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देव आनंद के ब्लैक कोट पहनने पर कोर्ट ने लगा दिया था बैन, पढ़ें दिलचस्प किस्से

1943 में अपने सपनों को साकार करने के लिए जब वह मुंबई पहुंचे। तब उनके पास मात्र 30 रुपए थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था।

Dainik Bhaskar

Sep 26, 2016, 12:30 PM IST
जवानी के दिनों में काले कोट में देव आनंद (बाएं)। जवानी के दिनों में काले कोट में देव आनंद (बाएं)।
मुंबई। झुक-झुक कर संवाद अदायगी का खास अंदाज हो, या फिर फीमेल फैन्स की बात...देव आनंद अपने समकालीन एक्टरों से हमेशा अलग थे। बॉलीवुड में कितने ही हीरो आए और चले गए, लेकिन ऐसे कुछेक ही हैं, जिनके किस्सों का जिक्र किए बिना हिंदी फिल्मों का इतिहास अधूरा रह जाएगा। देव आनंद भी ऐसे ही सितारों में से एक थे। 26 सितंबर को देव आनंद की बर्थ एनिवर्सरी है। आज ही के दिन 1923 में उनका जन्म पंजाब के गुरदासपुर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था।

अपने दौर में रूमानियत और फैशन आइकन रहे देव आनंद को लेकर यूं तो कई किस्से मशहूर हैं, लेकिन इन सबसे खास उनके काले कोट पहनने से जुड़े किस्से हैं। देव आनंद ने एक दौर में व्हाइट शर्ट और ब्लैक कोट को इतना पॉपुलर कर दिया था कि लोग उन्हें कॉपी करने लगे। फिर एक दौर वह भी आया जब देव आनंद पर पब्लिक प्लेसेस पर काला कोट पहनने पर बैन लगा दिया गया।
हिंदी सिनेमा में तकरीबन छह दशक तक दर्शकों पर अपने हुनर, अदाकारी और रूमानियत का जादू बिखेरने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद को एक्टर बनने के लिए कई पापड़ बेलने पड़े। दिलचस्प बात यह है कि जब देव आनंद मुंबई पहुंचे तब उनके पास मात्र 30 रुपए थे।

देव आनंद के काले कोट का जादू...
अपने दौर के सबसे सफल एक्टर रहे देव आनंद अपने काले कोट की वजह से बहुत सुर्खियों में रहे। देव आनंद अपने अलग अंदाज और बोलने के तरीके के लिए काफी मशहूर थे। सफेद कमीज और काले कोट के फैशन को देव आनंद ने पॉपुलर बना दिया। इसी दौरान एक वाकया ऐसा भी देखने को मिला जब कोर्ट ने उनके काले कोट को पहन कर घूमने पर पाबंदी लगा दी। इसकी वजह बेहद दिलचस्प और थोड़ी अजीब भी थी। दरअसल कुछ लड़कियों के उनके काले कोट पहनने के दौरान आत्महत्या की घटनाएं सामने आईं। ऐसा शायद ही कोई एक्टर हो जिसके लिए इस हद तक दीवानगी देखी गई और कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा।

30 रुपए लेकर पहुंचे थे मुंबई...
देव आनंद का असली नाम धर्मदेव पिशोरीमल आनंद था। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक की शिक्षा 1942 में लाहौर में पूरी की। देव आनंद आगे भी पढ़ना चाहते थे, लेकिन उनके पिता ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि उनके पास उन्हें पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं। अगर वह आगे पढ़ना चाहते हैं तो नौकरी कर लें। यहीं से उनका और बॉलीवुड का सफर भी शुरू हो गया। 1943 में अपने सपनों को साकार करने के लिए जब वह मुंबई पहुंचे। तब उनके पास मात्र 30 रुपए थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था। देव आनंद ने मुंबई पहुंचकर रेलवे स्टेशन के समीप ही एक सस्ते से होटल में कमरा किराए पर लिया। उस कमरे में उनके साथ तीन अन्य लोग भी रहते थे जो उनकी तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

आगे की स्लाइड्स में पढ़ें, देव आनंद से जुड़े ऐसे ही कुछ दिलचस्प किस्से...
राज कपूर और दिलीप कुमार के साथ देव आनंद। राज कपूर और दिलीप कुमार के साथ देव आनंद।
सैनिकों की चिट्ठियां पढ़कर किया गुजारा...

