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'किस्मत लव पैसा दिल्ली': पूरी तरह से KLPD!

मूवी रिव्यू: इस फिल्म‍ का टाइटल केएलपीडी (किस्मकत लव पैसा दिल्ली) निश्चित ही एक पॉपुलर उत्तर भारतीय गाली से प्रेरित है।

Dainik Bhaskar

Oct 06, 2012, 09:54 AM IST

इस फिल्म‍ का टाइटल केएलपीडी (किस्मत लव पैसा दिल्ली) निश्चित ही एक पॉपुलर उत्तर भारतीय गाली से प्रेरित है। मुझे यहां यह बताने की जरूरत नहीं कि केएलपीडी के चारों अक्षर किन शब्दों का संक्षिप्तीकरण हैं, क्योंकि बहुतों को पहले ही पता होगा, लेकिन इसका मतलब यह होता है कि किसी व्यक्ति के साथ कुछ बहुत अच्छा होने वाला हो और ऐन मौके पर ऐसा न हो।

इन मायनों में केएलपीडी इस फिल्म के दोनों मुख्य कलाकारों विवेक ओबेरॉय और मल्लिका शेरावत की भी कहानी हो सकती है। इन दोनों को ही मीडिया द्वारा कभी आने वाले कल के सुपर सितारों का दर्जा दिया गया था और अब वे इस तरह की बेहद नाउम्मीद कर देने वाली फिल्मों तक सिमटकर रह गए हैं। उनके पतन का इस फिल्म् से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता।

ओबेरॉय ने इस फिल्म में एक दिल्लीवाले की भूमिका निभाई है। लगता है आजकल के सभी हीरो कभी न कभी किसी दिल्ली वाले की भूमिका निभा रहे हैं। ‘इसकी मां जी’ उसकी प्रिय गाली है। ‘मर जावां गुड़ खाके’ उसका तकिया कलाम है। आमतौर पर वह बौड़मों की तरह रहता है।

नहीं, किसी भी व्यक्ति की इस तरह सार्वजनिक रूप से छीछालेदर नहीं होनी चाहिए, विवेक ओबेरॉय तक की भी नहीं। देश की राजधानी का बंदा होने का निश्चित ही यह भी मतलब है कि वह इस शहर के ऑफिशियल खेल ‘शिकार’ में शरीक होता है। वह एक अजनबी हॉट लड़की का रात के 11.40 बजे आखिरी मेट्रो तक पीछा करता है। उसकी जेब में कंडोम है और उसे उम्मीद है कि वह किसी खोली में उसके साथ हमबिस्तर हो पाएगा। आप जानना चाहते हैं कि आखिर दिल्ली‍ लड़कियों के लिए इतनी असुरक्षित क्यों मानी जाती है। वेल, अगर हीरो के ये हाल हैं तो विलेन कैसे होंगे।

लेकिन एक वास्त विक विलेन लड़की को पकड़ लेता है और उसे अपनी वैन में खींच लेता है। उसके चार दोस्त इस तरह आसपास बैठ जाते हैं मानो वे किसी थिएटर के दर्शक हों और रेप का दृश्य देखना चाहते हों। लेकिन वह रेप नहीं करता। क्यों ? क्योंतकि एक छोटा बच्चाल भी वैन की खिड़की से भीतर देख रहा है। यह एक कॉमेडी सीन है, लेकिन मुझे वास्तव में इसमें कोई ह्यूमर नजर नहीं आता।

यह बुरा आदमी (आशुतोष राणा) वास्तव में पूरे मूड में है, क्योंकि यह उसका बर्थडे है। तो वह शहर में घूमने निकल जाता है और मिठाइयां चुराता है, एटीएम मशीनों पर धावा बोल देता है और जो उससे बन पड़ता है, वह करता है। फिल्म में एक पिज्जा डिलेवरी बॉय भी है, जो फर्राटेदार गति से अपना काम करता है और अपनी बातों से लोगों को दिमाग खाता रहता है।

लेकिन यह फिल्मा किस बारे में है? वेल, यह जरूरी नहीं कि फिल्में हमेशा किसी न किसी चीज के बारे में हों, बशर्ते वे अपने को गंभीरता से लेना न शुरू कर दें। वास्त व में इस फिल्म की समस्या यही है कि यह अपने आपको गंभीरता से लेना शुरू कर देती है और हमारा जी करता है कि सामने वाली सीट से अपना सिर फोड़ लें।

लेकिन कोई बात नहीं, खंडूरी की ही फिल्म एक चालीस की लास्ट लोकल को मास्टरपीस तो नहीं कहा जा सकता था, लेकिन वह ‘मुंबई नॉइर’ श्रंखला की ढेरों रद्दी फिल्मों की तुलना में एक बेहतर फिल्म थी। अलबत्ता केएलपीडी देखकर हमें गहरी ठेस पहुंचती है। फिल्म में हॉट गर्ल की भूमिका जाहिर है मल्लिका शेरावत ने ही निभाई है।



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