--Advertisement--

MOVIE REVIEW: 'जिला गाजियाबाद': हिम्‍मत है तो झेलें इस जिला को

फिल्‍म के शुरुआती दृश्‍य में ही एक दाढ़ी वाला कद्दावर शख्‍स हवा में उड़ता नजरआता है। वह अपने जूतों की ठोकर से ही बदमाशों के एक जत्‍थे को ठिकाने लगादेता है।

Dainik Bhaskar

Feb 23, 2013, 09:45 AM IST
movie review: zila ghaziabad

फिल्‍म के शुरुआती दृश्‍य में ही एक दाढ़ी वाला कद्दावर शख्‍स हवा में उड़ता नजर आता है। वह अपने जूतों की ठोकर से ही बदमाशों के एक जत्‍थे को ठिकाने लगा देता है।

इसके बाद वह महज अपनी बाजुओं को घुमाता है तो कुछ और गुंडे धराशायी हो जाते हैं। उसे उन्‍हें छूने की भी जहमत नहीं उठाना पड़ती। यह खूंखार विलेन है अरशद वारसी यानी मुन्‍नाभाई का सर्किट।

शायद उन्‍होंने यह भूमिका इसलिए निभाई होगी, क्‍योंकि वे 44 साल की उम्र में एक एक्‍शन हीरो के रूप में अपने अवसरों को आज़माना चाहते होंगे। लेकिन वे इस फिल्‍म में केवल दांत पीसते, यहां-वहां कूदते-फांदते, गोलियां दागते ही नजर आते हैं, जो यूं भी शुरुआत करने के लिए बुरा नहीं है।

उनकी टक्‍कर जिस हीरो से है, वह भी लगातार दांत पीसता रहता है। वह भी धांय-धांय करता हुआ इधर-उधर उछलकूद करता रहता है। ये महाशय हैं विवेक ओबेरॉय। यह फिल्‍म देखते समय मैं पूरे समय अपनी सीट से चिपका रहा।

इस दौरान मैंने कम से कम तीन आइटम नंबर झेले, दबंग से उठाए गए कुछ और गानों को भी बर्दाश्‍त किया, साथ ही रवि किशन, परेश रावल, चंद्रचूड़ सिंह, आशुतोष राणा सहित चार दर्जन क्रॉस-फायर के दृश्‍यों और तकरीबन 200 मौतों को भी जैसे-तैसे सहा।

और यह सारी कवायद केवल यह समझने भर के लिए कि आखिर सब लोग एक-दूसरे पर गोलियां क्‍यों दाग रहे हैं। सच कहूं तो मुझे अब भी नहीं पता।

मुझे बस इतना ही याद आता है कि फिल्‍म की शुरुआत में किसी किस्‍म का संपत्ति विवाद था, लेकिन मैं श्‍योर नहीं हूं। तब तो कहा जा सकता है कि इस फिल्‍म के साथ जो कुछ गलत हुआ है, उसकी शुरुआत यह फिल्‍म बनने से पहले ही हो गई होगी।

हमें केवल इतना ही जानने की जरूरत है कि गाजियाबाद नामक एक जिला है, जहां हर कोई हर किसी को जब चाहे मार सकता है। जहां पुलिसवाले नंग-धड़ंग सड़कों पर परेड करते हैं। केवल एक ही शख्‍स है, जो कानून की सरहदों से परे इस नर्क को बचा सकता है। वह ठाकुर प्रताप सिंह नामक एक पुलिस वाला है।

यह थानेदार नौजवानों के लंबे बाल काट डालता है, जो संजय दत्‍त की फिल्‍म खलनायक के नायक की तरह दिखाई देते हैं।

प्रताप सिंह फिल्‍म 'थानेदार' के गीत 'तम्‍मा तम्‍मा लोगे' का दीवाना है और यह गाना उसके थाने पर बजता रहता है। लेकिन वह कहता है कि यदि उसे कहीं संजय दत्‍त मिल जाए तो वह उसके भी बाल काट डालेगा।

यह 52 साल का यह मसखरा भी हवा में उड़ता रहता है, गुंडों को ठिकाने लगाता रहता है, अपनी कमीज के चार बटन खोलकर अपनी छाती दिखाता है।

शायद यह कैरेक्‍टर फिल्‍म में कॉमेडी करने के लिए रखा गया था। यह रोल संजय दत्‍त ने निभाया है। दुख की बात है कि यह फिल्‍म खुद संजय दत्‍त पर ही मजाक करती है। हम मुन्‍नाभाई के लिए बुरा महसूस करते हैं और सिंगल स्‍क्रीन के उन दर्शकों के लिए भी, जिनके लिए यह फिल्‍म बनाई गई है।

मुझे अब भी उनका दर्द महसूस हो रहा है। इस फिल्‍म में इतनी गोलियां दागी गई हैं कि वे किसी के भी सिर में छेद कर सकती हैं। लिहाजा, इ‍स पिक्‍चर से होशियार!

X
movie review: zila ghaziabad
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..