काफी दिन यूं ही गुजर गए। उनके पास पैसा खत्म हो रहा था और तब उन्होंने सोचा कि अगर उन्हें मुंबई में रहना है तो नौकरी करनी ही पड़ेगी। यह बात उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी 'रोमांसिंग विद लाइफ' में बताई है। काफी मशक्कत के बाद उन्हें मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिल गई। यहां उन्हें सैनिकों की चिट्ठियों को उनके परिवार के लोगों को पढ़कर सुनाना होता था।
मिलिट्री सेंसर ऑफिस में देव आनंद को 165 रुपए मासिक वेतन मिलना था। इसमें से 45 रुपए वह अपने परिवार के खर्च के लिए भेज देते थे। लगभग एक साल तक मिलिट्री सेंसर में नौकरी करने के बाद वह अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए जो उस समय भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से जुड़े हुए थे। उन्होंने देव आनंद को भी अपने साथ 'इप्टा' में शामिल कर लिया। इस बीच देव आनंद ने नाटकों में छोटे-मोटे रोल किए।
 
देव आनंद। देव आनंद।
'हम एक हैं' से मिला पहला ब्रेक

देव आनंद को पहला ब्रेक 1946 में प्रभात स्टूडियो की फिल्म 'हम एक हैं' से मिला। हालांकि फिल्म फ्लॉप होने से दर्शकों के बीच वह अपनी पहचान नहीं बना सके। इस फिल्म के निर्माण के दौरान ही प्रभात स्टूडियो में उनकी मुलाकात गुरुदत्त से हुई जो उस समय फिल्मों में कोरियोग्राफर के रूप में अपनी पहचान बनाना चाह रहे थे। वर्ष 1948 में प्रदर्शित फिल्म 'जिद्दी' देव आनंद के फिल्मी करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई। फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखा और 'नवकेतन बैनर' की स्थापना की। नवकेतन के बैनर तले उन्होंने वर्ष 1950 में अपनी पहली फिल्म 'अफसर' का निर्माण किया जिसके निर्देशन की जिम्मेदारी उन्होंने अपने बड़े भाई चेतन आनंद को सौंपी।
इस फिल्म के लिए उन्होंने उस जमाने की जानी-मानी एक्ट्रेय सुरैया का चयन किया, जबकि अभिनेता के रूप में देव आनंद खुद ही थे। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से असफल रही और इसके बाद उन्हें गुरुदत्त का ख्याल आया। देव आनंद ने अपनी अगली फिल्म 'बाजी' के निर्देशन की जिम्मेदारी गुरुदत्त को सौंप दी। 'बाजी' फिल्म की सफलता के बाद देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री में एक अच्छे अभिनेता के रूप में शुमार होने लगे। इस बीच देव आनंद ने 'मुनीम जी', 'दुश्मन', 'कालाबाजार', 'सी.आई.डी', 'पेइंग गेस्ट', 'गैम्बलर', 'तेरे घर के सामने', काला पानी जैसी कई सफल फिल्में दी।
जीनत अमान के साथ देव आनंद। जीनत अमान के साथ देव आनंद।
गुरुदत्त हुए अलग तो सुरैया आई

देव आनंद ने गुरुदत्त के निर्देशन में वर्ष 1952 में फिल्म 'जाल' में भी अभिनय किया। इस फिल्म के निर्देशन के बाद गुरुदत्त ने यह फैसला किया कि वह केवल अपनी प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों का निर्देशन करेंगे। बाद में देव आनंद ने प्रोडक्शन हाउस की फिल्मों के निर्देशन की जिम्मेदारी अपने छोटे भाई विजय आनंद को सौंप दी। विजय आनंद ने देव आनंद की कई फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों में 'कालाबाजार', 'तेरे घर के सामने', 'गाइड', 'तेरे मेरे सपने', 'छुपा रूस्तम' प्रमुख हैं।
फिल्म 'अफसर' के निर्माण के दौरान देव आनंद का झुकाव फिल्म अभिनेत्री सुरैया की ओर हो गया था। एक गाने की शूटिंग के दौरान देव आनंद और सुरैया की नाव पानी में पलट गई जिसमें उन्होंने सुरैया को डूबने से बचाया। इसके बाद सुरैया देव आनंद से बेइंतहा मोहब्बत करने लगीं, लेकिन सुरैया की दादी की इजाजत न मिलने पर यह जोड़ी टूट गई। 1954 में देव आनंद ने अपने जमाने की मशहूर अभिनेत्री कल्पना कार्तिक से शादी कर ली।
 
मधुबाला के साथ देव आनंद। मधुबाला के साथ देव आनंद।
रील और रियल, दोनों जगह बेइंतहा रोमांस...

