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मयंक शेखर का रिव्यू: 'शंघाई' के संग आएं

पढ़िए जाने माने फिल्म समीक्षक मयंक शेखर द्वारा लिखा गया फिल्म 'शंघाई' का रिव्यू।

Dainik Bhaskar

Jun 08, 2012, 09:20 PM IST



दोपहर है। दाग़ी दांतबत्तीसी वाला एक छुटकू-ऐंठू बंदा हॉकी की स्टिक लिए लेटा है और यार-दोस्तों के साथ मिलकर इस बारे में मगज-मंथन कर रहा है कि मटन को अंग्रेजी में क्या कहते हैं। उसे काले तारकोल की एक बाल्टी थमा दी जाती है। अचानक, यह बेरोज़गार बंदा समर्थकों की एक भीड़ की अगुवाई करता सड़क पर उतर आता है। हम यह नहीं जानते कि जो व्यक्ति उसके निशाने पर है, वह किसी बुकस्टोर का मालिक है या कोई स्थानीय अकादमिक।


जब वह स्लो मोशन में उस व्यक्ति के चेहरे पर काला तारकोल पोत देता है तो ‘मुंह काला करने’ का चलताऊ मुहावरा जीवंत हो उठता है। यह भारत में होने वाली जनहिंसा की घटनाओं की एक जानी-पहचानी तस्वीर है। हमने समाचारों में देखा है कि यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों का अक्सर इसी तरह मुंह काला कर दिया जाता है। आप सोचने लगते हैं कि आखिर किस तरह के लोग ऐसी हरकतें करते होंगे।


ख़ैर, बाक़ियों का तो पता नहीं, लेकिन भग्गू नामक यह मैला-कुचैला लड़का (पितोबाश ने इस भूमिका में जबर्दस्त अभिनय किया है)ज़रूर ऐसा करता है। हम नहीं जानते कि वह किस दुनिया का आदमी है।


फिल्म पृष्ठभूमि में जाकर ठीक यही जानना चाहती है। यह फिल्म का शुरुआती दृश्य है। इरादे ज़ाहिर कर दिए गए हैं और इसके बाद जो फिल्म हमारे सामने आती है, वह मध्य भारत की अराजकताओं और गतिरोधों को बेहतरीन ढंग से परदे पर उतारती है और लोकतंत्र के सामने भीड़तंत्र के उद्वेगों का खुलासा करती है। हमें बेहूदा भग्गू फिर नज़र आता है। इस भाड़े के टट्टू को अपने छोटे-से क़स्बे में विजिट कर रहे एक प्रतिष्ठित प्रोफेसर को ठिकाने लगा देने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। डॉ अहमदी (प्रसेनजित) नामक जो प्रोफेसर उसके निशाने पर है, उसके किरदार को समझना ज़रामुश्किल है।

वह थोड़ा अकादमिक है और थोड़ा स्थानीय एक्टिविस्ट। वह अमर्त्य सेन, अरुंधती रॉय और मेधा पाटकर का मिला-जुला रूप नज़र आता है। वह इस क़स्बे में लगाए जा रहे एक अंतरराष्ट्रीय बिजनेसपार्क का निर्माण रुकवाना चाहता है। वह देख सकता है कि ‘स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन’ स्थानीय रहवासियों के शोषण की मशीन बन जाएगा।


लोगों को विस्थापित किया जाएगा, जिनमें से कुछ का ही पुनर्वास होगा, शायद कुछ को रोज़गार भी मिले, लेकिन वे एक नई अर्थव्यवस्था के अनुचर के रूप में दूसरे दर्जे के नागरिकों की तरह अपने घरों से बेदख़ल हो जाएंगे। डॉ अहमदी के विचार जनप्रिय हैं, लेकिन वे सरकार द्वारा प्रायोजित परियोजना की सेहत के लिए अच्छे नहीं कहे जा सकते। एक सड़क हादसे में उनकी मौत हो जाती है और इस संबंध में लगभग सभी सुनिश्चित हैं कि यह पूर्वनियोजित हत्या है। मुख्यमंत्री महोदया मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद हैं। वे जांच बैठा देती हैं। उनके चुनिंदा ख़ासमख़ास नौकरशाह मामले की तहक़ीक़ात के लिए तैनात कर दिए जाते हैं।


ठीक इसी समय एक तमिल ब्राह्मण आईएएस अधिकारी कृष्णन् (अभय देओल, मुख्य भूमिका के लिए उनका चयन साहसपूर्ण था) का पदार्पण होता है। चतुर मुख्य सचिव (इस भूमिका में फारूक़ शेख़ खूब फबे हैं) उसका बॉस है। स्थानीय एसएसपी, एक आईपीएस अधिकारी, हत्या में शरीक़ हो सकते है। या कौन जाने, शायद समूची प्रशासनिक मशीनरी ही हत्या में शरीक़ हो। और तब, यह फिल्म (शायद देव बेनेगल की‘इंग्लिश, ऑगस्ट’ के बाद) भारत की पहली ऐसी मुख्यधारा फिल्म बन जाती है, जो भारतीय सिविल सेवा के पहियों को चलाने वाले प्रोटोकॉल्स और प्रपंचों की गहरी पड़ताल करती है।


