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Movie Review: 'मछली जल की रानी है'

Dainik Bhaskar

Jun 13, 2014, 01:41 PM IST

'मछली जल की रानी है' डराते-डराते हंसाने लगती है, जिससे यह हॉरर होने का रोमांच दर्शकों में पैदा नहीं कर पाती। फिल्म का क्लाइमेक्स किरदारों के गिरते-पड़ते खत्म हो जाता है, जिससे सारा रोमांच धरा का धरा रह जाता है।

Machali jal ki rani hai
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कहानी: न डरा सकी न रुला
आयशा (स्वरा भास्कर) और उदय सक्सेना (भानु उदय) खुशहाल युगल है। दोनों मुंबई में रहते हैं। उदय एक प्राइवेट कंपनी में मैकेनिकल इंजीनियर है और वह अपनी वाइफ और एक चार साल के बेटे सनी के साथ खुशहाल जिंदगी बिता रहा है। एक दिन, जब वे दोनों एक पार्टी से घर लौट रहे होते हैं, तभी अचानक मस्ती-मजाक के दौरान उनकी गाड़ी का एक्सिडेंट हो जाता है। आयशा की विंडो से टकराकर गाड़ी की ड्राइवर दम तोड़ देती है। इस हादसे से आयशा को गहरा सदमा लगता है। वह डिप्रेशन में चली जाती है। इस सदमे से आयशा को उबारने के लिए उसके पिता डॉ. अखिलेश त्रिवेदी (सौरभ दुबे) जो कि एक मनोवैज्ञानिक डॉक्टर हैं, पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन नाकाम रहते हैं। इस बीच उदय के बॉस उसे वर्षों से जबलपुर में बंद पड़ी फैक्ट्री को खुलवाने की जिम्मेदारी सौंपते हैं, जिसे उदय यह सोचकर स्वीकार कर लेता है कि जगह बदलकर आयशा भी शायद ठीक हो जाए।
जबलपुर पहुंचने पर उदय अपने काम में बिजी हो जाता है और आयशा बंगले में अपने बेटे के साथ दिनभर अकेले रहने लगती है। आयशा को घर में किसी अनजान शख्स की मौजूदगी का अहसास होने लगता है। उसे घर में परछाइयां दिखने लगती हैं, जिससे उसका डिप्रेशन कई गुना बढ़ने लगता है। उदय उसे नॉर्मल महसूस करवाने के लिए आउटिंग पर भी ले जाता है, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होता। आयशा उदय को गेस्ट हाउस में किसी के होने की बात कहती है, लेकिन वह इसे नकार देता है। इधर आयशा अपने पड़ोस में रहने वाले मनोहर गुप्ता (मुरली शर्मा) के परिवार से घुलने-मिलने की कोशिश भी करती है, लेकिन मनोहर अजीब शख्स है। वह अपनी फैमिली से आयशा काे दूर रहने की हिदायत देता है। इस बीच स्थितियां और बिगड़ने लगती हैं और आयशा की नौकरानी और एक तांत्रिक की मौत हो जाती है।
प्रेतात्मा दोनों को बेरहमी से मार देती है। आयशा के पिता अपनी बेटी को बचाने के लिए एक तांत्रिक रुद्र (दीपराज राना) की मदद लेने के लिए उसे जेल से छुड़वाते हैं और जबलपुर ले आते हैं। इसके बाद क्या रुद्र आयशा को बचा पाता है...? आयशा के पड़ोस में रहने वाला मनोहर गुप्ता कौन है...? आयशा की फैमिली को ही प्रेतात्माएं क्यों परेशान करती हैं...? यही फिल्म की कहानी है, जिसका खुलासा फिल्म के अंतिम पंद्रह मिनट में होता है।

एक्टिंग: फिल्म स्वरा के कंधों पर टिकी हुई है। 'रांझणा' के जरिए खुद को एक बेहतरीन अदाकारा साबित कर चुकी स्वरा भास्कर ने नि:संदेह बेहतरीन अदाकारी की है। उनके एक्सप्रेशंस पब्लिक को कुछ देर के लिए हॉल के भीतर डराते जरूर हैं, लेकिन कमजोर पटकथा इस डर को फिल्म खत्म होने तक बांधे नहीं रख सकती। स्वरा और उदय के बीच रोमांटिक सीन बोझिल लगते हैं। भानु उदय के हिस्से जितना काम आया उसमें वह किसी फिल्म के नायक कम और डेली शोप के किरदार ज्यादा नजर आते हैं। मुरली शर्मा और दीपराज राणा एक बेहतरीन कलाकार हैं, उनके हिस्से जितने सीन आए उसमें इन दोनों कलाकारों की मेहनत दिखती है।
डायरेक्शन: फिल्म के डायरेक्टर देबलॉय डे की फिल्म पर पकड़ नजर नहीं आती। कई सीन्स में वह भटक जाते हैं। फिल्म के चार-पांच दृश्य उन्होंने जरूर बेहद खूबसूरती से कैमरे में कैद किए हैं, लेकिन कमजोर पटकथा उनका एफर्ट नजर नहीं आने देती।
क्यों देखें: यदि आपको इस हफ्ते कोई फिल्म देखनी ही है, तो आप स्वरा की अदाकारी देखने के लिए सिनेमाघरों में जा सकते हैं। साथ में, एक सलाह और लेते जाइए कि आप हॉरर मूवी देखने नहीं जा रहे हैं। आप विजुअल इफेक्ट से तैयार एक ऐसी फिल्म देखने जा रहे हैं, जिसमें भूत खौफनाक नहीं है। उनके चेहरे डरावने नहीं हैं। फिल्म से ज्यादा डरावने फिल्म के पोस्टर्स हैं।

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