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Movie Review: मस्तराम

Dainik Bhaskar

May 09, 2014, 05:34 PM IST

शुक्रवार के दिन बॉक्स ऑफिस पर लगभग आधा दर्जन फिल्में रीलिज हुईं। इन फिल्मों में 'मस्तराम' के अलावा 'ख्वाब', 'हवा हवाई', 'कोयलांचल' और 'ये है बकरापुर' जैसी फिल्में शामिल रहीं।

Mastram Review
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डायरेक्टर अखिलेश जायसवाल की फिल्म 'मस्तराम' अपने नाम और ट्रेलर से काफी सुर्खियां बटोर चुकी थी, ऐसे में उम्मीद थी कि टिकट विंडो पर लोगों की भारी भीड़ दिखाई देगी। फिल्म को देखने सिनेमाघर ज्यादा लोग पहुंचें, इसके लिए लोगों से वोट मांगने के अंदाज में फिल्म देखने की अपील की गई थी, लेकिन इस अपील को शायद लोगों ने खारिज कर दिया। इस बात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 300 सीट वाले सिनेप्लेक्स में महज 30-35 लोग दिखाई दिए।

फिल्म की कहानी :

फिल्म की कहानी हिमाचल प्रदेश के एक युवक राजाराम वैष्णव उर्फ हंस (राहुल बग्घा) की है, जो पेशे से क्लर्क है। फिल्म के तीसरे सीन यानी शुरुआती 5 मिनट में ही राजाराम की शादी रेणु (तारा अलीशा बेरी) से हो जाती है। रेणु बहुत साधारण और घरेलू पत्नी है। राजाराम लेखक है और वो अपने उपन्यास को छपवाना चाहता है, लेकिन उसकी कहानियां किसी को पंसद नहीं आतीं और उसे कोई पब्लिशर नहीं मिलता। लोग उसकी कविताएं और कहानियां सुनकर हंसी उड़ाते हैं। राजाराम शहर छोड़कर दिल्ली जाकर अपने उपन्यास को छपवाने का मन बनाता है। इस बीच उसका दोस्त महेश (इश्कियात खान) उसे कुछ पब्लिशर्स का पता देता है, लेकिन बात यहां भी नहीं बनती। हालांकि, जल्दी ही हंस को एक पब्लिशर का साथ मिलता है, लेकिन वो उसे कहानियों में मसाला डालने के लिए कहता है। इसके बाद हंस 'यौवन की पहली बारिश' नाम की इरॉटिक कहानी लिखता है, जो पब्लिशर को पसंद आती हैं। इस कहानी की 300 प्रतियां छपवाई जाती हैं, जो झट से बिक जाती हैं। बस यहीं से राजाराम को मस्तराम नाम मिल जाता है और वो अपनी कल्पना के आधार पर ऐसी कई कहानियां लिख देता है। इन कहानियों में वो पत्नी, दोस्त, हर किसी के नाम का इस्तेमाल करता है, जिससे बाद में विवाद हो जाता है। मस्तराम (राजाराम) की इन कहानियों में क्या होता है, इसे जानने के लिए तो आपको सिनेमाघरों का रुख करना पड़ेगा।

सिनेमा हॉल से :

सिनेप्लेक्स में जितने भी लोग 'मस्तराम' देखने पहुंचे थे, उनमें सौ फीसदी युवा थे। इन लोगों के बीच दो कपल भी दिखाई दिए, जो 28 की उम्र के आस-पास के थे। फिल्म भले ही A सर्टिफिकेट थी, लेकिन इसे देखने जितने भी लोग आए, किसी ने अपना मुंह नहीं छिपाया। इस छोटी-सी भीड़ में आए लोग किसी के चाचा-ताऊ तो थे, लेकिन उनकी उम्र 35 साल से कम ही रही होगी। हालांकि, फिल्म के दौरान जितने भी लोगों के फोन आए, उन्हें झूठ जरूर बोलना पड़ा।

फिल्म का डायरेक्शन और एक्टिंग :

अखिलेश जायसवाल ने फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने के साथ डायरेक्शन भी किया है। फिल्म की शुरुआत काफी अच्छी है, लेकिन 10 मिनट के बाद ही फिल्म स्लो मोशन के ट्रैक पर चली जाती है। लगभग 2 घंटे की फिल्म में कुछ ऐसे पड़ाव भी आते हैं, जहां स्टोरी उठती हुई दिखाई देती है। फिल्म की पूरी कहानी तीन किरदारों राजाराम, रेणु और महेश के आस-पास घूमती हुई दिखाई देती है। ऐसे में, फिल्म के कई सीन्स में बोरियत भी होती है। हालांकि, अखिलेश ने पहली बार किसी फिल्म का डायरेक्शन किया है, ऐसे में पहले चांस के लिहाज से ये बेहतर है।

फिल्म क्यों देखें?

'मस्तराम' को देखने की वैसे तो कोई वजह नहीं है, लेकिन जो लोग मस्तराम की कहानियों के बारे में जानना चाहते हैं, वो इस फिल्म को देखने का चांस ले सकते हैं। फिल्म में अच्छी बात ये है कि बोल्ड सबजेक्ट और A सर्टिफिकेट होने के बावजूद इसमें एक-दो सीन्स को छोड़कर किसी तरह की अश्लीलता नहीं है। ऐसे में हर दर्शक वर्ग इसे देख सकता है।

फिल्म क्यों न देखें?

फिल्म का ट्रेलर हो सकता है कि लोगों को सिनेमाघरों तक पहुंचने पर मजबूर कर दे, लेकिन फिल्म की कहानी काफी कमजोर है और बोर करने वाली है। ऐसे में, इस फिल्म को देखना आपकी जेब पर भारी पड़ सकता है।

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