फिल्म अपने ब्योरों में इतनी मुस्तैद है कि वह भारतीय नौकरशाही का पीछा क्लब के बैडमिंटन कोर्ट तक करती है, जो कि कॉपरेरेट गोल्फ़ कोर्सो के ही समकक्ष नौकरशाही की क्रीड़ास्थली है। हम अक्सर सिस्टम के बारे में शिक़ायत करते हैं। यही सिस्टम है। एक समय के बाद सरकारी अधिकारी अपने उन सियासी आक़ाओं के लघु व्यंग्यचित्र बनकर रह जाते हैं, जिन्हें वे सलाम ठोंकते हैं। हम जानते हैं कि कृष्णन् का एक तटस्थ जांच अधिकारी बन जाना मुसीबत का बायस होगा। लेकिन वह संत नहीं है। कोई भी नहीं हो सकता।


उसके सामने पुख़्ता सबूत हैं। डॉ अहमदी की एक्टिविस्ट गर्लफ्रेंड (कल्कि) अपने स्तर पर एक समांतर पड़ताल करती है। एक घटिया पोर्न फिल्ममेकर (इमरान हाशमी, जो अपनी अब तक की श्रेष्ठ भूमिका में हैं) एक्सीडेंट या क़त्ल से चंद मिनट पहले मौक़ा-ए-वारदात पर मौजूद था। उसके पार्टनर के पास ज़रूरी सुराग थे, लेकिन वह मारा गया है। अब कल्कि और हाशमी के किरदारों की भी दौड़भाग शुरू होती है। कृष्णन् के घर पर हमला बोल दिया जाता है। यह एक विचलित कर देने वाला रंगमंच है, जितना मज़ेदार , उतना ही तकलीफ़देह भी।


मौजूदा दौर के सबसे रोमांचक फिल्मकारों में से एक दिबाकर बनर्जी कला और विश्लेषण के दोराहे पर मनोरंजन को प्राथमिकता देते हैं। वे अपनी फिल्म में एक ‘आइटम नंबर’ डालने से भी परहेज़नहीं करते। यही वह चीज़ है, जो उनके बेहद चौकस और विजुअलसिनेमा (‘ओए लकी लकी ओए’, ‘एलएसडी’, या यह) को 1980 के दशक के सामाजिक रूप से सचेत कला फिल्म आंदोलन से अलग करती है। 1980 के दशक की समांतर फिल्मों की ही तरह इस फिल्म की उप-निर्माता भी एनएफ़डीसी है। लेकिन शायद इस फिल्म से कहीं अधिक दर्शक जुड़ेंगे।


लेकिन अपनी बेहद तेज़रफ़्तार के बावजूद फिल्म लोकतंत्र के उन अनेक आयामों पर रोशनी डालने में नाकाम रहती है, जो इस तरह के हाई-प्रोफ़ाइल मामले में मुख्य भूमिका निभाते हैं, मिसाल के तौर पर विपक्षी दल या उच्चतर न्यायपालिका। यहां तक कि एक्टिविस्ट की विधवा (तिलोत्तमा शोम), जो अलर्ट मीडिया का चेहरा बन जाती हैं, भी बड़ी ताक़त से आगे आती हैं, लेकिन बाद में उन्हें ख़ामोशी के साथ भुला दिया जाता है।

एक ऐसा तहक़ीक़ात ड्रामा, जिसमें दोषियों के बारे में पहले से पता हो, कोई बहुत नया विचार नहीं है। एलन पार्कर की ‘मिसिसिपी बर्निग’ (1988)के मूल विचार की हाल ही में प्रियदर्शन की बॉलीवुड रीमेक ‘आक्रोश’ (2010) में बुरी गत की गई थी। यह फिल्म वासिलिस वासिलिकोस की किताब ‘ज़ेड’ से प्रेरित है, जो 1960 में ग्रीस में हुई एक वास्तविक घटना पर आधारित थी। कोस्ता गाव्रास ने इसी शीर्षक से अपनी प्रशंसित फिल्म बनाई थी। उस फिल्म की समीक्षा करते हुए शीर्ष समालोचक रोजर एबर्ट ने कहा था : यह कहानी अमेरिका की भी हो सकती है.. यह क़तई इतनी ग्रीक नहीं है।


बनर्जी बहुत कुशलता के साथ उभरते हुए भारत के एक केंद्रीय संघर्ष को इस किताब में खोज निकालते हैं। यह है अमीरों के लिए विकास के बनाम स्थानीय ग़रीबों का विस्थापन। दोनों ही पक्षों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। आज भारत में ऐसे लोगों की तादाद दुनिया में सबसे ज़्यादा है, जिन्हें विकास परियोजनाओं के लिए विस्थापित किया गया है। ये सभी परियोजनाएं न्यायोचित नहीं हो सकतीं।


इस फिल्म की मुख्यमंत्री बड़ी आसानी से कोई मोदी या मायावती हो सकती है, हालांकि वह (सुप्रिया पाठक) स्पष्टत: विजयाराजे सिंधिया की तरह दिखती है। शंघाई का नाम बड़ी आसानी से छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश भी हो सकता है.. यह आधुनिक भारत की एक वैश्विक कहानी है, जिसे रोचक अंदाज़में सुनाया और मोहक ढंग से रचा गया है। इस फिल्म को निश्चित ही देखा और सराहा जाना चाहिए।

(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे हर शुक्रवार को दैनिकभास्कर डॉट कॉम के लिए फिल्म रिव्यू करेंगे।)



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