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फिल्म रिव्यूः पिक्चपर अब भी बकवास है

“मैं सिनेमा हूं,” वॉइस-ओवर में हमें सुनाई देता है। ठीक वैसे ही, जैसे महाभारत में हमें सुनाई देता था “मैं समय हूं।”

Dainik Bhaskar

Jul 20, 2012, 10:01 PM IST

“मैं सिनेमा हूं,” वॉइस-ओवर में हमें सुनाई देता है। ठीक वैसे ही, जैसे महाभारत में हमें सुनाई देता था “मैं समय हूं।” इस तरह फिल्म शुरू होती है। फिल्म की पृष्ठभूमि है बॉलीवुड। एक व्याक्ति निर्देशक बनना चाहता है। उसने लंदन में फिल्मी निर्माण का अध्ययन किया है और वह फिल्में बनाने बंबई चला आता है। उसके पास दवा घोटाले का खुलासा करने वाली एक युवा महिला पत्रकार की पटकथा है। उसका दोस्ते (राजपाल यादव) बॉलीवुड में एक्ट्रा कलाकार है। बताया जाता है कि इस फिल्म ने थिएटर तक पहुंचने में एक दशक का समय लिया है। फिल्म देखकर पता चला जाता है, क्योंकि बॉलीवुड के एक्ट्रा के घर की दीवारों पर गोविंदा और बॉबी देओल के पोस्टर्स टंगे हैं।

एस्पायरिंग निर्देशक सितारों के सचिवों, निर्माताओं, प्रचार एजेंट्स (जिन्हें पीआरओ कहा जाता है) के चक्कर लगाता है… वे सभी किसी पागलखाने से निकले हुए सनकी शराबी नजर आते हैं। लाउड, थुलथुल और सेक्स ऑब्सेवस्डे निर्माताओं की रुचि या तो बलात्काब के दृश्यों में है या धार्मिक फिल्मों में। उनमें से एक लगातार अपनी कमर खुजाता रहता है और दूसरे निरे मूर्खों की तरह खीसें निपोरते रहते हैं। सभी ने अस्वाभाविक अभिनय किया है। एक फिल्म पार्टी में बार के खुलते ही भगदड़ मच जाती है। पागल भीड़ के हमले से बचने के बाद युवा निर्देशक को अंतत: अपनी पहली फिल्म बनाने के लिए एक निर्माता और एक हीरोइन मिल जाती हैं।

इस दूसरे दर्जे की फिल्म में डायरेक्टेर की भूमिका सुनील शेट्टी ने निभाई है। यह दुखद है। उनकी उम्र के अन्य नायक आमिर, शाहरुख, सलमान, सैफ आज टॉप स्टार हैं, लेकिन वे इस तरह की फिल्मों तक सिमटकर रह गए हैं। निर्देशक समझ जाता है कि निर्माता और हीरोइन के मिलने के बावजूद वह अपने मन की फिल्म नहीं बना सकता। इस फिल्म के निर्माताओं की ही तरह फिल्म के भीतर बन रही वाली फिल्म के निर्माताओं के हाथ से भी कहानी के सूत्र छूट चुके होते हैं। इसमें अंडरवर्ल्ड भी शामिल हो जाता है। डॉन की प्रेमिका भी परिदृश्य में आ जाती है। आइटम सॉन्ग भी होता है। हम उन सभी को देखते हैं। एक्शन हीरो रोमांटिक सीन चाहता है, रोमांटिक हीरो एक्शन सीन चाहता है। हम उन दोनों को देखते हैं। इसके बाद धमाकों और पीछा करने के दृश्य रचे जाते हैं। एस्पायरिंग निर्देशक को एस्पिरिन की जरूरत महसूस होती है। हमें भी।

किसी बुरी फिल्म के निर्माण में जो कुछ होता है, वह सब इस फिल्म में साफ दिखाई देता है। तब यह फिल्म एक बी-ग्रेड फिल्म के निर्माण के बारे में एक बी-ग्रेड फिल्म बन जाती है। बहुत खूब। आखिर हम समझ नहीं पाते कि इन दोनों में से किस फिल्म को छोड़कर बाहर चले आएं। पिक्चर अब भी बाकी है? धत्‍।

(मयंक शेखर जाने-माने फिल्म समीक्षक हैं, वे www.dainikbhaskar.com से जुड़े हैं)



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