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Movie Review: 3 A.M.

हॉरर फिल्में गाहे-बगाहे हमारे फिल्मकारों को अपनी आरे आकर्षित तो करती हैं, लेकिन रोमांच और खौफ के मामले में हॉलीवुड से अभी मीलों दूर हैं।

Dainik Bhaskar

Sep 26, 2014, 03:47 PM IST
Movie Review: 3 A.M.
पिछले कुछ महीनों में बॉक्स ऑफिस पर 'डर@ दि मॉल', 'पिज्जा 3D' और 'मछली जल की रानी है' जैसी पैरानॉर्मल यानी भुतहा फिल्में देखने को मिलीं और इस हफ्ते '3A.M.' रिलीज हुई है। हॉरर फिल्में गाहे-बगाहे हमारे फिल्मकारों को अपनी ओर आकर्षित तो करती हैं, लेकिन रोमांच और खौफ के मामले में हॉलीवुड से अभी मीलों दूर हैं। '3 A.M.' खौफ नहीं ऊब पैदा करती है।
कहानी
सनी (रणविजय सिंह) और सारा (अनंदिता नायर) एक-दूसरे से बहुत प्यार करते हैं। सनी फिल्ममेकर है और सारा डॉक्युमेंट्री बनाती है। सारा भुतहा मिल में रात को डॉक्युमेंट्री के काम से जाती है और सुबह उसकी लाश फांसी से लटकते हुए मिलती है। सनी जो सारा से शादी करने वाला था, इस बात से बौखला-सा जाता है और उसके बाद सारा से मिलने के लिए वो एक शो बनाता है। इस शो के जरिए वो रुद्र मिल में जाकर सारा की मौत और वहां की सच्चाई का पता लगाना चाहता है।
इस काम में सनी का साथ देते हैं सायरस (सलिल आचार्य ) और राज (कविन दावे)। तीनों अपने प्लॉन के तहत मिल में पहुचते हैं और फिर उनके साथ अजीब-सी घटनाएं घटने लगती हैं। रुद्र मिल में तीनों के साथ क्या होता है? क्या तीनों सारा की मौत की गुत्थी सुलझा सकते हैं? क्या तीनों मिल से बाहर निकल पाते हैं? इन्हीं सब सवालों का जवाब देती हुई फिल्म नाटकीय ढंग से खत्म होती है, जिसमें आपको मजा और फिल्म देखकर किस्से सुनाने वाली फीलिंग तक नहीं आ पाती, उलटे आप खुद को ठगा-सा महसूस करेंगे।

एक्टिंग
एक्टिंग का क्या है साहब... वैसी ही है बस जैसा गांव की रामलीला में हनुमान के पीछे बंदर बने बच्चे 'जय श्री राम' का नारा लगाकर एक्टर बन जाते हैं। वीजे रणविजय सिंह इससे पूर्व 'एक्शन रिप्ले', 'मुंबई कटिंग' और 'लंदन ड्रीम्स' जैसी फिल्में कर चुके हैं, लेकिन अभी भी अपनी आरजे वाली छवि से बाहर नहीं निकल पा रहे। रणविजय को अब समझना चाहिए कि लुक्स देना और संवाद की उल्टी कर देना भर ही अब अभिनय नहीं रहा, जबकि इंडस्ट्री में एक से बढ़कर एक एक्टर हर रोज आ रहे हों। रणविजय की एक्टिंग फीकी है। अनंदिता नायर को एक्टिंग नहीं आती। फिल्म कमजोर अदाकारी से बोझिल लगने लगती है।
डायरेक्शन
कहानी ही बकवास और उलझी हुई हो हो तो फिर डायरेक्शन की बात करना ही बेमानी है। डायरेक्टर विशाल महाडकर ने शायद अपनी फीस ली और पलटकर स्क्रिप्ट को देखा तक नहीं। कैमरा और इफेक्ट्स की मदद से वीडियो बनाकर प्रोड्यृसर को चिपका दिया, यही कहेंगे। ये वही सज्जन हैं जो इससे पहले 'ब्लड मनी' जैसी पकाऊ फिल्म बना चुके हैं।
संगीत
आपने सुना क्या...? नहीं ना.. तो फिर चर्चा ही बेकार है।
बिल्कुल ना देखें
इस फिल्म ने हमें अपना तय फॉर्मेट 'क्यों देखें' बदलने पर मबजूर कर दिया तो इस दफा हम भी बिना लाग-लपेट के आपको बता रहे हैं, बिल्कुल ना देखें। ऐसी फिल्में मूड खराब करने के लिए बनाई ही क्यों जाती हैं, बल्कि इस सप्ताह घर बैठकर ये सोचें।
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