देव आनंद सिर्फ पर्दे पर ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी दिल्लगी करने में कभी पीछे नहीं रहे। कई अभिनेत्रियों के साथ अपने रोमांस को लेकर वे चर्चाओं में रहे, फिर चाहे सुरैया हो या जीनत अमान। दोनों के साथ उनके प्रेम के चर्चे हवा में तैरते रहे। कहते हैं सुरैया उनका पहला प्यार था और जीनत को भी वह पसंद करते थे।
वर्ष 2005 में जब सुरैया का निधन हुआ तो देव आनंद उन लोगों में से एक थे जो उनके जनाजे के साथ थे। देव आनंद के शानदार अभिनय की बदौलत पर्दे पर जीवंत आकार लेने वाली प्रेम कहानियों ने लाखों युवाओं के दिलों में प्रेम की लहरें पैदा कीं, लेकिन खुद देव आनंद इस लिहाज से जिंदगी में काफी परेशानियों से गुजरे।
 
नूतन के साथ देव आनंद नूतन के साथ देव आनंद
...और ऐसे बने डायरेक्टर

देव आनंद प्रख्यात उपन्यासकार आर.के. नारायण से काफी प्रभावित रहा करते थे और उनके उपन्यास 'गाइड' पर फिल्म बनाना चाहते थे। आर.के. नारायणन की स्वीकृति के बाद देव आनंद ने हॉलीवुड के सहयोग से हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में फिल्म 'गाइड' का निर्माण किया जो देव आनंद के सिने कॅरियर की पहली रंगीन फिल्म थी।
इस फिल्म के लिए देव आनंद को उनके जबरदस्त अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का फिल्म फेयर पुरस्कार भी दिया गया। वर्ष 1970 में फिल्म 'प्रेम पुजारी' के साथ देव आनंद ने निर्देशन के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। हालांकि यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह से नकार दी गई बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इसके बाद वर्ष 1971 में फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' का भी निर्देशन किया और इसकी कामयाबी के बाद उन्होंने अपनी कई फिल्मों का निर्देशन भी किया। इन फिल्मों में 'हीरा पन्ना', 'देश परदेस', 'लूटमार', 'स्वामी दादा', 'सच्चे का बोलबाला', 'अव्वल नंबर' जैसी फिल्में शामिल हैं।
 
वैजयंती माला के साथ देव आनंद। वैजयंती माला के साथ देव आनंद।
देव आनंद​ का निजी जीवन...

देव आनंद ने कल्पना कार्तिक के साथ शादी की थी, लेकिन उनकी शादी अधिक समय तक सफल नहीं हो सकी। दोनों साथ रहे, लेकिन बाद में कल्पना ने एकाकी जीवन को गले लगा लिया। दूसरे एक्टर्स की तरह देव आनंद ने भी अपने बेटे सुनील आनंद को फिल्मों में स्थापित करने के लिए बहुत प्रयास किए, लेकिन सफल नहीं हो सके।
 
टीना मुनीम के साथ देव आनंद। टीना मुनीम के साथ देव आनंद।
देव आनंद और पुरस्कार...

देव आनंद को एक्टिंग के लिए दो बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। देव आनंद को सबसे पहला फिल्म फेयर पुरस्कार वर्ष 1950 में प्रदर्शित फिल्म 'काला पानी' के लिए दिया गया। इसके बाद वर्ष 1965 में भी देव आनंद फिल्म 'गाइड' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किए गए। वर्ष 2001 में देव आनंद को भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण सम्मान प्राप्त हुआ। वर्ष 2002 में उनके द्वारा हिन्दी सिनेमा में महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 3 दिसंबर 2011 को इस सदाबहार अभिनेता ने लदंन में अपनी अंतिम सांस ली।
 
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जवानी के दिनों में काले कोट में देव आनंद (बाएं)।जवानी के दिनों में काले कोट में देव आनंद (बाएं)।
राज कपूर और दिलीप कुमार के साथ देव आनंद।राज कपूर और दिलीप कुमार के साथ देव आनंद।
देव आनंद।देव आनंद।
जीनत अमान के साथ देव आनंद।जीनत अमान के साथ देव आनंद।
मधुबाला के साथ देव आनंद।मधुबाला के साथ देव आनंद।
नूतन के साथ देव आनंदनूतन के साथ देव आनंद
वैजयंती माला के साथ देव आनंद।वैजयंती माला के साथ देव आनंद।
टीना मुनीम के साथ देव आनंद।टीना मुनीम के साथ देव आनंद।
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