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जीना है तो ठोक डाल: हमें ही ठोक दें!

Dainik Bhaskar

Sep 15, 2012, 09:41 AM IST

मूवी रिव्यू: पढ़िए दैनिकभास्कर.कॉम से जुड़े फिल्म क्रिटिक मयंक शेखर द्वारा लिखा रिव्यू।

movie review:jeena hai to dhok daal
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यह फिल्म आजकल की हर फिल्म की ही तरह इस वैधानिक सूचना के साथ शुरू होती है कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इंटरवल के दौरान भी यह वार्निंग दी जाती है। फिल्म के दौरान भी हर बार जब फिल्म का कोई किरदार सिगरेट सुलगाता है, जैसा कि अक्सर होता है, स्क्रीन पर एक बड़ी-सी पट्टी नजर आती है, जो कहती है कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। हम समझ नहीं पाते कि यह कोई फिल्म है या धूम्रपान विरोधी विज्ञापन है। लेकिन अगर यह फिल्म एक धूम्रपान विरोधी विज्ञापन ही होती, तो कम से कम इसे बनाने का कोई प्रयोजन तो होता।



अब किसी न किसी को सेंसर बोर्ड के इस नियम को चुनौती देनी ही चाहिए। सेंसर बोर्ड हमारे जीवन को नुकसान पहुंचाने वाली दूसरी चीजों के बारे में तो कुछ नहीं कहता। मिसाल के तौर पर जब फिल्म में लोग ठर्रा पीते हैं या दूसरे लोगों को बंदूक से उड़ा देते हैं, तब तो इस तरह के कोई संदेश नहीं आते। बहरहाल, अगर इस फिल्म के बारे में यह वैधानिक चेतावनी दी जाती कि यह फिल्म देखना हमारी मानसिक सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है तो यह कहीं बेहतर होता।



एक अमीर आदमी की बेटी को मार गिराने के लिए चार लोगों को तैनात किया जाता है। पता नहीं, वह अमीर आदमी उद्योगपति है या नौकरशाह, या दोनों है। उसे अपने मराठा होने पर गर्व है। जिस व्यक्ति ने उसकी बेटी को ठिकाने लगाने के लिए भाड़े के टट्टू रखे हैं, वह हरियाणवी है। चारों गुंडे बिहारी हैं। इन मायनों में यह देश के विखंडन के बारे में एक आदर्श फिल्म हो सकती है, लेकिन फिल्म देखते समय हम यह नहीं सोचते। हम केवल यही सोचते हैं कि आखिर एक लड़की को बंदूक से मारने के लिए चार लोगों की क्या जरूरत है।



मुझे लगता है जिस व्यक्ति ने इन गुंडों को तैनात किया होगा, उसके पास खर्च करने के लिए खूब सारा पैसा होगा। ठीक उसी तरह, जैसे इस ऊलजलूल फिल्म के फाइनेंसरों के पास बर्बाद करने को खूब पैसा रहा होगा। यह फिल्म इसके युवा निर्देशक और अभिनेता के परिवार वालों और दोस्तों के लिए ही बनाई गई है।



चारों गुंडे अमीर आदमी के घर में नौकर बन जाते हैं। पता नहीं कैसे और क्यों? उनमें से प्रमुख गुंडे (रवि किशन) को उस लड़की से प्यार हो जाता है। वह कल्पना करने लगता है कि यह शहरी लड़की लाल साड़ी पहनकर बिहार के किसी गांव में सभी को खाना परोस रही है। मुझे नहीं पता किसी लड़की के लिए इससे भी डरावना विचार कोई और हो सकता है। वह टॉवल पहनकर घर में घूमती है, गुंडों को डाइनिंग टेबल पर खाना खिलाती है और अपने ही घर में बंदूक चलने की आवाज नहीं सुन पाती।



तो हम क्‍या करें? हम पूरी फिल्‍म देखते हैं, जिसमें बाकी के तीन गुंडे प्रमुख गुंडे से पूछते रहते हैं : 'भैया, मारिये अभी, इसको ठोक देते हैं… मारिये, इसको ठोक देते हैं… इसको ठोक देते हैं'। हम भी यही सोचते हैं कि बॉस, जल्‍दी से उसको ठोक डालो, ताकि हमें इस फिल्‍म से छुटकारा मिले। क्‍योंकि फिल्‍म के अंत में क्‍या होने वाला है, यह जानने में किसी की कोई दिलचस्‍पी नहीं है…



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