइटल के साथ न्याय करती नहीं दिखी। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने कई सीन में अपनी पकड़ भी दिखाई है लेकिन कुछ अच्छे सीन के लिए दर्शक अपने पैसे बर्बाद नहीं कर सकते।



म्यूजिक/सिनेमैटोग्राफी/डायलॉग्स/एडिटिंग: फिल्म का संगीत दिल को सुकून देने वाला है लेकिन कहानी के फ्लो को तोड़ देती है। डायलॉग्स कुछ कास नहीं हैं जिन्हें याद रखा जाए। सिनेमैटोग्राफी को पूरे नंबर दिए जा सकते हैं। एडिटिंग टेबल पर ज्यादा मेहनत की जाती तो फिल्म अच्छी बन सकती थी।



क्यों देखें : राजीव खंडेलवाल के फैन होने के बावजूद आप इस फिल्म को ना देखें तो बेहतर होगा।






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